Akalmand aurat का Kissa | Aachi Biwi -Dawat~e~Tabligh

नेक बीवियां अपने Pati से नेकी का काम करवाया करती हैं। Akalmand aurat ka Kissa | Aachi Biwi -Dawat~e~Tabligh in Hindi…

Akalmand aurat ka Kissa | Aachi Biwi -Dawat~e~Tabligh
Akalmand aurat ka Kissa | Aachi Biwi -Dawat~e~Tabligh

Akalmand aurat 

  • नेक बीवियां अपने ख़ाविन्दों से नेकी का काम करवाया करती हैं

एक ग्रातून गुज़री हैं जिनको हातिम ताई की बीवी कहा जाता था। नेक, दीनदार और मालदार खाविन्द की बीवी थीं। उनका घर जिस बस्ती में था उसके करीब से एक आम सड़क गुजर रही थी देहातों के लोग अपनी वस्तियों से चलकर उस सड़क तक आते और बसों के ज़रिए फिर शहरों में जाते। कई मर्तबा ऐसा भी होता कि वह जब पहुंचते तो बस का आख़िरी वक़्त ख़त्म हो चुका होता, रात गहरी हो चुकी होती। अब उन मुसाफ़िरों को बस न मिलने की वजह से इंतिज़ार में बैठना पड़ता और बैठने के लिए कोई ख़ास जगह भी बनी हुई नहीं थी। उस नेक औरत ने जिसका शौहर खुशहाल था अपने खाविन्द को यह तज्वीज़ पेश की कि क्यों न हम मुसाफिरों के लिए एक छोटा-सा मुसाफ़िरख़ाना बना दें ताकि वक़्त बे वक़्त लोग अगर आएं और उनको सवारी न मिले तो वे लोग एक कोने में बैठकर वक्त गुज़ार लें। खाविन्द ने मुसाफ़िर खाना बनवा दिया। लोगों के लिए बड़ी आसानी हो गई, जब भी लोग आते तो उस कमरे में बैठकर थोड़ी देर इंतिज़ार कर लेत।

फिर उस नेक औरत को ख्याल आया कि क्यों न उन मुसाफ़िरों के लिए चाय-पानी का थोड़ा-सा निज़ाम ही हो जाए, चुनांचे उसको जो जेब खर्च मिलता था उसने उसमें से मुसाफ़िरों के लिए चाय-पानी का नज़्म कर दिया। अब मुसाफ़िर और ख़ुश हो गए और उस औरत को और ज़्यादा दुआएं देने लगे। वक़्त के साथ-साथ लोगों में यह बात बहुत पसन्द की जाने लगी कि अल्लाह की नेक बन्दी ने लोगों की तकलीफ़ को दूर कर दिया, यहां तक कि उसको और चाहत हुई। उसने अपने ख़ाविन्द से कहा कि अल्लाह ने हमें बहुत कुछ दिया हुआ है, हम अगर खाने के वक्त में उन मुसाफ़िरों को खाना भी खिला दिया करें तो उसमें कौन-सी बड़ी बात है, अल्लाह के दिए हुए में से हम ख़र्च करेंगे।

चुनांचे ख़ाविन्द मान गया। नेक बीवियां अपने ख़ाविन्दों से नेकी के काम करवाया करती हैं। यह नहीं होता कि कोई तो ताज महल बनवाए और कोई गुलशन आरा का बाग़ बनवाए। यह तो बेवक़ूफ़ी की बातें हैं कि दुनिया की चीजें बनवा लें, यह क्या यादगार हुई। यादगार तो वह थी जो ज़ुबैदा खातून ने छोड़ी कि जिनकी नहर से लाखों इंसानों ने पानी पिया और अपने नामाए आमाल में उसका अज्र लिखा गया। तो नेक बीवियां अपने ख़ाविन्दो से हमेशा नेक कामों में ख़र्च करवाती हैं। चुनांचे शौहर ने मुसाफ़िरों के लिए खाने का इंतिज़ाम भी कर दिया। लिहाज़ा जब मुसाफ़िरों को खाना भी मिलने लगा तो बहुत-से मुसाफ़िर रात में वहां ठहर जाते, और अगले दिन बस पकड़कर अपनी मंज़िल की तरफ़ रवाना हो जाते यहां तक कि वहां पर सौ पचास मुसाफ़िर रहने लग गए। खाना पकता लोग खाते और उसके लिए दुआएं करते। अब कुछ लोग ज़रूरत से ज़्यादा ख़ैरख्वाह भी होते हैं, जो ख़ैरख़्वाही के रंग में बदख़्वाही कर रहे होते हैं, दोस्ती के रंग में दुश्मनी कर रहे होते हैं।

चुनांचे ऐसे आदमियों में से एक-दो ने उसके ख़ाविन्द से बात की कि तुम्हारी बीवी तो फ़ुज़ूल ख़र्च करती है, सौ पचास बन्दों का खाना रोज़ पक रहा है, यह फ़ारिग क़िस्म के लोग, निखट्टू और नालायक़ क़िस्म के लोग आकर यहां पड़े रहते हैं, खाते रहते हैं। तुम्हें अपने माल का बिल्कुल एहसास नहीं, यह तो तुम्हें डुबोकर रख देगी। उन्होंने ऐसी बातें कहीं कि ख़ाविन्द ने कहा कि अच्छा हम उनको चाय-पानी तो देंगे अलबत्ता खाना देना बन्द कर देते हैं। चुनांचे खाना बन्द कर दिया गया। जब औरत को पता चला तो उस औरत के दिल पर तो बहुत सदमा गुज़रा, मगर औरत समझदार थी वह जानती थी कि मौके पर कही हुई बात सोने की डलियों की मानिन्द होती है, इसलिए मुझे अपने ख़ाविन्द से उलझना नहीं चाहिए, मौके पर बात करनी है ताकि में अपने ख़ाविन्द से बात कहूं और मेरे ख़ाविन्द को बात समझ में आ जाए। चुनांचे दो-चार दिन वह ख़ामोश रही। एक दिन वह ख़ामोश बैठी थी। ख़ाविन्द्र ने पूछा कि क्या मामला है? ख़ामोश क्यों बैठी हो? कहने लगी कि बहुत दिन हो गए घर में बैठे हुए सोचती हूं कि हम ज़रा अपनी ज़मीनों पर चलें, जहां कुंआ है, ट्यूबवेल है, बाग़ है। कहने लगा, बहुत अच्छा! मैं तुम्हें ले चलता हूं।

चुनांचे ख़ाविन्द अपनी बीवी को लेकर अपनी ज़मीनों पर आ गया जहां बाग़ था, फल फूल थे, वहां ट्यूबवेल लगा हुआ था। चुनांचे वह औरत पहले तो थोड़ी देर फूलों में, बाग़ में घूमती रही और फूल तोड़ती रही फिर आख़िर में आकर वह कुंए के क़रीब बैठ गई और कुंए के अंदर देखना शुरू कर दिया। ख़ाविन्द समझा कि वैसे ही कुंए की आवाज़ सुन रही है पानी निकलता हुआ देख रही है। काफ़ी देर जब हो गई तो ख़ाविन्द ने कहा कि नेकबख्त चलो घर चलते हैं । कहने लगी कि हां बस अभी चलते हैं और फिर बैठी रही। तीसरी मर्तबा उसने फिर कहा कि हमें देर हो रही है मुझे बहुत से काम समेटने हैं चलो घर चलते हैं। कहने लगी कि जी हां चलते हैं और कुंए में ही देखती रही, उस पर ख़ाविन्द क़रीब आया और कहा कि क्या बात है? तुम कुंए में क्या देख रही हो ? तब उस औरत ने कहा कि मैं देख रही हूं कि जितने डोन कुए में जा रहे हैं सबके सब कुंए से भरकर वापस आ रहे हैं लेकिन पानी जैसा था वैसा ही है, ख़त्म नहीं हो रहा। इस पर ख़ाविन्द मुस्कुराया और कहने लगा कि अल्लाह की बन्दी भला कुंए का पानी भी कभी कम हुआ है यह तो सारा दिन और सारी रात भी अगर निकलता रहे और डोल भर-भरकर आते रहें तब भी कम नहीं होगा। अल्लाह तआला नीचे से और भेजते रहते हैं।

जब उस मर्द ने यह बात कही तब वह समझदार खातून कहने लगी अच्छा यह इसी तरह डोल भर-भरकर आते रहते हैं और पानी वैसा ही रहता है, नीचे से और आता रहता है? खाविन्द ने कहा कि तुम्हें नहीं पता! बीवी ने कहा कि मेरे दिल में एक बात आ रही है कि अल्लाह ने नेकियों का एक कुंआ हमारे यहां भी जारी किया था, मुसाफिरखाना की शक्ल में लोग आते थे और डोल भर-भरकर ले जाते थे तो क्या आपको ख़तरा हो गया था कि उसका पानी ख़त्म हो जाएगा। अल्लाह तआला और नहीं भेजेगा ? अब जब उसने मौके पर यह बात कही तो ख़ाविन्द के दिल पर जाकर लगी। कहने लगा कि वाकई तुमने मुझे कायल कर लिया। चुनांचे शौहर वापस आया और उसने दोबारा मुसाफ़िरख़ाने में खाना शुरू करवा दिया और जब तक यह मियां-बीवी जिंदा रहे मुसाफ़िरख़ाना के मुसाफ़िरों को खाना खिलाते रहे। तो यहां से यह मालूम हुआ कि नेक बीवियां फ़ौरन तुर्की-व-तुर्की जवाब नहीं दिया करतीं बल्कि बात को सुनकर खामोश रहती हैं, सोचती रहती हैं, फिर सोच कर बात करती हैं, अंजाम को सामने रखकर बात करती हैं, मौके पर बात करती हैं और कई मर्तबा यह देखा गया कि मर्द अगर गुस्से में कोई बात कर भी जाए तो दूसरे मौक़े पर वह ख़ुद माज़रत कर लेगा और कहेगा कि मुझसे गलती हुई।

लिहाजा अगर एक मौक़े पर आपने कोई बात कही, उस पर मर्द ने कहा कि मैं हरगिज़ नहीं करूंगा, आप ख़ामोश हो जाइए, दूसरे मौके पर वह ख़ुशी से बात मान लेगा। यह ग़लती हरगिज़ न करें कि हर बात का जवाब देना अपने ऊपर लाज़िम कर लें। इस ग़लती की वजह से बात कभी छोटी होती है, मगर बात का बतंगड़ बन जाता है और तफर्रक्रा पैदा हो जाता है और मियां-बीवी के अंदर जुदाइयां वाक्रेअ हो जाती हैं इसलिए अक्लमंद औरत “पहले तौलेगी और फिर बोलेगी”, इसलिए कि उसे पता है अगर में मौके पर बात कहूंगी तो इस बात का नतीजा अच्छा निकलेगा ।

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