Allah पर याकीन| नमाज (Namaz) की फ़ज़ीलत (benefits)|Hazratji Molana Yousuf| Dawat-e-Tabligh

‘हमारे रब अल्लाह (Allah) हैं’ तो बात ख़त्म न हुई, बल्कि यहां से शुरू हुई कि जब अल्लाह पालने वाले हैं, तो ग़ैरों से पलने का यक़ीन निकालो।

Allah पर याकीन| नमाज (Namaz) की फ़ज़ीलत (benefits)|Hazratji Molana Yousuf| Dawat-e-Tabligh
Allah पर याकीन| नमाज (Namaz) की फ़ज़ीलत (benefits)

परिचय

 हजरते अक़्स मौलाना शाह मुहम्मद यूसुफ़ साहब नव्वरल्लाहु मरक़दहू की आखिरी तक़रीर

कतवा यके अज्ञ रफ़ीक़े सफ़र, तारीख़ 29 जीक़ादा सन् 1384 हिजरी मुताबिक़ पहली अप्रैल 1965 ई० ववक़्ते शब जुमा बाद नमाज मग्रिव मक़ाम मस्जिद विलाल पार्क, लाहौर

नमदुहू व नुसल्ली अला रसूलिहिल करीम अम्मा बाद —

दुनिया की हर चिस Temporary है

अल्लाह तआला ने जो कुछ ज़मीन व आसमान में बनाया है, उसमें सब वक़्ती रखा है, वक़्ती पेट भरना, वक़्ती प्यास बुझाना, वक़्ती इज़्ज़त, वक़्ती जिल्लत, वक़्ती मौत, वक़्ती हयात, थोड़ी सी देर के लिए तन्दुरुस्ती है, फिर बीमारी है, थोड़ी देर लज़्ज़त, फिर तक्लीफ़ आती है, वक़्ती परवरिश, और वक़्ती ज़रूरतों का पूरा होना दुनिया की चीज़ों में रखा है और इंसान में जो कुछ रखा है, वह वक़्ती भी है और अबदी भी है, वक़्ती इज़्ज़त और अबदी इज़्ज़त, ऐसी ही राहत व सुकून और चैन व सेहत वक़्ती व अबदी। इंसान में जो दौलतें रखी हैं, वे एक तरफ़ दुनिया में कामयाब बनाने वाली हैं और दूसरी तरफ़ मरने के बाद अबदी कामयाबी दिलवाने वाली हैं। इसलिए एक इंसान की दौलत की क़ीमत सातों जमीन व आसमान नहीं बन सकते। अगर इंसान के अन्दर की दौलत बिगड़ जाए तो सातों आसमानों और ज़मीन से न बन सके और अगर इंसान की दौलत बन जाए और उसके अन्दर की माया उभरे, तो सातों आसमानों व ज़मीन की कामयाबी से ज़्यादा कामयाबी मिलती है। दौलत तो बहुत बड़ी चीज़ है। इस दौलत का पहला हर्फ़ और पहली ईंट ‘अल्लाह’ कहना है। आदमी ख़ाली ‘अल्लाह’ कहे, उसमें बोलने की दौलत रखी है। 

सब से बड़ी दौलत क्या है? 

यह अल्लाह कहना भी बहुत बड़ी दौलत है, क्योंकि लफ़्ज़ अल्लाह कहने वाला एक भी दुनिया में बाक़ी रहेगा, तो ज़मीन व आसमान इसी तरह खड़े रहेंगे। अगर एक भी ‘अल्लाह’ कहने वाला न रहा तो अल्लाह तआला सारे ज़मीन व आसमान को तोड़-फोड़ देंगे। अगर आदमी के अन्दर में कोई और दौलत भी न हो, सिर्फ़ एक दौलत जाहिर हो रही हो कि जुबान से अल्लाह कह रहा है, यह दौलत इतनी बड़ी है कि सातों आसमान व ज़मीन उस पर खड़े हैं, नमाज़-रोज़ा और हज व जकात कुछ भी न रहा, सिर्फ़ अल्लाह को माने और कहे ‘अल्लाह’, बस इतनी-सी दौलत इतनी बड़ी है कि इससे सातों आसमान व ज़मीन खड़े हैं। अगर इतनी दौलत भी न रहे तो पांच अरब इंसान भी हों, तो वे भी मरेंगे। दरिया, ख़ुश्की और हवा के सारे जानवर जमादात, नबातात सब ख़त्म होंगे, अगर इंसान के पास वह अल्लाह वाली दौलत न रहे, तो सब ख़त्म कर दिए जाएंगे। एक ‘अल्लाह’ कहना’ इतनी बड़ी दौलत है कि आसमान व ज़मीन उसी पर क़ायम हैं। कुरआन मजीद में है —

तर्जुमा – ‘जिन लोगों ने (दिल से) इक़रार कर लिया कि हमारा रब अल्लाह है, फिर (उस पर ) क़ायम रहे, उस पर फ़रिश्ते उतरेंगे कि तुम न अंदेशा करो, न रंज करो और तुम जन्नत (के मिलने) पर ख़ुश रहो, जिसका तुमसे (पैग़म्बरों के वास्ते से ) वायदा किया जाया करता था।’ ( हामीम सज्दा, रुकूअ 4)

Allah पर याकीन

अल्लाह रब हैं, यह लफ़्ज़ नहीं, बल्कि एक मेहनत है। अगर कहे कि मैं दुकान से पलता हूं या किसी खेती या मुलाज़मत या सियासत या हुकूमत से पलता हूं तो यह कहना लफ़्ज़ नहीं है, बल्कि एक मेहनत है । इतना कहने के बाद मेहनत शुरू हो जाती है कि ज़मीन ख़रीदता है, हल चलाता है, ग़ल्ला लाकर बेचता है, जानवर और मकान ख़रीदता है, निकाह करता है, ग़रज़ इस लफ़्ज़ के पीछे लम्बी-चौड़ी मेहनत की जिंदगी है। ऐसे ही जब कहा कि ‘हमारे रब अल्लाह हैं’ तो बात ख़त्म न हुई, बल्कि यहां से शुरू हुई कि जब अल्लाह पालने वाले हैं, तो ग़ैरों से पलने का यक़ीन निकालो। यह पहली मेहनत हुई कि मैं ज़मीन व आसमान और उसके अन्दर की चीज़ों से नहीं पलता, बल्कि अल्लाह से पलता हूं, इसको मेहनत करके दिल का यक़ीन बनाओ। इस यक़ीन को रग व रेशा में उतारने के वास्ते मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं। 

अल्लाह पालने वाले हैं

‘अल्लाह से पलता हूं’ इस बोल की हक़ीक़त दिल में उतारने के लिए मुल्क व माल, तिजारत व खेती की मेहनत नहीं है, बल्कि वह तो दिल से निकल कर जुबान पर आएगी, यानी अल्लाह की खूबियत के यक़ीन वाली मेहनत छोड़ कर मुल्क व माल वाली मेहनत पर लगेगा, तो अल्लाह की रबूबियत दिल से निकल कर जुबान पर रह जाएगी, नबियों वाली मेहनत और हुजूरे अक्रम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम वाली मेहनत इस लफ़्ज़ पर करनी होगी यानी मेहनत करके इस हक़ीक़त तक पहुंचो कि हमें सीधे-सीधे अल्लाह से पलना है, ख़ुदा को पालने में खेती और दुकान की ज़रूरत नहीं है, वह अपने हुक्मों से पालता है। अगर इसकी हक़ीक़त पैदा हो जाए, तो अमरीका और रूस भी तुम्हारी जूतियों में होगा, शर्त इतनी है कि सिर्फ़ जुबान का बोल न हो, दिल के अन्दर की हक़ीक़त हो, तो दुनिया में कामयाबी मिलेगी और क़ब्र के अज़ाब से बचोगे। हूरें, बाग़ और सोना-चांदी के मकान, हमेशा की जवानी, हुस्न व जमाल इसी पर मिलेगा इसी को दिल में फिट करने के लिए हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की रिसालत है कायनात में जो कुछ है, वह ताबे, महदूद और फ़ानी है और अल्लाह के पास ला महदूद ग़ैर-फ़ानी है। परवरिश उस ला महदूद की तरफ़ से है, इसलिए हुजूर सल्ल० के तरीके पर मेहनत करो, अल्लाह तर्बियत करने वाले हैं। अल्लाह को माबूद बनाकर अल्लाह की इबादत करके पलना है। अगर इबादत से पलने पर मेहनत करोगे, तब दिल में उतरेगा। इबादत नमाज़ है, नमाज़ तुम्हारे इस्तेमाल का अपना तरीक़ा है। ज़मीन या मोटर या जानवरों के इस्तेमाल के तरीके का नाम नमाज़ नहीं, बल्कि अपनी आंख, कान, नाक वग़ैरह को इस तरह इस्तेमाल करना सीखो, जैसे आपने इस्तेमाल किया। सोना, चांदी और कायनात से पलने में क्या है? ज़मींदारी यानी ज़मीन से ग़ल्ला लेने के एतबार से हमारे इस्तेमाल का तरीक़ा, तिजारत यानी दुकान से फ़ायदा लेने के एतबार से हमारे इस्तेमाल का तरीक़ा, हुकूमत यानी मुल्क से फ़ायदा लेने के एतबार से हमारे इस्तेमाल का तरीक़ा, नमाज क्या है? कायनात से नहीं, बल्कि अल्लाह तआला से दोनों दुनिया में लेने के वास्ते हमारे इस्तेमाल का तरीका यह नमाज है, हमको सिर्फ़ अल्लाह पालेगा, उसमें हमारा इस्तेमाल आप सल्ल० के तरीके पर होगा आपकी किस तरह सौर गार में हिफाजत हुई, बद्र में फह कहां से मिली? खंदक में हमले से कैसे बचे? इस सबके वास्ते जवाब मिलेगा कि नमाज पढ़कर ख़ुदा से मांगा, तो ख़ुदा ने किया। आपके जितने मसते हैं, अगर कोई पूछे तो यही जवाब मिलेगा कि नमाज से हुआ। उनकी जितनी इबादत आपने की है, किसी वली ने भी नहीं की। 

Prophet Mohammad की नमाज (Namaz)

हदीस में है कि आप सल्ल० ने इतनी लम्बी नमाज पढ़ी कि नमाज पढ़ते-पढ़ते सूखी मुश्क की तरह हो गए थे और रानों तक वरम आ गया था। अच्छे बहादुर भी, अगर नफ़्तों में आपके पीछे खड़े हुए तो सारे दिन बदन में दर्द होता, चार-पांच-छः पारों की एक रक्अत होती, एक बार जितना बड़ा क्रियाम, उतना ही बड़ा रुकूज, क्रीमा, सज्दा और जलसा किया। आपने ऐसी चार आतें पढ़ीं, जो सहाबी आपके पीछे खड़े थे, उनका बुरा हाल हुआ। आपने सुबह को फ़रमाया, अगर मुझे पता होता तो में मुख्तसर कर देता। आपने इबादत करके अल्लाह को राजी किया। अल्लाह ने कहा, मांगो, आपने क्रियामत तक उम्मत का पलना मांगा कि कोई दुश्मन उसका नाम व निशान न मिटा सके और उस उम्मत की बख्शिश का और आख़िरत की निजात का फ़ैसला करा दिया। अब चाहे कितने ही गुनाह करे, आपका माफ़ी चाहना क़ुबूल हुआ।

आप सल्ल० ने कहा कि आपस में लड़ाई न हो, यह दुआ मांगी। अल्लाह ने फरमाया, यह तो होगा, दुनिया में बदअमली की सजा होगी। जो कुछ अल्लाह से मनवाया, उसके लिए आपने क्या रास्ता अख्तियार किया? ख़ुदा जाने कितनी लम्बी मुद्दत है, क्रियामत तक का बना ते करा दिया और आखिरत की मफ़िरत करा दी, यह किस बात पर हुआ? ऐसी नमाज पढ़ी कि अल्लाह को तरस आया। जब आप नमाज़ पढ़कर इस उम्मत के लिए रोते ये तो जमीन तर हो जाती थी। हजरत जिब्रील अलैहि० को अल्लाह ने भेजा कि जाकर पूछो, इतना क्यों रो रहे हो? फ़रमाया कि उम्मत के लिए रो रहा हूं जवाब दिया कि रोओ मत, हम इस उम्मत के बारे में आपको खुश कर देंगे। यह इबादत और नमाज़ पर किया, एक दिन इतना लम्बा सज्दा किया कि सहाबा किराम रजि० को गुमान हुआ कि आपका इंतिकाल हो गया। आपने फ़रमाया कि काम हो गया। उम्मत की मग्फ़िरत की बशारत मिल चुकी, यह उसके शुक्रिए में इतना लम्बा सजदा किया था। आप सल्ल० ने फ़रमाया कि जूते का तस्मा भी टूटे, तो अल्लाह से मांगो, ‘अल्लाह हमारे रव हैं, इसकी हक़ीक़त यह है कि नमाज़ के ज़रिए मसले हल कराओ, वरना जुबान पर रहेगा कि ‘अल्लाह रब हैं’, लेकिन जब नमाज़ पर मेहनत करके रोटी, औलाद, मकान, सेहत, इज़्ज़त और अम्न के मसाइल हल कराए जाएं, तो नमाज़ से होगा। शख़्सी मसलों का हल शख़्सी नमाज़ से होगा और मुल्क के मसले मुल्की नमाज से हल होंगे इंफिरादी शहरी देहाती मसलों को नमाज पर मेहनत करके अल्लाह से हल कराओ। यह रब होने की मेहनत है ।

नमाज (Namaz) से समस्याएं (Problem) हल होते हैं

आप सल्ल० ने सारे सहाबा को मेहनत पर डाला, किसरा व क़ैसर अमरीका व रूस की तरह थे, दोनों ब्लाकों के खजाने अल्लाह ने क़दमों पर डाले और देहाती लोग गवर्नर बने, यह सब कुछ नमाज से हुआ। हजरत उमर रज़ि० के ज़माने में फ़तूहात हुईं, फिर बाद में बड़ा भारी जबरदस्त क़हत पड़ा, चारों तरफ़ से लोग मदीना आए। हजरत उमर रजि० ने इंतिज़ाम शुरू किया और दुआ की कि ये लोग मरने न पाएं, भारी इंतिज़ाम था। हज़रत अम्र बिन आस रजि० को मिस्र में ख़त लिखा कि जल्दी से ग़ल्ला भेजो, जवाब दिया कि खाने-पीने का सामान लाद कर ऊंटों का इतना बड़ा क़ाफ़िला भेजूंगा जिसका पहला ऊंट मदीना में और आख़िरी मिस्र में होगा। (चुनांचे गल्ला आया, उस वक़्त) चालीस-पचास हज़ार आदमी तो हज़रत उमर रजि० के दस्तरख्वान पर रोजाना खाना खाते थे। देहात में अगर एक घर भी होता तो खाना वहां भी भेजा जाता, बहुत लम्बा चौड़ा इंतिज़ाम किया मगर कहत बढ़ रहा था। उसी जमाने में एक साहब ने एक बकरी जिव्ह की, तो उसमें सिवाए हड्डी, खून और खाल के कुछ न निकला, इसके बाद आदमी की चीख निकली और कहा, ‘वा मुहम्मदाह (हाय, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम !) आंखों में से आंसू निकल पड़े, पड़ कर सो गए, ख्वाब में हुजूर सल्ल० की जियारत हुई। फ़रमाया कि उमर को मेरा सलाम कहकर कहो, तू तो अक्लमंद था, क्या हुआ? आंख खुली तो हज़रत उमर रजि० के दरवाजे पर जाकर कहा कि या अमीरुल मोमिनीन ! अजिब रसूलल्लाहु सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, यानी हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पैग़ाम लाने वाले को जवाब दो। हज़रत उमर रजि० भूल में आपका ज़माना जान कर दौड़े। दरवाज़े पर याद आया कि यह हुजूर सल्ल० का जमाना नहीं है। यह सुनकर हज़रत उमर कांप उठे और कहा कि मेरी जिंदगी में फ़र्क आ गया। सारे मदीना के लोगों को जमा करके पूछा, मैं आप सल्ल० की जिंदगी से बदला तो नहीं? लोगों से कहा कि नहीं, फ़रमाया कि यह आदमी क्या कहता है? ख़्वाब सुना तो सबने जाना, सिर्फ़ हज़रत उमर रजि० ने न समझा। मतलब यह है कि जब तुम्हारी नमाज़ और दुआ कुबूल है तो इज्तिमाअ के चक्कर में क्यों फंसे ? दुआ क्यों नहीं मांगते ? हज़रत उमर रजि० ने वहीं बारिश की दुआ मांगी, क़हत दूर होने की दुआ मांगी, मुख़्तसर सी दुआ थी ‘अल्लाहुम-म इन्ना नस्तरिफ़रु-क व नस्तस्की-क’ मुंह पर हाथ फेरने से पहले बारिश शुरू हो गई। जानवरों में जान पड़नी शुरू हुई। देहातियों ने कहा कि चारों तरफ़ से बादलों में से यह आवाज़ आ रही है !  ऐ उमर रजि०! तूने बारिश मांगी, आ गई। ऐसी नमाज़ अल्लाह के रब होने की बुनियाद पर पढ़ी थी । अल्लाह पालने वाले हैं तो नमाज़ पर मेहनत करके हुज़ूर सल्ल० वाली नमाज़ बनानी पड़ेगी, फ़ज़ाइल और मसाइल पर भी मेहनत करनी पड़ेगी। वुज़ू, इमामत, इक्तिदार के मसाइल पर भी मेहनत करनी पड़ेगी, जो न आएं, उनके लाने के लिए भी मेहनत करनी पड़ेगी। सूरत बनाकर सीरत बनाओ, न आने वालों को मस्जिद में लाओ और सिखाओ। सहाबा किराम के जमाने में जबरदस्त मेहनत करके मैदान क्लायम किए गए थे, अल्लाह के रब होने की बुनियाद पर नमाज का क्रियाम था । शरीफ़ इंसानों का ऊपर आना और इंसानों की जिंदगी का बनाना यह सब जब होगा कि आपके तरीके की नमाज को दुनिया में कायम करने की मेहनत करो, तुम ख़ुद न करोगे, बल्कि ख़ुदा करेगा। दुकान खेत से पलने के मंसूबे के बजाए अल्लाह से पलने के लिए नमाज पर मेहनत करनी होगी। यह जबरदस्त मेहनत है।

नमाज (Namaz) की फ़ज़ीलत (benefits)

पहले तो ‘ला रब-ब इल्लल्लाहु’ मेहनत का मैदान हैं, फिर ऐसी नमाज़ कर लो कि ‘अल्लाहु रब्बुना’ की तर्तीब क़ायम हो, ऐसी नमाज्ञ बनाओ कि ईमान पर खात्मा हो और क़ब्र के अज्ञाब से हिफ़ाज़त हो और क़ियामत में रौशनी मिले। नमाज़ को तर्बियत के लिए चालू करो, अपनी कमाई में से वक़्त निकालो और खेती से पलने के यक़ीन को ख़त्म करो, अल्लाह से पलने का यक़ीन पैदा करो, इसी की दावत दो। जाते इलाही के ख़ज्ञानों की अज़्मत और बड़ाई को सुनो और इतना सुनो कि वह जात तुम्हारी आंखों के सामने आ जाए यानी अल्लाह की इबादत इस तरह करो कि गोया कि ख़ुदा को देखता है। यह उस वक़्त होगा कि ज्ञात व सिफ़ात को देखे, कलिमा, नमाज़ के फ़ायदों का इल्म अन्दर लेना होगा, ज़िक्र व इख्लास से लेना होगा, अपने अन्दर पैदा करना और दूसरों के अन्दर पैदा कराने की मेहनत करना, यह मस्जिद का काम हुआ, दुकान, खेत का यक़ीन हटाना है और मस्जिद वाले आमाल का यक्क़ीन लाना है।

Namaz से बुराई को खत्म करना

अदावत, इग्वा, चोरी, डकैती सब रुकेंगे। अगर आप वाली सारी चीजें मेहनत करके मस्जिद में चला दी जाएं। अल्लाह को अल्लाह और रब कहने की बुनियाद पर यह मेहनत होगी, इसके लिए मस्जिद की चीजें चलाओ। आपने मस्जिद की चीजें भूखे और प्यासे रहकर चलाई थीं, सर्दी से बदन कपकपा रहे हैं और मस्जिद में तालीम चल रही है। हज़रत अबू सईद ख़ुदरी रज़ि० कहते हैं कि सहाबा किराम रजि० का मज्मा था। आप आकर खड़े हुए, उनमें से मुझे पहचाना और आप बैठ गए और फ़रमाया कि ऐ फ़क़ीरों और मुहाजिरों के गिरोह ! मालदारों से पांच सौ वर्ष पहले जन्नत में जाओगे इसके लिए इमामत, इक्तिदा, खुशूअ-खुजूअ सफ़ सीधी करना, इन सब बातों पर मेहनत है वह नमाज बने जिस नमाज से ख़ुदा दुनिया की तर्तीब बदले, जालिमों को जिना करते हुए सजा दें, उसके लिए नमाज़ का माहौल बने, फिर ताक़त का मुजाहरा होगा। अगर अल्लाह को रब मानते हो तो यह मेहनत करो कि अल्लाह रब हैं, वह नमाज़ पर और नमाज की तालीम पर पालेंगे, सेहत देंगे, क़र्ज़ दूर करेंगे, इसे बैठकर सुनो, फ़ज़ाइल की तालीम होगी, तो मालूम होगा कि बाहर वालों का बचाव मस्जिद के अन्दर की आबादी से है, बरना बेड़ा गर्क होगा। यह हदीस है। ये बातें मुख्बिरे सादिक़ सल्ल० की बातें मालूम होंगी। हम इज़्ज़त, हिफ़ाज़त और गिना कहां ढूंढ रहे हैं? और यह इज़्ज़त, हिफ़ाज़त और ग़िना है कहां? तुम्हें सब चीजें नमाज़ में मिलेंगी। दावत, तिलावत, कुरआन वगैरह पर यक़ीन हो, नमाज़ के बाहर और अन्दर भी यक़ीन भरा हो। अल्लाहु अक्बर कहकर ‘सुब-हा-न कल्लाहुम-म’, फिर ‘अल-हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन’ कहे यानी तर्बियत करने वाले अल्लाह हैं, सारे आलम की तर्बियत करने वाले ‘इय्या कनअबुदु’ यानी हम इबादत पर तर्बियत करेंगे और क्रियाम व रुकूअ इबादत है, इस पर ख़ुदा पालेंगे। अगर मेरा रुकूअ और क़ुरआन पढ़ना और इस्तिक्बाले क़िबला आप सल्ल० के तरीके पर आ गया, तो अल्लाह मुझे पालेगा, पालने वाला इबादत पर पालेगा क़ियाम आपके वाले तरीक़े पर होगा, तो पालेगा। सुबहा-न रब्बियल अज़ीम’ में भी यही बात है कि तर्बियत करने वाले अल्लाह हैं, इबादत पर तर्वियत करेंगे, रुकूअ इबादत है, सर, कमर, कूल्हे आपके तरीके पर होंगे तो अल्लाह पालेंगे। हर-हर हिस्से पर ख़ुदा से परवरिश का यक़ीन जमाओ, जलसे में ‘रब्बिरिफरली’ कहा, यानी अल्लाह पालने वाला है।

Namaz को ठीक कैसे किया जाए?

नमाज़ किस बात से ठीक होगी? ईमान, जिक्र वगैरह ठीक किया जाए। यक़ीन, नीयत, शक्ल, शौक़ और ध्यान बनाओ, अपने में बनाओ, दूसरे में मेहनत करो, अपने मुहल्ले में और दूसरे मुहल्ले में गश्त करो। शहर और गांव में कोई बे-नमाजी न रहे, सारी दुनिया में कोशिश करो। नुबूवत मिलने के बाद आपने इंसानों से लेने का कोई रास्ता अख्तियार नहीं फ़रमाया, आपने तायफ़, सबूक, यमन, हजरमीत और नज्द वालों को नमाज़ बताई, जो कलिमा पढ़े, नमाज बनाने की मेहनत करे। जब यकीन बने कि अल्लाह रब है और रास्ता नमाज है, यह दुनिया में चले तो दुनिया की तर्तीव बदलेगी, नमाज को अन्दर से बनाओ। मसले का अन्दर से ताल्लुक है। जब यह बना लो तो नमाज की बुनियाद पर तीन लाइन ठीक करो। घर, कारोबार और मुआशरत ।

Namaz के zariye Allah से लेना

हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के वे तरीके लाओ, जो अल्लाह की ज्ञात से पलने के लिए दिए हैं। आप सल्ल० के रास्ते में भी कमाई और घर है और इंसानों के रास्ते में भी कमाई और घर के नक्शे हैं। रब की बुनियाद पर नमाज़ और नमाज़ की बुनियाद पर कमाई, यानी जब कमाई से परवरिश नहीं, बल्कि अल्लाह से परवरिश है तो अल्लाह का हुक्म मान कर लेंगे। जब यह बात है तो फिर क्यों कमा रहा है? पहले नमाज़ से परवरिश ली, लेकिन नमाज़ के बाद दो रास्ते हैं, कमाना और न कमाना। अगर न कमाया और सिर्फ़ नमाज पढ़कर अल्लाह से ले तो ठीक है। इसमें सिर्फ यह शर्त है कि अगर न कमाओ तो किसी मख़्लूक़ का माल न दबाना और हाल का इज़्हार न करना, सवाल न करना, इसराफ़ न करना, तक्लीफ़ पहुंचे तो जज़ा फ़ज़ा न करना, अल्लाह से राज़ी रहना। अगर इतनी बात आ जाए तो कमाई की ज़रूरत नहीं। इसकी मिसाल के लिए चारों सिलसिले के औलिया अल्लाह हैं और हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं, हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम हैं और अस्हाबे सुफ़्फ़ा हैं और लाखों मिसालें हैं कि सिर्फ़ नमाज़ से काम चलाया। 

हलाल (Halal) कमाई

अगर कमाना है, तो उस पर भी पाबन्दी है, अगर न कमाना हो, तो ग़सब, इसराफ़, सवाल, जज़ा, फ़ज़ा और घबराहट न हो, अगर कमाते हो तो यह बुनियाद है कि कमाई से न मिलेगा, अल्लाह से नमाज़ पर मिलेगा और आपके तरीक़े से कमाई पर मिलेगा, फिर ख़ुदा देगा। मैं पैसे के लिए नहीं कमाऊंगा, बल्कि आपके तरीक़े कमाई में चलाने हैं, कमाना हुक्म को पूरा करने के वास्ते है, हम यक़ीन करते हों कि सिर्फ़ अल्लाह पालेगा। हम तस्वीर और बदमाशी के नावेल नहीं बेचेंगे, हराम से नहीं कमाना है, जो चीजें हलाल हैं, उनसे कमाने के दो तरीक़े हैं। उसमें एक तरीक़ा हलाल है, दूसरा हराम है। सुवर, कुत्ता, बिल्ली इनका खाना हराम है। बकरी, गाय, मुर्गी, हिरन हलाल है। इनमें भी हराम व हलाल बनेगा। अगर बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अक्बर कहकर जिव्ह किया, तो हलाल, वरना हराम होगा, बकरी को बीच से मार कर बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अक्बर कहा तो भी हराम बनेगा क्योंकि तरीक़ा ग़लत था। पहले तो कमाई की क़िस्म है कि हला पर है या हराम पर है, फिर हलाल में भी तरीक़ा हलाल है या हराम है? अगर अल्लाह के रव होने का यक़ीन है तो आपका तरीक़ा चालू करने पर आवें। ख़ुदा की रिज्ञा के लिए कमाइए, फ़ज़ाइल के शौक़ और मसाइल की पाबन्दी के साथ कमाइए। जो बात नमाज़ में कही, वही कमाई में कही, अब कमाई, तिजारत, ज़राअत (खेती) में राब्ता ख़ुदा की ज्ञात में हो, तो दुनिया में चमकना और फलना-फूलना होगा । ज़लज़ला, सैलाब, बमबारी में दुकान और घर का बाल बांका न होगा। क्योंकि महबूब का तरीक़ा है, चाहे दुकान मिट्टी की है, आप सल्ल० का तरीक़ा है तो एटम से ज़्यादा ताक़तवर है, फिर कमाई की बुनियाद पर घर चलावेंगे। 

कुछ लिबास हराम और कुछ हलाल हैं, खाना और तर्ज़ कुछ हराम, कुछ हलाल हैं। इस यक़ीन को लो कि अल्लाह रब हैं, आपके तरीक़े पर पैसे खर्च करेंगे, लिबास और ग़िज़ा की तर्तीब आपके तरीके पर होगी तो अल्लाह पालेगा। आपके तरीक़े का झोंपड़ा किसरा के क़िले से बेहतर है, मुश्किीन, मुलहिदीन, फुस्साक़ व हुज्जार की ढाई लाख की कोठी से बेहतर है। पांच रुपए की झोंपड़ी में वह ख़ैर है जो पचास लाख की कोठी में नहीं है, इसका नाम ईमान है।

हलाल (Halal) कमाई कहा खर्चे  करे?

आपके (prophet Mohammad) तरीके का सवा रुपए का कुरता मज़ेदार होगा। यहूद व नसारा के तर्तीब वाले पचास लाख के कपड़े से उसमें वह मज़ा नहीं है। आप सल्ल० के तरीक़े पर अल्लाह पा लेंगे और यहूद व नसारा के तरीके पर घर का नक्शा आया तो ख़ुदा पालेगा, वरना बिगाड़ेगा। शादी के तरीक़े, दवा-दारू, वलादत व मौत के तरीक़े में भी आप सल्ल० के तरीक़ आवेंगे, अपने तरीक़े बदल कर आप सल्ल० के तरीक़े लो। अगर तुमने इन घरों को यहूद व नसारा के तरीक़े पर रखा तो पानी की बौछार और ज़मीन का झटका उसे तोड़ देगा। अगर आपका तरीक़ा है तो एटम बम भी नहीं तोड़ सकेगा ।

लोहा, पत्थर मस्जिद में लगाया, बे-क़ीमत है, क्रीमती तो आप सल्ल० के तरीक़े हैं। आपके बदन से जो तरीक़ चले, वे क़ीमती हैं। हुक्म ख़ुदा का हो और तरीके आपके हों, अगर सारी दुनिया की कोठी हीरे-जवाहरात हों तो आपके पाख़ाना फिरने की सुन्नत उससे क़ीमती है। आगे मुआशरत है। जब कमाई और ख़र्च आप सल्ल० के तरीके पर लाओ तो ग़नी बनोगे। अमरीका और रूस और सारी दुनिया फ़ज़ की दो रक्अत के बराबर भी नहीं। एक आदमी पांच हजार रुपया लेकर अफ्फ़ीक़ा गया, वहां बहुत नमाज़ी बने, इंग्लिस्तान और फ्रांस में मस्जिदें बनीं, इसलिए माल यहां ख़र्च करो। जिंदगी सादा बनाओ, तो कमाई की हवस न रहेगी। कमाई की हवस हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, हज़रत अबूबक्र व उमर वग़ैरह रज़ियल्लाहु अन्हुम के नक्शे पर आने के लिए नहीं है, बल्कि क़ारून, फ़िरऔन, शद्दाद और शराबियों और ज्ञानियों के तरीक़े पर आने के लिए है। ख़ूब पैसा और वक़्त बचेगा, जबकि आपकी तर्बियत के तरीक़ों पर आओ। अमीर व ग़रीब को जोड़ा तो सारी दुनिया की इंसानियत पर भारी एहसान होग, ख़ुदा ख़ुद बदला लेगा। एक-एक नमाज़ पर सातों ज़मीन व आसमान से बड़ी जन्नत मिलेगी, फिर मुआशरत है, दुनिया में इंसाफ़ चलाना है, हम लाखों की बिल्डिंग में रहे और लोगों को झोंपड़ा भी न मिले, यह जुल्म है इंसाफ़ नहीं।

Prophet Mohammad ने पैसे कहा खर्चे  किया? 

ये यहूद व नसारा दूसरों का ख़ून पीते हैं, उनकी नक़ल उतारने में मजा आता है और जिस ज्ञाते गिरामी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़ाक़ा (bhook) बरदाश्त किए और अपना ख़ून बहाया, उनके तरीक़े पसन्द नहीं आते। आपके ख़ून के कई क़तरे बहे, एक वक़्त का फ़ाक़ा और ख़ून का एक क़तरा सारी दुनिया से अफ़ज़ल है उश्शाक़ माल देते थे और आप उम्मत की ज़रूरत पर माल लगा कर फ़ाक़ा करते थे। हज़रत फ़ातमा रज़ियल्लाहु अन्हा बीमार थीं, हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु ने अबू जहल की बेटी से निकाह करने का इरादा किया, आपने मिंबर पर खड़े होकर फ़रमाया कि मैं हलाल को हराम नहीं कहता, लेकिन इस निकाह से फ़ातमा को तकलीफ़ होगी और उसकी तकलीफ़ से मुझे तक्लीफ़ होगी, इतनी महबूब बेटी की शादी में पचीस रुपए भी न लगाए। हज़रत फ़ातमा रजि० ख़ुद चक्की पीसती थीं। हज़रत अली रजि० मज़दूरी करते हैं, मशक ढोते हैं, छः बच्चे परवरिश पाते हैं। हुजूर सल्ल० के पास गुलाम-बांदी आए। हज़रत अली रजि० ने हज़रत फ़ातमा रजि० को भेजा कि गुलाम- बांदी मांगो, हाथ बटाएंगे। हज़रत अली रजि० ने हाथ और कोख दिखाई और हज़रत फ़ातिमा रजि० ने भी हाथ कोख दिखाए और गुलाम और बांदी मांगे। आपको गुस्सा आया, फ़रमाया, तुम्हें तो बांदी और गुलाम दूं और मेरी उम्मत भूखी रहे। आपने अपने को और अपनों को क़ुर्बान करके उम्मत बनाई है। तुम अपने ऐश को क़ुर्बान करके उम्मत को बचाओ। 

सब के सात इंसाफ़ करो

क़ौम, वतन, क़बीले के बन के न चलो, अल्लाह के बनकर चलो। परदेसियों और मक़ामियों का मसला हो तो उसे ज़ुल्म का नारा न बनाओ, सिंधी और पठान कहा तो यह जुल्म का नारा है। जब आदमी जुल्म करे, जाहिलियत और असबियत पर मदद करे तो नमाज़, रोज़ा मुंह पर फेंक कर मार दिया जाता है, यहां तक कि मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम मसला भी नहीं है। मुस्लिम ने हिन्दू को मारा और मुस्लिम की मदद की तो तुम जालिम बने, हर मसले में वाक़िया की तह्क़ीक़ करो। सिंधी ने पंजाबी को पीटा, पंजाबी ने पठान का माल दबाया, अब कहो कि जुल्म और इंसाफ़ का मसला है। मुसलमान से इंसाफ़ दिलाना है, इंसाफ़ वाले सरों पर आते हैं और जुल्म वाले पैरों पर गिरते हैं। इंसाफ़ पर ख़ुदा ऊपर लाएगा। क़ौमियत, उबूवत, नुबूवत की बुनियाद पर मदद होगी कौन है ? कौन ज़ालिम मज़्लूम है, यह देखा जाएगा। 

Allah महफ़ूज़ करेगे 

इन तीनों लाइनों में अल्लाह को रब मानकर आपके तरीके पर आओ तो राकेट और एटम बम से ख़ुदा महफ़ूज़ करेगा। आप सल्ल० के तरीके पर करेगा। आपके तरीक़े टूटने पर न मानने वालों को पैरों पर डालता है और मानने वालों को सरों पर लाता है। पहले इबादत को ताक़तवर बनाओ, फिर तीनों लाइनों को अल्लाह के रब होने पर और आप सल्ल० के तरीक़े पर उठाओ तो ख़ुदा मदद करेगा, इसलिए आपने कमाई और घर की तर्तीब बनाई। इस पर आना आसान होगा, अल्लाह आसान करेगा।

यूरोप वाले ख़ून लेने वाले हैं और अपना ख़ून देने वाले हैं, तो अब बताओ कि हाल के मुश्रिक, मुल्हिद और यहूद व नसारा ने जो ख़ून किया है उसे देखोगे तो आपका तरीक़ा महबूब बनेगा, जब अल्लाह के रब होने का यक़ीन हो,

Jammat ( अल्लाह के रास्ते) में जने की तर्तीब (Tarike)

 इसलिए आपने वक़्तों की तर्तीब क़ायम की, साल भर में चार महीने मदनी सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम अपना माल लेकर ख़ुदा के रास्ते में निकले ताकि इबादत का माहौल दुनिया में क़ायम हो और आठ माह अपने मक़ाम पर रहते हुए आधा दिन मस्जिद में और आधा दिन कारोबार में, आधी रात मस्जिद में और आधी रात घर में । इसके एतबार से चार महीने मक़ामी इबादत का माहौल बनाने के लिए दो महीने कारोबार और दो महीने घर के लिए और चार महीने बाहरी नक़ल व हरकत करते हुए, इबादत का माहौल बनाने के लिए।

जब एक तबक़ा मदनी सहाबा रजि० की तर्तीब पर पड़ जाए, तो दुनिया में दीन फैले और यह तो आला तर्तीव हैं और दूसरी अदना तर्तीब है और वह यह है कि एक बार चार महीने दे और हर साल चालीस दिन और हर महीने तीन दिन और हर हफ़्ते में दो गश्त और रोजाना की तालीम और तस्वीहात की पाबन्दी और हफ़्तेवारी इज्तिमाअ । यह तर्तीब ऐसी है जैसे उंगली कटवा कर शहीदों में नाम लिखवाना । हर हफ़्ते में बिलाल पार्क के इज्तिमाअ में रात गुजारें । इबादत की यह तर्तीब क़ायम करो, किसी दिन नमाज़ ताक़तवर बन जाएगी और ख़ुदा तुम्हें उस रास्ते पर चमका कर रहेंगे। अब बोलो, कौन किस तर्तीब पर आता है।

आखिरी Waqut 

इस बयान के बाद लोगों से चिल्ला, तीन चिल्ले के औक़ात की तश्कील की गई। इसके बाद एक साहब का निकाह पढ़ाने की दरख्वास्त की गई । हज़रत जी रह० ने निकाह पढ़ाया, तबियत चूंकि पहले से मुज़्महिल चल रही थी, इसलिए कि मश्क़िी और मरिबी पाकिस्तान का लगभग डेढ़ माह से ज्यादा का सफ़र रहा, जिसमें शब व रोज़ इंतिहाई मेहनत व जांफ़शनी की वजह से राहत व आराम का मौक़ा नहीं मिला था, इसलिए अपनी हमेशा की आदत के ख़िलाफ़ सिर्फ़ एक मिनट की दुआ फ़रमा कर क़रीब की क़ियामगाह की तरफ़ तशरीफ़ ले जा ही रहे थे कि साद बिन हाफ़िज़ मुहम्मद सिद्दीक़ नूही को बुलाकर फ़रमाया कि मुझे चक्कर आ रहे हैं और उसका हाथ पकड़ कर चलते रहे, यहां तक कि अचानक वे ज़मीन पर बैठते चले गए। गिरते ही पसीनों में तरबतर हो गए। मुश्किल से चारपाई पर लाद कर लिटाया गया, बेहोशी तारी हो गई। हकीम साहब ने दवा खिलाई। कुछ मिनट के बाद होश आया इशा की नमाज़ दो आदमियों के साथ मिलकर रात को साढ़े तीन बजे अदा की, फिर सुबह के वक़्त सुबह की नमाज़ अदा फ़रमाई। मौलाना इनामुल हसन साहब को अपनी किताबों की ज़कात निकाल देने की वसीयत की डॉक्टर साहब ने मुआयना करके कहा कि अब ख़तरे से बाहर हैं, मगर शदीद एहतियात की जाए। जब सब लोग जुमा की नमाज़ के लिए मस्जिद चले गए तो फिर हालत मुतग़य्यर हो गई। दो आदमियों के साथ मिलकर नमाज़ इशारे से अदा फ़रमाई, लेकिन सांस उखड़ चुकी थी। बार-बार ‘रब्बियल्लाहु रब्बियल्लाहु ‘ पढ़ रहे थे। अह्वाब जुमा के फ़र्ज़ अदा करके आए। आपने फ़रमाया, शायद आख़िरी वक़्त है। सब लोग कुरआन पढ़ें और जिक्र करें और ख़ुद हिज्बुल आज़म की दुआएं पढ़ने में मश्गूल हो गए, ख़ास तौर से वह दुआ, जो हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मक्का की फ़तह के वक़्त पढ़ रहे थे, यानी ला, इला-ह इल्लल्लाहु वह्दहू अन-ज-ज वह्दहू व न-स-र अब्दहू व ह-ज-मल अहज़ाब वह्दहू विर्दे जुबान थी और ‘अन-ज-ज़ वादहू’ पढ़ते हुए शहादत की उंगली आसमान की तरफ़ बार-बार उठाते थे

इतने में डॉक्टर आ गए और अस्पताल ले जाने का मश्वरा दिया। हज़रत जी ने अस्पताल की बात सुनी, तो फ़रमाया, ‘वहां औरतें होंगी, मैं न जाऊंगा।’ डॉक्टर और बाअसर हज़रात ने अर्ज़ किया कि हज़रत ! एक औरत भी पास न आएगी, फ़रमाया, ‘फिर कोई मुज़ायका नहीं, आख़िर एक बड़ी कार में लिटाया गया, फ़रमाया कि मेरे साथ कौन चल रहा है? मौलाना इनामुल हसन साहब और हाफ़िज़ मुहम्मद सिद्दीक़ साहब वग़ैरह ने कहा कि हम सब साथ हैं। आपने फ़रमाया, मेरे साथ कोई नहीं चल रहा है, बस अल्लाह साथ है।

रास्ते भर ला इला – ह इल्लल्लाहु का विर्द जुबान पर जारी रहा। एक बार मालूम फ़रमाया कि अब अस्पताल कितनी दूर है, कहा गया कि बस पहुंच रहे हैं। अब ला इला-ह इल्लल्लाहु की आवाज़ ज़रा धीमी पड़ चुकी थी, फिर होंठ कलिमा तैयिबा की तक्रार से हिलते रहे, यहां तक कि अस्पताल के दरवाज़े ही पर रहमते हक़ ने उस बेचैन रूह को बढ़कर अपनी गोद में ले लिया और वर्षों के थके मुसाफ़िरों ने रफ़ीक़े आला के पास जाकर आराम पा लिया। ‘इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन०’

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