Allah को कैसे देखेंगे? |अल्लाह की रहमत | पुलसिरात का रास्ता पार करना | Dawat-e-Tabligh

क्या दोपहर के वक्त सूरज के देखने में तुमको तकलीफ होती है, जबकि वह बिल्कुल साफ हो और उस पर कुछ भी बादल न हो? पुलसिरात रखी जाएगी, जो तेज़ की हुई तलवार की तरह होगी। Allah को कैसे देखेंगे?| अल्लाह की रहमत | पुलसिरात का रास्ता पार करना | Dawat-e-Tabligh…

Allah को कैसे देखेंगे? |अल्लाह की रहमत | पुलसिरात का रास्ता पार करना | Dawat-e-Tabligh
Allah को कैसे देखेंगे? |अल्लाह की रहमत | पुलसिरात का रास्ता पार करना | Dawat-e-Tabligh

अल्लाह की रहमत

  • अल्लाह की रहमत से बख़्शे जायेंगे

हज़रत अबू सईद खुदरी से रिवायत है कि आंहज़रत सैयदे आलम ने फरमाया कि हरगिज़ कोई जन्नत में अल्लाह की रहमत के बगैर दाख़िल न होगा? सहाबा किराम ने सवाल किया कि या रसूलल्लाह ! आप भी अल्लाह की रहमत के बगैर जन्नत में न जाएंगे? इसके जवाब में सैयदे आलम ने अपना मुबारक हाथ सर पर रखकर फरमाया और न मैं जन्नत में दाख़िल हूंगा, मगर यह कि अल्लाह मुझे अपनी रहमत से ढांप ले।                 

 -तर्गीव व तहींब

इस हदीस मुबारक में नेक अमल करने वालों को और ख़ास तौर से उन इबादत करने वालों, दुनिया से चाव न रखने वालों, अल्लाह का ज़िक्र करने वालों और जिहाद करने वालों को तंबीह फ़रमायी गयी है जो हर वक्त मलाई और नेकी में लगे रहते हैं कि अपने अमल पर नाज़ न करें और यह न समझें कि हम जन्नत के हक़दार वाजवी तौर पर हो चुके बल्कि चाहिए कि अपने आमाल को कमतर समझते रहें और डरते रहें कि शायद क़ुबूल न हों। अगर अल्लाह तआला आमाल क़ुबूल न फरमायें तो किसी की उन पर क्या जबदरस्ती है जो नेक आमाल लोग करते हैं, उनको कुबूल फरमा कर सवाब से नवाज़ें और जन्नत में दाखिल फरमायें यह उनकी सिर्फ रहमत है, उनकी मामूली नेमत के बदला भी सारी उम्र के अमल नहीं हो सकते हैं (जैसा कि नेमतों के सवाल के सिलसिले में रिवायत गुज़र चुकी है) जब आहज़रत सैयदे आलम ने इर्शाद फ़रमाया कि कोई भी अल्लाह की रहमत के बगैर जनत में दाखिल न होगा तो सहाबा किराम ने यह समझकर कि आप तो अल्लाह तआला के हुक्मों पर पूरी तरह कायम हैं और सख्त मेहनत और मुजाहिदा इबादत और तब्लीग के लिए बर्दाश्त करते हैं और आपके किसी भी अमल में ज़रा खोट का शुब्हा भी नहीं हो सकता, तो तश्रीह (व्याख्या) चाही कि आप जन्नत में आमाल की वजह से जा सकेंगे या नहीं। आप ने साफ़ फ़रमा दिया कि मैं भी अल्लाह की रहमत का मुहताज हूं, उसकी रहमत के बगैर जन्नत में न जाऊंगा। हैं तो अल्लाह के बन्दे ही । आख़िर आप रहमत के मुहताज क्यों न होंगे। सहाबा किराम पर बेइंतिहा रहमत व रिज़वान की बारिशें हों जिन्होंने सवाल करके बाद में आने वालों के लिए अच्छी तरह दीन समझने के लिए नबी करीम के इर्शादात का ज़ख़ीरा जमा कर दिया और फिर उसको बाद वालों के सुपुर्द कर गये। जो लोग हज़ूरे अकदस को खुदाई अख्तियारात देते हुए कहते हैं कि जो लेना है, वह लेंगे मुहम्मद से । इस मुबारक हदीस को गौर से पढ़ें।

Allah को कैसे देखेंगे?

  • साक की तजल्ली

हज़रत अबू सईद खुदरी रिवायत फरमाते हैं कि हमने रसूले अकरम के दरबार में अर्ज़ किया कि ऐ अल्लाह के रसूल ! क्या कियामत के दिन हम अपने रब को देखेंगे? जवाब में आप ने इर्शाद फ़रमाया कि हां, (ज़रूर देखोगे) क्या दोपहर के वक्त सूरज के देखने में तुमको तकलीफ होती है, जबकि सूरज बिल्कुल साफ़ हो (और) उसपर ज़रा बादल न हो? और क्या चौदहवीं रात के चांद को देखने में तुमको कई तकलीफ होती है, जबकि वह बिल्कुल साफ हो और उस पर कुछ भी बादल न हो? सहावा ने जवाब में अर्ज़ किया कि अल्लाह के रसूल! नहीं (कोई तकलीफ नहीं होती, आसानी से देख लेते हैं)। इसी तरह कियामत के दिन तुम अल्लाह को ख़ूब ‘अच्छी तरह देखोगे और कोई तकलीफ न होगी जैसा कि चांद-सूरज के देखने में (ज़िक्र की गयी हालत में) कोई तकलीफ नहीं होती है। इस के बाद इर्शाद फ़रमाया कि—

Allah का कोई परिवार नही

‘जब क़ियामत को दिन होगा तो एक पुकारने वाला पुकारेगा कि जो जिसको पूजता था, वह अपने माबूद के पीछे लग जाए, पस जो लोग गुरु अल्लाह यानी बुतों और स्थानों के पत्थरों को पूजते थे। वे सबके सब दोज़ख में गिर पड़ेंगे (क्योंकि उनके बातिल के माबूद भी दोजख का ईंधन बनेंगे)। यहां तक कि जब अहले किताब और वे लोग रह जाएंगे जो सिर्फ अल्लाह की इबादत करते थे तो यहूद को बुलाकर सवाल किया जाएगा कि तुम किस की इबादत करते थे। ये जवाब में कहेंगे कि हम अल्लाह के बेटे उज़ैर की पूजा करते थे। इस जवाब पर (उन पर डांट पड़ेगी और उनसे कहा जाएगा कि यह जो तुमने उजैर को अल्लाह का बेटा बताया, इस कहने में तुम झूठे हो। अल्लाह ने किसी को अपनी बीवी या औलाद करार नहीं दिया। इसके बाद उनसे सवाल होगा कि तुम क्या चाहते हो? वह अर्ज़ करेंगे कि ऐ परवरदिगार! हम प्यासे हैं। हमें पिला दीजिए। उनके इस कहने पर दोज़ख़ की तरफ इशारा करके उनसे कहा जाएगा कि वहां जाकर क्यों नहीं पी लेते। चुनांचे वे लोग दोज़ख़ की तरफ (चलाकर) जमा कर दिये जाएंगे ( और वह दूर से ऐसा मालूम हो रहा होगा) गोया कि वह रेत है’ (रेत दूर से देखने में पानी मालूम होती हैं।) और हकीकत में वह आग होगी, जिसके हिस्से आपस में एक दूसरे को जला रहे होंगे। पस वे लोग उसमें गिर पड़ेंगे। फिर नसारा (ईसाई) को बुलाया जाएगा और उनसे सवाल किया होगा कि तुम किस की इबादत करते थे? उनके इस जवाब पर (डांटने के लिए) कहा जाएगा कि (यह जो तुमने मसीह को अल्लाह का बेटा बताया, इस कहने में) तुम झूठे हो। अल्लाह ने किसी को अपनी बीवी या औलाद करार नहीं दिया।

Allah को कैसे पहचानना ?

इसके बाद उनसे सवाल होगा कि तुम क्या चाहते हो? वह अर्ज़ करेंगे कि ऐ परवरदिगार! हम प्यासे हैं, हमको पिला दीजिए। उनके इस कहने पर दोज़ख़ की तरफ इशारा करके उनसे कहा जाएगा कि वहां जाकर क्यों नहीं पी लेते। पस वे लोग उसमें गिर पड़ेंगे (मतलब यह है कि तमाम यहूदी व ईसाई दोज़ख़ में गिर पड़ेंगे)। यहां तक कि जब सिर्फ वही लोग रह जाएंगे, जो अल्लाह ही की इबादत करते थे (यानी मुसलमान) नेक भी और बद भी तो अल्लाह तआला की उनके सामने एक तजल्ली होगी (और) अल्लाह तआला फरमाएंगे कि तुमको क्या इंतिज़ार है? हर जमाअत को उसके माबूद के पीछे जाने का हुक्म है ! मोमिन अर्ज करेंगे कि (जाने वाले जा चुके, हमारा उनका क्या साथ, हमको अपने माबूद का इंतिज़ार है, जब तक हमारा माबूद न आए, हम यहीं रहेंगे। जब हमारा रब हमारे पास पहुंचेगा, हम पहचान लेंगे) ऐ परवरदिगार! हम दूसरी जमाअतों और गिरोहों से दुनिया में अलग रहे। जबकि उनके साथ रहने के बहुत ज्यादा मुहताज थे और (बहुत ज़्यादा मुहताज होने की हालत में भी) उनका साथ न दिया (अब उनके साथ कैसे हो सकते हैं) अल्लाह जल्ल ल शाहू फरमायेंगे कि मैं तुम्हारा रव हूं। मोमिन (चूंकि साफ़ की तजल्ली से अल्लाह को पहचानने के ध्यान में होंगे। इसलिए अल्लाह की उस तजल्ली को, जो उस वक्त होगी, गैरु ल्लाह रव मानकर क्या मुश्कि हो जाए) हम अल्लाह के साथ किसी भी चीज़ को शरीक नहीं बनाते। दो या तीन बार ऐसा ही कहेंगे। उनके इस जवाब पर अल्लाह जल्ले ल शानुहू सवाल फरमाएंगे कि क्या तुम्हारे रब और तुम्हारे दर्मियान कोई निशानी (मुकर्रर ) है जिससे तुम अपने रब को पहचान लोगे? मोमिन अर्ज करेंगे जी हां। निशानी जरूर हैं! इसके बाद साक’ की तजल्ली होगी जिसे देख कर तमाम वे लोग जो खुलूस के साथ अल्लाह को सज्दा करते थे, अल्लाह के हुक्म से सज्दों में गिर पड़ेंगे और जो लोग दिखावे या (मस्लहतों की वजह से दुनिया में मुश्किलों से बचने के लिए (यानी निफाक के साथ) सज्दा करते थे, अल्लाह उन सबकी कमर को तख़्ता बना देंगे (जिसकी वजह से सज्दा न कर सकेंगे)। जो भी कोई उनमें से जब भी सज्द का इरादा करेगा गुधी के बल गिर पड़ेगा। फिर मोमिनीन सज्दों से सिर उठाएंगे और अब जो अल्लाह को देखेंगे तो इसी तजल्ली में जो तजल्ली साक से पहले थी, अब अल्लाह फरमाएंगे कि मैं तुम्हारा रब हूँ तो मोमिनीन मान लेंगे कि हाँ आप हमारे रब हैं।

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Allah का कोई जिस्म नही

साक पिंडली को कहते हैं और अल्लाह जल्ल ल शानुहू जिस्म और जिस्म के अंगो से पाक-साफ है। फिर यहां पिंडली का क्या मतलब है? इसके बारे में उलमा किराम ने बताया कि यह कोई ख़ास मुनासबत में साक फ़रमाया है। जैसे कुरआन में ‘यदुल्लाह’ (अल्लाह का हाथ) ‘वज्हुल्लाह’ (अल्लाह का चेहरा) का लफ्ज़ आया है। ये और ऐसी ही लफ्ज़ों पर, बगैर समझे और अकूल लड़ाए और अल्लाह को जिस्म के होने से पाक समझते हुए बिला शर्त ईमान रखना लाज़िम है।

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लोगो को किस बात पर पछतावा रहेगा ? 

  • हर एक शर्मिंदा होगा

हज़रत मुहम्मद बिन अबी उमैरा से रिवायत है कि आंहज़रत ने इर्शाद फ़रमाया कि बिला शुब्हा अगर कोई बन्दा पैदाइश के दिन से मौत आने तक अल्लाह की फरमांबरदारी में चेहरे के बल गिरा पड़ा रहे तो वह कियामत के दिन इस सारे अमल को हकीर (तुच्छ) समझेगा और यह तमन्ना करेगा कि उसको दुनिया की तरफ वापस कर दिया जाए ताकि और ज्यादा बदला व सवाब (भले काम करके) हासिल करें। 

-अहमद

हज़रत अबू हुरैरः 4 से रिवायत है कि आहज़रत ने इर्शाद फरमाया कि तुम में से जिसको भी मौत आएगी, ज़रूर शर्मिंदा होगा। सहाबा किराम ने अर्ज़ किया, ऐ अल्लह के रसूल ! किस चीज़ की शर्मिंदगी होगी। फ़रमाया, अगर अच्छे अमल करने वाला था तो यह सोच कर शर्मिंदा होगा कि और अमल कर लेता तो क्या अच्छा होता और अगर बुरे अमल करने वाला था तो यों सोचेगा कि काश ! मैं बुराइयों से अपनी जान को बचाये रखता

 – तिर्मिज़ी शरीफ

भलाई करने वालो पे Allah की रहमती

फिर मोमिन ख़ुदा के दरबार में अर्ज़ करेंगे कि हमारे रब ! आपने जिन लोगों के निकालने के मुतअल्लिक हुक्म दिया था, उनमें से अब कोई भी दोज़ख़ में बाकी नहीं रहा। अल्लाह तआला फरमाएगा कि जाओ दोज़ख़ में कोई ऐसा भी मिले कि जिसके दिल में दीनार के बराबर भी भलाई हो, उसको भी निकाल लो। चुनांचे मोमिन अल्लाह के इस इर्शाद के बाद भारी तादाद में लोगों को निकालेंगे। फिर अर्ज़ करेंगे कि ऐ रब ! दोज़ख़ में हमने इनमें से कोई भी नहीं छोड़ा जिनके निकालने के बारे में आपने हुक्म फ़रमाया था। इसके बाद अल्लाह का इर्शाद होगा कि जाओ, जिसके दिल में आधे दीनार के बराबर भी भलाई देखो, उसको भी निकाल लो। चुनांचे इर्शाद के बाद मोमिन भारी तादाद में लोगों को दोज़ख़ से निकालेंगे। फिर अर्ज़ करेंगे कि ऐ रब! हमने दोज़ख़ में उनमें से कोई भी नहीं छोड़ा जिनके निकालने के बारे में आप ने हुक्म फ़रमाया था। इसके बाद अल्लाह का इर्शाद होगा कि जाओ जिसके दिल में ज़र्रा बराबर भी भलाई देखो उसको भी निकाल लो। चुनांचे वे भारी तादाद में लोगों को निकालेंगे। फिर अर्ज़ करेंगे कि ऐ हमारे परवरदिगार! हमने दोज़ख़ में (कोई ज़रा) ख़ैर (वाला) नहीं छोड़ा।

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दीनार किसको कहते हैं?

दीनार सोने की अशर्फी को कहते थे जो अरब में होती थी।

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बहुत सारी मुसीबत 

तजल्ली-ए-साक, पुलसिरात, तकसीमे नूर काफिरों, मुश्किों और मुनाफिकों की बेपनाह मुसीबत

कियामत का दिन इंसाफ का दिन होगा। हर शख्स अपनी आँखों से अपने अमल का वज़न देखकर जन्नत या दोज़ख़ में जाएगा। किसी को यह कहने की ताकत होगी ही नहीं कि मुझपर जुल्म हुआ, मैं बेवजह दोज़ख़ में जा रहा हूं।

कियामत का दिन इंसाफ का दिन होगा। हर शख्स अपनी आँखों से अपने अमल का वज़न देखकर जन्नत या दोजख में जाएगा। किसी को यह कहने की ताकत होगी ही नहीं कि मुझपर जुल्म हुआ, मैं बेवजह दोज़ख़ में जा रहा हूँ।

अल्लाह जल्ल ल शाहू ने ईमान और भले कामों के बदले के लिए जन्नत तैयार फरमाई है और कुफ व शिर्क और दूसरे गुनाहों की सज़ा के लिए जन्नत तैयार फ़रमायी है। अपने आमाल के नतीजे में इन दोनों में से जिसको जहां जाना होगा, जाएगा। जन्नत में जाने के लिए दोज़ख़ के ऊपर से रास्ता होगा। जिसे हदीसों में ‘सिरात’ फ़रमाया गया है और आम तौर से हमारे देश वाले उसे पुलसिरात कहते हैं। खुदा से डरने वाले मोमिन अपने अपने दर्जे के मुताबिक सही सलामत उस पर से गुज़र जाएंगे और बदअमल चल न सकेंगे और दोज़ख़ के अंदर से बड़ी-बड़ी संडासियां निकली होंगी जो गुज़रने वालों को पकड़कर दोज़ख़ में गिराने वाली होंगी। उनसे छिल छिलाकर गुज़रते हुए बहुत से (बदअमल) मुसलमान पार हो जाएंगे और जिनको दोज़ख़ में गिराना ही मंज़ूर होगा तो वे संडासियां उनको गिरा कर ही छोड़ेंगी। फिर कुछ मुद्दत के बाद अपने-अपने अमल के मुताबिक़ और नबियों और फरिश्तों और नेक बंदों की शफाअत से और आख़िर में सीधे-सीधे अल्लाह तआला की मेहरबानी से वे सब लोग दोज़ख़ से निकाल लिए जाएंगे, जिन्होंने सच्चे दिल से कलिमा पढ़ा था और दोज़ख़ में सिर्फ काफिर व मुश्कि व मुनाफिक ही रह जाएंगे।

पुलसिरात का रास्ता

इस हदीस मुबारक से पुलसिरात और उस पर से गुज़रने वालों का तफ़सीली हाल मालूम हुआ। दूसरी रिवायतों में और ज़्यादा तफ़सील आयी है। चुनांचे एक हदीस में है कि आहज़रत सैयदे आलम ने फरमाया कि पगम्बरों में से सबसे अव्वल मैं अपनी उम्मत के साथ पुलसिरात से गुज़रूंगा और उस दिन पैगम्बरों के सिवा कोई बोलता न होगा और पैगम्बरों का बोलना उस दिन ‘अल्लाहुम म सल्लिम सल्लिम होगा। इसी को बार-बार कहेंगे। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद ने फरमाया कि दोजख पर पुलसिरात रखी जाएगी, जो तेज़ की हुई तलवार की तरह होगी।

मुस्लिम शरीफ़ की एक हदीस में है कि (पुलसिरात पर) लोगों के आमाल लेकर चलेंगे जैसे जिसके अमल होंगे, उसी अन्दाज़े से तेज़ और सुस्त रफ़्तार होगा और सुस्त रफ़्तारों की हालत यहां तक पहुंच जाएगी कि कुछ गुज़रने वाले इस हाल में होंगे कि घिसटते हुए चलेंगे।

एक रिवायत में है कि दोज़ख़ में से संडासियां निकली हुई होंगी, उनमें से एक-एक की लम्बाई व चौड़ाई और उनके पकड़ गिराने का यह हाल होगा कि एक ही के बार में क़बीला रबीआ और मुज़र के लोगों से भी ज़्यादा पकड़कर दोज़ख़ में डाले जाएंगे।

-तर्गीव व  तहींब

पुलसिरात का रास्ता पार करना

इसके बाद दोज़ख की पुश्त पर पुलसिरात कायम की जायेगी (उस पर से गुज़रने का हुक्म होगा) और इस वक़्त (शफाअत के जो अहल होंगे उनको शफाअत की इजाज़त दी जाएगी और अल्लाहुम्म सल्लिम सल्लिम (ऐ अल्लाह ! सलामत रख, सलामत रख) कहते होंगें। अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह ! पुलसिरात की क्या सिफ़त है? इर्शाद फ़रमाया वह चिकनी और फिसलने की जगह है इस में (दोज़ख से निकली हुई) उचकने वाली चीजें और संडासियाँ होगीं और बड़े-बड़े कांटे भी होंगे जिनकी सूरत के कांटे नज्द में होते हैं जिनको सदान कहा जाता है। पस मोमिनीन पुलसिरात पर (जल्दी-जल्दी) गुज़रेंगे (और ये गुज़रना आमाल सालिहा की बकुद्र जल्दी होगा) कोई पल झपकने में और कोई बिजली की तरह और कोई हवा की तरह और कोई परिंदों की तरह और कोई बेहतरीन तेज रफ्तार धोंड़ों की तरह और कोई ऊँटों की तरह (गुज़र जाएगा और दोज़ख़ के अंदर से जो संडासियाँ और काँटे निकले हुए होंगे वह खींच कर दोज़ख में गिरने की कोशिश करेंगे नतीजा यह होगी कि) बहुत से मोमिनीन सलामती के साथ नजात पा कर पार हो जाएंगे और बहुत से अहले ईमान (गुज़रते हुऐ ) छिल- छिला कर छूट जाऐंगे और बहुत से दोज़ख की आग में ढकेल दिए जायेंगे यहाँ तक कि जब (नेक) ईमान वाले दोज़ख से बच जाएंगे तो मै उस ज़ात की कसम खाकर कहता हूँ जिस के कब्ज़े में मेरी जान है कि तुम (यहाँ उस दुनिया में) अल्लाह से हक लेने के बारे में ऐसे मज़बूती के साथ बात करने वाले नहीं हो जैसा कि (दोज़ख़ से बच कर पुलसिरात पर हो जाने वाले मोमिनीन अपने इन भाईयों के लिए जो दोज़ख में (गिर चुके) होंगे। अल्लाह से मज़बूती के साथ सिफारिश करेंगे।

Kya tmhre pas Tabligh wale nahi aai the? 

जब वे दोज़ख़ के दरवाज़ों पर पहुचेंगे तो दरवाज़े खोलकर उसमें दाख़िल कर दिए जाएंगे और दोज़ख़ के दरवाज़ों पर जो फ़रिश्ते मुकर्रर होंगे, वह मलामत करने के लिए सवाल करेंगे क्या तुम्हारे पास रसूल, Allah ke bande, Tabligh wale नहीं आए थे?

चुनांचे इर्शाद फ़रमाया है :

यहां तक कि दोज़ख़ के पास पहुंचेंगे तो उसके दरवाज़े खोल दिए जाएंगे और उनसे दोज़ख़ के निगरां (देख-भाल करने वाले) कहेंगे क्या तुम्हारे पास पैग़म्बर, Allah ke bande, Tabligh wale नहीं आये थे जो तुमको तुम्हारे रब की आयतें पढ़कर सुनाते थे और तुमको आज के दिन पेश आने से डराया करते थे? दोज़ख़ी जवाब देंगे कि हां (पैग़म्बर आये थे) लेकिन अज़ाब का वादा काफिरों पर पूरा होकर रहा। (फिर उनसे) कहा जायेगा कि जहन्नम के दरवाज़ों में दाख़िल हो जाओ (और) उसमें हमेशा के लिए रहो गरज यह कि घमंडियों का बुरा ठिकाना होगा।’ 

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