बच्चे का बाल छिलना (टकला) | बच्चा पैदा होने के बाद मीठा (खुजूर) क्यों खिलाया जाता है?- Dawat~e~Tabligh

बच्चे के कान मैं अजान क्यों दिया जाता है? छोटे बच्चों का बाल क्यों छिलना जरूरी है? बच्चा पैदा होने के बाद मीठा खेलने के फायदे। Web Stories in Hindi. बच्चे का बाल छिलना (टकला) | बच्चा पैदा होने के बाद मीठा (खुजूर) क्यों खिलाया जाता है?- Dawat~e~Tabligh….

बच्चे का बाल छिलना (टकला) | बच्चा पैदा होने के बाद मीठा (खुजूर) क्यों खिलाया जाता है?- Dawat~e~Tabligh
बच्चे का बाल छिलना (टकला) | बच्चा पैदा होने के बाद मीठा (खुजूर) क्यों खिलाया जाता है?- Dawat~e~Tabligh

हर बच्चे की paidaish kispe होती है

  • हर बच्चा फ़ितरते इस्लाम पर पैदा होता है।

हज़रत अबू हुरैरा रज़ि० कहते हैं कि आंहज़रत सल्ल० ने फ़रमाया : हर बच्चा अपनी फ़ितरत (यानी इस्लाम) पर पैदा होता है, फिर उसके वालिदैन उसे यहूदी या मजूसी या नसरानी बना देते हैं।” (सहीह बुखारी)

फ़ितरत से मुराद अल्लाह पाक की तौहीद और इस्लाम के बुलन्द मर्तबा, उसूल व मुबादी हैं, क्योंकि यह दीन फ़ितरते इंसानी और अक्ले सलीम के ऐन मुताबिक़ है। इस हदीस से मालूम हुआ कि हर बच्चा अक़ाइद व आमाल का ज़ेहन लेकर दुनिया में आता है, अगर वालिदैन उसकी अच्छी तर्बियत और ज़ेहन साज़ी करें तो यह बुलन्द पाया औसाफ़ परवान चढ़ते हैं और यह इंसान एक बेहतरीन मुसलमान बनकर मुआशरे का मुफ़ीद फ़र्द बन जाता है, लेकिन अगर सूरते हाल इसके विपरीत हुई तो वालिदैन की गलत तर्बियत और माहौल के बद-असरात से उसके अफ़्कार व आमाल भी बिगड़ते जाते हैं। जैसे हम अमली तौर पर देखते हैं कि मुसलमान घरानों के बच्चे ईसाइयों के मिश्नरी स्कूलों या दीगर गैर-मुस्लिमों के मज़हबी तालीमी इदारों में दाखिल करा दिए जाते हैं और फिर वह उनके रंग में रंग जाते हैं, और इस्लाम के फ़ितरी और अक्ली नज़रियात और आमाल से बेगाना हो जाते हैं। बच्चे की इस रूहानी और अख़लाक़ी तबाही व बर्बादी में वालिदैन बराबर के शरीक होते हैं। लिहाजा हमें चाहिए कि अपनी औलाद को दीने इस्लाम के मुताबिक़ तालीम व तर्बियत दें ताकि वह आला मुफ़ीद और मिसाली मुसलमान बन सकें ।

बच्चे के कान में Azan 

  • बच्चे के कान में अज़ान और इक़ामत की मस्नूनियत

बच्चे की पैदाइश के बाद एक सुन्नत अमल यह है कि उसके दाएं कान में अज़ान और बाएं कान में इक़ामत कही जाए, इस सिलसिले में जो अहादीस मरवी हैं वे ये हैं :

1. हज़रत हसन बिन अली रज़ि० रसूले करीम सल्ल० से रिवायत करते हैं कि आप सल्ल० ने फ़रमाया, “जिसके यहां बच्चा पैदा हो और वह उसके दाएं कान में अज़ान और बाएं कान में इक़ामत कहे तो वह बच्चा उम्मुस्सबयान (सोकड़ा की बीमारी) से महफ़ूज़ रहेगा।” (सुनन बैहक़ी)

2. हज़रत इब्ने अब्बास रजि० से रिवायत है कि नबी करीम सल्ल० ने हज़रत हसन बिन अली रजि० के (दाएं) कान में जिस दिन वह पैदा हुए अज़ान दी और बाएं कान में इक़ामत कही।

3. हज़रत अबू राफ़ेअ रजि० फ़रमाते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह सल्ल० को देखा कि हज़रत हसन बिन अली रजि० जब हज़रत फ़ातिमा रज़ि० के यहां पैदा हुए तो आप सल्ल० ने उनके कान में अज़ान दी।

(अबू दाऊद, तिर्मिज़ी शरीफ़)

बच्चे के कान मैं अजान क्यों दिया जाता है?

अल्लाम इब्ने कव्यिम रह० ने लिखा है कि इस अज़ान और इक़ामत की हिक्मत यह है कि इस तरह से नौमौलूद बच्चे के कान में सबसे पहले जो आवाज़ पहुंचती है, वह ख़ुदाए बुजुर्ग व बरतर की बड़ाई और अज़्मत वाले कलिमात और उस शहादत के अल्फ़ाज़ होते हैं जिसके ज़रिए इंसान इस्लाम में दाख़िल होता है। गोया उसे दुनिया में आते ही इस्लाम और ख़ुदा-ए-वाहिद की बड़ाई की तल्कीन की जाती है, जिसके असरात ज़रूर बच्चे के दिल व दिमाग पर पड़ते हैं। अगरचे वह उन असरात को अभी समझ नहीं पाता।

इसकी एक हिक्मत यह बयान की गई है कि अज़ान से चूंकि शैतान भागता है, जोकि इंसान का अज़ली दुश्मन है इसलिए अज़ान कही जाती है कि दुनिया में क़दम रखते ही बच्चे पर पहले पहल शैतान का क़ब्ज़ा न हो, और उसका दुश्मन इब्तदा ही में भाग कर पसपा हो जाए।

यह हिक्मत भी बयान की गई कि बच्चे के कान में पैदाइश के बाद अज़ान दी जाती है और दुनिया से रुख्सत होने के बाद नमाज़े जनाजा पढ़ी जाती है, गोया जैसे आम नमाज़ों के लिए अज़ान दी जाती है और तैयारी के कुछ वक्फ़े के बाद नमाज़ पढ़ी जाती है। इस तरह तमाम इंसानों को यह समझाना मक़सूद होता है कि पैदा होने के बाद अज़ान दी गई है और उस अज़ान के बाद तुम्हारी नमाज़ (नमाज़े जनाज़ा) जल्द होनेवाली है, लिहाज़ा दर्मियान के मुख्तसर अर्से में आख़िरत की तैयारी करो, ताकि मरने के बाद पछताना न पड़े। किसी ने खूब कहा है :

आए हुई अज़ान, गए हुई नमाज़ 

बस इतनी देर का झगड़ा है ज़िंदगी क्या है

बच्चा पैदा होने के बाद khuzur (Dates) खिलाना

  • तहनीक की सुन्नत

तहनीक का मतलब यह है कि खजूर या छुहारा मुंह में चबाया जाए और उसका थोड़ा-सा हिस्सा उंगली पर लेकर नौमीलूद के मुंह में दाखिल किया जाए। फिर उंगली को आहिस्तगी के साथ दाएं-बाएं हरकत दी जाए, ताकि चबाई हुई चीज़ पूरे मुंह में पहुंच जाए। यह सुन्नत अमल है जिसका सुबूत नीचे लिखी अहादीस से मिलता है।

बच्चा पैदा होने के बाद मीठा (खुजूर) क्यों खिलाया जाता है?

1. हजरत असमा बिन्ते अबू बक्र रजि० से मरवी है, जब अब्दुल्लाह बिन जुबैर रजि० उनके शिकम में थे तो फरमाती हैं कि मेरे हमल के दिन पूरे हो चुके थे। मैं (हिजरत करके) मदीना आई और क़ुबा में क़याम किया। अब्दुल्लाह बिन जुबैर वहीं पैदा हुए, मैं उन्हें हुजूर सल्ल० के पास से गई और उन्हें आप सल्ल० की गोद में रख दिया। आप सल्ल० ने एक छुहारा मंगवाया और उसे चबाकर अब्दुल्लाह बिन जुबैर रजि० के मुंह में डाल दिया, इस तरह सबसे पहली चीज जो उनके शिकम में गई वह रसूलुल्लाह सल्ल० का आदे दहन था, फिर उनके मुंह में छुहारा डालने के बाद आप सल्ल० ने उनके लिए बरकत की दुआ फ़रमाई इस्लाम में (हिजरत के बाद) यह बच्चे की पहली पैदाइश थी।

(बुख़ारी, पेज 2, पेज 575)

2. हज़रत अबू मूसा रजि० बयान करते हैं कि मेरे यहां एक लड़का पैदा हुआ, मैं उसे नबी सल्ल० की खिदमत में ले गया। आप सल्ल० ने उसका नाम इबराहीम रखा और खजूर चबाकर उसके तालू में लगाई आप सल्ल० ने उसके लिए बरकत की दुआ फ़रमाई और उसे मुझे दे दिया।

(बुखारी, जिल्द 2, पेज 699) तहनीक की हिक्मत हदीस नं० 4 की इबारत से बाजेह हो गई कि इससे मुराद हुसूले बरकत है, जैसे हज़रत असमा रजि० ने फ़रमाया कि सबसे पहली चीज़ जो हज़रत अब्दुल्लाह बिन जुबैर रज़ि० के शिकम में पहुंची वह आप सल्ल० का आबे दहन मुबारक था।

बच्चा पैदा होने के बाद मीठा खेलने के फायदे

  • यह रुत्वा बुलन्द मिला जिसको मिल गया

आज हमारे दर्मियान हुजूर अकदस सल्ल० की जाते पाक मौजूद नहीं है, मगर आप सल्ल० की सुन्नत मौजूद है। लिहाज़ा किसी नेक आदमी से तहनीक की सुन्नत अदा करानी चाहिए। तिब्बी एतिबार से भी तहनीक एक फ़ायदेमंद अमल है। क्योंकि बच्चा जब इस दुनिया में नया-नया आता है तो उसका मुंह पैदाइशी बन्द होने की वजह से अभी खुलने का आदी नहीं होता। तहनीक के अमल से जबड़े खुल जाते हैं और मुंह मां के दूध को लेने के लिए तैयार हो जाता है। इसके अलावा खजूर का रस बदन के लिए कुव्वतबख़्श भी है।

बच्चे का बाल छिलना (टकला)

  • बच्चे का सर मुँड़ना

इस्लाम में नौमीतूद बच्चे के बारे में जो अहकाम वारिद हुए हैं, उनमें से एक यह है कि सातवें दिन बच्चे के सर के बाल मुंड़े जाएं और उन बालों के वज़न के बराबर चांदी फ़क़ीरों और मिस्कीनों में तक्सीम कर दी जाए। इस सुन्नत की नीचे लिखी अहादीस मुबारक से होती है।

1. हज़रत अनस बिन मालिकरजि० से रिवायत है कि हुजूर सल्ल० ने हजरत हसन रजि० और हजरत हुसैन रजि० की पैदाइश के सातवें दिन हुक्म दिया कि उनके सर के बाल मूंड़े जाएं। चुनांचे उनके बाल मुँड़वाए गए और उन बालों के वज़न के बराबर चांदी सदक़ा की गई।

(तोहप्रतुल मौदूद वा अहकामुल मौजूद, पेज 58)

2. मुहम्मद बिन अली बिन हुसैन रजि० से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने हजरत हुसैन रजि० की तरफ़ से अक़ीक़ा में एक बकरी ज़िब्ह की और फ़रमाया, ऐ फ़ातिमा इसके सर के बाल मूंड ले और उनके बराबर चांदी ख़ैरात कर दे। हज़रत फ़ातिमा रज़ि० ने वज़न किया तो उनका वज़न एक दिरहम या उससे कुछ कम था।

3. हजरत समरा बिन जुंदूब रजि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया, “हर बच्चा अक़ीक़ा तक बंधा होता है, उसकी तरफ से सातवें दिन (बकरा या बकरी) ज़िब्ह की जाए और सर के बाल मुंडे जाएं और उसका नाम रखा जाए। (अबू दाऊद, तिर्मिज़ी, नसाई, इब्ने माजा)

बच्चे के कान में Azan dene के फायदे- Web Stories

छोटे बच्चे का बाल कैसे छिलना ?

मसला की रू से बच्चा और बच्ची दोनों के सर के बाल मूंडे जाने चाहिएं और हर एक के सर के बालों के बराबर चांदी खैरात करनी चाहिए क्योंकि बच्चा और बच्ची दोनों ख़ुदा की नेमत हैं और सर के बाल मूंडने की हिक्मतें दोनों से मुताल्लिक़ हैं, बाल मूंडने में यह ख़्याल रखना चाहिए कि सारे सर के बाल मूंडे जाएं, क्योंकि बाल मूंडने का एक ग़लत तरीक़ा यह है कि सर के कुछ बाल मूंडे जाएं और कुछ छोड़ दिए जाएं, इसको अरबी में क़ज़अ कहते हैं, जिसको मना किया गया है। चुनांचे इरशाद है :

  • हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रजि० फ़रमाते हैं कि रसूले अकरम सल्ल० ने क़ज़अ से मना फ़रमाया है।

(बुख़ारी व मुस्लिम)

छोटे बच्चों का बाल क्यों छिलना जरूरी है?

सर मुंडवाने की सुन्नत से जो हिक्मत मालूम होती है वह यह है कि बच्चे के पैदाइशी बाल मादरे शिकम में आलाइश वगैरह के साथ गन्दे हो चुके होते हैं, उन गन्दे बालों को दूर करके सफ़ाई-सुथराई हासिल होती है। दूसरे यह कि पैदाइशी बाल इंतिहाई कमज़ोर होते हैं जिसके दूर करने से निस्बतन ताक़तवर बाल उग आते हैं। तीसरे यह कि पैदाइशी बालों को दूर करने से सर के मसाम खुल जाते हैं, जिसका सेहत पर अच्छे असरात पड़ते हैं, नीज़ सर के बाल कटवाने से देखने, सुनने, सूंघने और सोचने की कुव्वत ज़्यादा होती है। इस सुन्नत का दूसरा जुज़ बालों के बराबर चांदी का ख़ैरात करना है, जिसकी हिक्मत ज़ाहिर है कि बच्चे की पैदाइश पर जो ख़ुशी होती है, उसमें फ़ुक़रा और मसाकीन को भी शरीक कर लिया जाता है। यूं यह ख़ुशी सिर्फ़ एक घर तक महदूद नहीं रहती बल्कि आस-पास के ग़रीब लोग भी उसमें शरीक हो जाते हैं। नीज़ ख़ुदा की तरफ़ से औलाद के अता होने पर यह सदक़ा ख़ुशी और तशक्कुर का इज़हार भी है।

(माहनामा महमूद, फ़रवरी, 2006 ई०, पेज 23)

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