बच्चे की बदतमीज़ी का इलाज | दूध पीते बच्चे कैसे बोलने लगे ?- Dawat~e~Tabligh

बच्चे से गुनाह या गलती हो जय तो क्या करे? बच्चे की बदतमीज़ी कैसे दूर करे ?  ख़ुदा की खुसूसी कुदरत का मज़ाहिरा एक और बच्चे का गहवारे में बोलना, बच्चे की बदतमीज़ी का इलाज | दूध पीते बच्चे कैसे बोलने लगे ?- Dawat~e~Tabligh….

बच्चे की बदतमीज़ी का इलाज | दूध पीते बच्चे कैसे बोलने लगे ?- Dawat~e~Tabligh
बच्चे की बदतमीज़ी का इलाज | दूध पीते बच्चे कैसे बोलने लगे ?- Dawat~e~Tabligh

दूध पीते बच्चे कैसे बोलने लगे ?

  •  ख़ुदा की खुसूसी कुदरत का मज़ाहिरा एक और बच्चे का गहवारे में बोलना

हज़रत अबू हुरैरा रज़ि० हुज़ूर सल्ल० से रिवायत करते हैं कि एक मर्तबा एक बच्चा अपनी मां की गोद में दूध पी रहा था कि सामने से एक सवार, उम्दा घोड़े पर अच्छे लिबास और अच्छी शक्ल व सूरतवाला, गुज़रा। मां ने दुआ की कि या अल्लाह मेरे बच्चे को इसी सवार जैसा शानदार बनाना। बच्चे ने मां का पिस्तान छोड़कर उस सवार पर एक नज़र डाली और साफ़ अल्फ़ाज़ में कहा, “नहीं, ऐ अल्लाह! मुझे इस सवार जैसा मत बनाना। यह कहकर फिर पिस्तान चूसने और दूध पीने लगा। रावी कहते हैं कि यह क़िस्सा सुनाते वक़्त आहज़रत सल्ल० ने अपनी शहादत की उंगली (सबाबा) जिस तरह अपने दहन मुबारक में डाली और बच्चे के दूध पीने को बताने के लिए जिस तरह ख़ुद उस उंगली को चूसा वह मंज़र उस वक़्त तक मेरी निगाहों के सामने है। फिर हुज़ूर सल्ल० ने बक़िया क़िस्सा सुनाया कि थोड़ी देर बाद कुछ लोग एक लड़की को पकड़े हुए और उसे मारते हुए सामने से गुज़रे और कह रहे थे कि कमबख्त तूने ज़िना किया और चोरी की और वह बेचारी कहे जा रही थी कि बस मेरा सहारा अल्लाह ही है और वह कैसा अच्छा काम बनानेवाला है।

मां ने यह ज़िल्लत का मंजर देखकर शफ़क़त से बच्चे के लिए दुआ की कि ऐ अल्लाह ! मेरे बच्चे को इस (लड़की) की तरह न बनाना। बच्चे ने फिर दूध छोड़कर एक नज़र उस लड़की पर डाली और साफ़-साफ़ कहा कि ऐ अल्लाह ! मुझे इसी जैसा बनाइएगा। इस पर मां-बेटों में हुज्जत होने लगी। मां बोली जब एक आदमी अच्छी हालत में गुज़रा तो मैंने तेरे लिए दुआ की कि या अल्लाह ! मेरे बच्चे को ऐसा शानदान बनाना तो उस पर तू यूं कहने लगा कि नहीं, या अल्लाह ! मुझे ऐसा न बनाना और अब जो लोग एक लड़की को ज़िल्लत के साथ पकड़े मारते हुए जा रहे हैं और मैंने दुआ की कि या अल्लाह मेरे बच्चे को ऐसा न बनाना तो तू यूं कहने लगा कि ऐ अल्लाह ! मुझे ऐसा ही बनाना। यह क्या बेअक्ली है? तब वह बच्चा फिर बोला, सुनो! बात यह है कि वह आदमी बड़ा ज़ालिम और जाबिर था तो मैंने कहा, ऐ ख़ुदा ! मुझे उसकी तरह ज़ालिम और जाबिर न बनाइएगा और बेचारी यह लड़की! लोग यह कह रहे हैं कि तूने ज़िना भी किया है, तूने चोरी भी की है, मगर उस बेचारी ने न चोरी की है, न जिना किया है। तो मैंने कहा, ऐ अल्लाह ! मुझे ऐसा ही मज़लूम बेगुनाह बनाइएगा।

(बुखारी व मुस्लिम, बहवाला तर्जुमानुस्सुन्नह, जिल्द 4, पेज 357)

कुछ दिनों का बच्चा कैसे बोलने लगा ?

  • ख़ुदा की खुसूसी कुदरत का मजाहिरा एक बच्चे का गहवारे में बोलना

हज़रत अबू हुरैरह रज़ि० बयान फ़रमाते हैं कि हुज़ूर सल्ल० ने फ़रमाया, गोद के बच्चों में से सिर्फ़ तीन ही बच्चे बोले हैं। एक तो हज़रत ईसा इब्ने मरयम अलैहि० और एक जरीज आबिदवाला लड़का क़िस्सा यह हुआ कि जरीज एक आबिद शख़्स था। उसने अपनी इबादत के लिए एक कोठरी बना रखी थी। वह एक दिन उसमें इबादत कर रहा था कि उसकी मां उसके बाप आई। उसने पुकारा, ऐ जरीज! जरीज ने ख़्याल किया, क्या करूं ऐ अल्लाह ! इधर ख़ुदा की नमाज़ का लिहाज़, उधर मां का लिहाज़। फिर नमाज़ ही को तर्जीह दी और उसी में लगा रहा। मां वापस चली गई। दूसरा दिन हुआ तो मां फिर उसके पास आई और वह उस वक़्त भी नमाज़ पढ़ रहा था। उसने पुकारा ऐ जरीज! उसने दिल में सोचा या अल्लाह ! क्या करूं? इधर मां उ र नमाज़, फिर नमाज़ ही में लगा रहा।

मां के बुलाने पर नहीं गया। फिर तीसरे दिन मां आई और उसने पुकारा, ऐ जरीज! उसने दिल में सोचा ऐ अल्लाह ! इधर मां उधर नमाज़ क्या करूं? फिर भी नमाज़ ही की तरफ़ मुतवज्जह रह गया। बस मां ने झुंझलाकर बद्दुआ की कि ऐ अल्लाह! इसको उस वक़्त तक मौत न आए जब तक कि उसको पहले फ़ाहिशा औरतों से पाला न पड़े। उसके बाद बनू इसराईल में जरीज की इबादत और ज़ुहद का शहरा उड़ने लगा। एक बदकार औरत थी जिसका हुस्न व जमाल ज़र्बुल मिस्ल था। उसने बनू इसराईल से कहा, अगर तुम कहो तो मैं जाकर उसे लुभाऊं । यह कहकर वह एक दिन उसके पास आई। जरीज ने उसकी तरफ़ नज़र तक न उठाई, वह फ़ाहिशा औरत खिसिया कर जज़्ब-ए-इंतक़ाम से भर गई और एक गड़ेरिये के पास गई जो उसी इबादतख़ाने में सोया करता था और उस गड़ेरिये को अपने ऊपर क़ाबू दे दिया और उसके साथ मुंह काला किया।

उससे हमल ठहर गया। जब उसने बच्चे जना तो उसने जरीज से इंतक़ाम लेने के लिए मशहूर किया कि यह लड़का जरीज से हुआ है। बस यह सुनना था कि लोग जरीज पर टूट पड़े, उसको इबादतख़ाने से नीचे घसीट लाए। उसका इबादतख़ाना ढा दिया और लगे उसे मारने (कि आविद बनकर हरामकारी करता है)। जरीज ने पूछा बताओ तो मुझे क्यों मार रहे हो? क्या बात है? उन्होंने कहा कि तूने उस फ़ाहिशा के साथ ज़िना किया और उसने तेरे नुत्फ़े का बच्चा जना है। जरीज ने कहा, अच्छा तो वह बच्चा कहां है? लोग वह बच्चा लेकर आए। उसने कहा, ज़रा मुझे नमाज़ पढ़ लेने दो। इजाज़त मिली।

उसने नमाज़ पढ़ी फिर वह जरीज उस बच्चे की तरफ़ मुतवज्जह हुआ और उस बच्चे के पेट में उंगली चुभोकर बोला, ऐ बच्चे ! तू सच-सच बता तेरा बाप कौन है? तो वह चन्द दिन का बच्चा क़ुदरते ख़ुदा से बोला कि फलां गड़ेरिया यह करामत देखकर अब वही लोग जरीज के हाथ-पांव चूमने लगे और उसे तबर्रुक बनाकर छूने लगे। कहने लगे अब हम तुम्हारा इबादतख़ाना सोने का बनाए देते हैं। उसने कहा, नहीं यह सब रहने दो, जैसा वह मिट्टी का पहले था वैसा ही बना दो; तो लोगों ने वैसा ही बना दिया।

(बुख़ारी व मुस्लिम, बहवाला तर्जुमाननुस्सुन्नह, जिल्द 4 पेज 355)

बच्चो से आचे से बात करे

  • पुराने कुरबानियाँ देने वाले साथियों की औलाद की रिआयत और उनके साथ हुस्ने-सुलूक ज़रूरी है, वरना न नफ़िल क़बूल होगी न फ़र्ज़

हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं जब हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का दुनिया से तशरीफ़ ले जाने का वक्त क़रीब आया तो हज़राते-सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम ने फ़रमाया : मुहाजिरीन में से जो साबिक़ीने अव्वलीन हैं मैं तुम्हें उनके साथ और उनके बाद उनके बेटों के साथ अच्छे सुलूक की वसीयत करता हूँ। अगर तुम इस वसीयत पर अमल नहीं करोगे तो तुम्हारा न नफ़्ली अमल क़बूल होगा और न फ़र्ज़ अमल क़बूल होगा।

-हयातुस्सहावा, हिस्सा 2, पेज 485

फ़ायदा : दीन का काम करने वाले साथियों की औलाद की रिआयत ज़रूरी है। सबसे अच्छा सुलूक यह है कि उनको भी दावत के काम में मोहब्बत से चलाया जाए और ख़ैरख़्वाही का मामला किया जाए।

बच्चे की बदतमीज़ी का इलाज

  • बच्चों की बद्तमीज़ी का सबब और उसका इलाज

बच्चों की बद्तमीज़ी और नाफ़रमानी का सबब उमूमन वालिदैन के गुनाह होते हैं खुदा तआला के साथ अपना मामला दुरुस्त करें और तीन 1 बाद सूरः फ़ातिहा पानी पर दम करके बच्चे को पिलाया करें।

– आपके मसाइल, हिस्सा 7, पेज 208

Bacche के लिए Dua की Darkhaast

  • वुजू का बचा हुआ पानी अपने बच्चों के चेहरे पर फेरिए और दुआ कीजिए

हज़रत अबू मूसा रज़ि० फ़रमाते हैं कि हुज़ूर सल्ल० ने यह दुआ फ़रमाई। कि इस छोटे से बन्दे अबू आमिर को दर्जे में क़यामत के दिन अक्सर लोगों से ऊपर कर देना ।हज़रत हस्सान बिन शद्दाद रजि० फ़रमाते हैं कि मेरी वालिदा ने हुज़ूर सल्ल० की ख़िदमत में हाज़िर होकर अर्ज़ किया- या रसूलल्लाह सल्ल० ! मैं आपकी ख़िदमत में इसलिए हाज़िर हुई हूँ ताकि आप मेरे इस बेटे के लिए दुआ कर दें और इसे बड़ा और अच्छा बना दें। आप सल्ल० ने वुज़ू किया और वुज़ू के बचे हुए पानी को मेरे चेहरे पर फेरा और यह दुआ मांगी। “ऐ अल्लाह ! इस औरत के लिए इसके बेटे में बरकत अता फ़रमा और इसे बड़ा और उम्दा बना।”

( हयातुस्सहाबा, जिल्द 3, पेज 383)

बच्चे से गुनाह या गलती हो जय तो क्या करे ?

  • औलाद से गुनाह व ख़ता हो जाए तो क़ता ताल्लुक़ के बजाए उनकी इस्लाह की फ़िक्र करना चाहिए

बिरादराने यूसुफ़ अलैहि० से जो ख़ता उससे पहले सरज़द हुई, वह बहुत-से कबीरा और शदीद गुनाहों पर मुश्तमिल थी। मसलन अव्वल झूठ बोलकर वालिद को इस पर आमादा करना कि यूसुफ़ अलैहि० को उनके साथ तफ़रीह के लिए भेज दें। दूसरे वालिद से अहद करके उसकी ख़िलाफ़वर्जी, तीसरे छोटे मासूम भाई से बेरहमी और शिद्दत का बर्ताव। चौथे ज़ईफ़ वालिद की इंतिहाई दिल आज़ारी की परवाह न करना। पांचवें एक बेगुनाह इंसान को क़त्ल करने का मंसूबा बनाना। छठे एक आज़ाद इंसान को जबरन और ज़ुल्मन फ़रोख्त करना । ये ऐसे इंतिहाई और शदीद जराइम थे कि जब याक़ूब अलैहि० पर यह वाज़ेह हो गया कि उन्होंने झूठ बोला है और दीदा दानिस्ता यूसुफ़ अलैहि० को ज़ाया किया है तो उसका मुतक़ाज़ा बज़ाहिर यह था कि वह उन साहबजादों से क़ता ताल्लुक़ कर लेते या उनको निकाल देते, मगर हज़रत याक़ूब अलैहि० ने ऐसा नहीं किया बल्कि वह बदस्तूर वालिद की ख़िदमत में रहे, यहां तक कि उन्हीं को मिस्र से ग़ल्ला लाने के लिए भेजा और उस पर मज़ीद यह कि दोबारा फिर उनके छोटे भाई के मुताल्लिक वालिद से अर्ज़ मारूज़ करने का मौक़ा मिला और बिल आख़िर उनकी बात मानकर छोटे साहबजादे को भी उनके हवाले कर दिया।

इससे मालूम हुआ कि अगर औलाद से कोई गुनाह व ख़ता सरज़द हो जाए तो बाप को चाहिए कि तर्बियत करके उनकी इस्लाह की फ़िक्र करे, और जब तक इस्लाह की उम्मीद हो क़ता ताल्लुक़ न करे। जैसा कि हज़रत याकूब अलैहि० ने ऐसा ही किया और बिल आख़िर वह सब अपनी ख़ताओं पर नादिम और गुनाहों से ताइब हुए। हां अगर इस्लाह से मायूसी हो जाए और उनके साथ ताल्लुक़ क़ायम रखने में दूसरों के दीन का ज़रर महसूस हो तो फिर क़ता ताल्लुक़ कर लेना बेहतर है।

(मआरिफुल क़ुरआन, जिल्द 5, पेज 104) 

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