दुआ मांगना न छोड़ो | दुआ की क़बूलियत के लिए एक मुजर्रब अमल- Dawat~e~Tabligh

Dua से बच्चा का ज़िन्दा हो जानाअल्लाह तआला का कुर्ब हासिल करने की ख़ास दुआपाँच जुमले दुनिया के लिए पाँच जुमले आख़िरत के लिए। दुआ मांगना न छोड़ो | दुआ की क़बूलियत के लिए एक मुजर्रब अमल- Dawat~e~Tabligh Wed Stories in Hindi….

दुआ मांगना न छोड़ो | दुआ की क़बूलियत के लिए एक मुजर्रब अमल- Dawat~e~Tabligh
दुआ मांगना न छोड़ो | दुआ की क़बूलियत के लिए एक मुजर्रब अमल- Dawat~e~Tabligh

दुआ मांगना न छोड़ो

  • मायूस होकर दुआ मांगना न छोड़ो

एक हदीस में है कि आंहज़रत सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया कि बंदे की दुआ उस वक्त तक क़बूल होती रहती है जब तक वह किसी गुनाह या क़तअ-रहमी की दुआ न करे और जल्दबाज़ी न करे। सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम से दर्याप्त किया कि जल्दबाज़ी का क्या मतलब है? आप सल्ल० ने फ़रमाया मतलब यह है कि यूँ ख़्याल कर बैठे कि मैं इतने अर्से से दुआ मांग रहा हूँ अब तक क़बूल नहीं हुई, यहां तक कि मायूस होकर दुआ छोड़ दे।

– मुस्लिम, तिर्मिज़ी

एक हदीस में हज़रत सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया अल्लाह तआला से जब दुआ मांगो तो इस हालत में कि तुम्हें उसके कबूल होने में कोई शक न हो।

-पआरिफुल कुरआन, हिस्सा 3, पेज 584

दुआ की क़बूलियत के लिए एक मुजर्रब अमल

मशाइख व उलमा ने हस्बुनल्लाहु व निअमल वकील पढ़ने के फ़ायदों में लिखा है कि इस आयत को एक हज़ार मर्तबा जज्बा ईमान व इंक्रियाद के साथ पढ़ा जाये और दुआ मांगी जाये तो अल्लाह तआला रद्द नहीं फ़रमाता हुजूमये-अफ्कार व मसाइब के वक्त हस्बुनल्लाहह व निअमल वकील का पढ़ना मुजर्रब है।

– मआरिफुल कुरआन, हिस्सा 2, पेज 244 

पाँच जुमले दुनिया के लिए पाँच जुमले आख़िरत के लिए

हज़रत बुरैदा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है जिसका मफ़्हूम यह है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जिस शख़्स ने ( नीचे दिए गये) दस कलिमात को नमाज़े-फज्र के वक़्त ( पहले या बाद में) कहा तो वह शख़्स इन कलिमात को पढ़ते हुए ही अल्लाह तआला को उसके हक्क़ में काफ़ी और कलिमात पढ़ने पर अज्र व सवाब देते हुए पाएगा। पहले पाँच कलिमात दुनिया से मुतअल्लिक़ हैं और बाक़ी के पाँच आख़िरत के मुतअल्लिक़ हैं।

दुनिया के पाँच यह हैं :

1. काफ़ी है मुझको अल्लाह, मेरे दीन के लिए। 

2. काफ़ी है मुझको अल्लाह, मेरे कुल फ़िक्र के लिए ।

3. काफ़ी है मुझको अल्लाह, उस शख़्स के लिए जो मुझ पर ज़्यादती करे। 

4. काफ़ी है मुझको अल्लाह, उस शख़्स के लिए जो मुझ पर हसद करे।

5. काफ़ी है मुझको अल्लाह, उस शख़्स के लिए कि धोखा और फ़रेब दे मुझे बुराई के साथ।

आख़िरत के पाँच यह हैं

 1. काफ़ी है मुझको अल्लाह, मौत के वक़्त ।

2. काफ़ी है मुझको अल्लाह, क़ब्र में सवाल के वक्त ।

3. काफ़ी है मुझको अल्लाह, मीज़ान के पास (यानी उस तराज़ू के पास जिसमें नाम-ए-आमाल का वज़न होगा )

4. काफ़ी है मुझको अल्लाह, पुल-सिरात के पास ।

5. काफ़ी है मुझको अल्लाह, उसके सिवा कोई माबूद नहीं, मैंने उसी पर तवक्कुल किया और मैं उसी की तरफ़ रुजूअ होता हूँ ।

– दुर्रे-ए-मंसूर, हिस्सा 2, पेज 103

अल्लाह तआला का कुर्ब हासिल करने की ख़ास दुआ

पाकी है उस जात के लिए जो हमेशा से हमेशा तक है।

पाकी है उस ज़ात के लिए जो एक और यक्ता है।

पाकी है उस ज़ात के लिए जो तन्हा और बे-नियाज़ है ।

पाकी है उस जात के लिए जो आसमान को बग़ैर सुतून के बुलन्द करने वाला है

पाकी है उस जात के लिए जिसने बिछाया ज़मीन को बर्फ़ की तरह ।

पाकी है उस ज़ात के लिए जिसने पैदा किया मख़्लूक को पस ज़ब्त किया और ख़ूब जान लिया उनको गिनकर ।

पाकी है उस जात के लिए जिसने रोजी तक्सीम फ़रमाई और किसी को न भूला।

पाकी है उस जात के लिए जिसने न बीवी अपनाई, न बच्चे ।

पाकी है उस जात के लिए जिसने न किसी को जना, न वह जना गया, और नहीं उसके जोड़ का कोई

अल्लाह का कुर्ब हासिल करने के लिए ऊपर दी गई दुआओं का एहतिमाम कीजिए। इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाहि अलैहि ने अल्लाह तबारक व तआला को 100 मर्तबा ख़्वाब में देखा। जब सौवीं मर्तबा ख़्वाब में देखा तो उन्होंने अल्लाह से पूछा कि या अल्लाह तेरे बंदे तेरा क़ुर्ब हासिल करने के लिए क्या पढ़ें तो यह दुआ अल्लाह ने ख़्वाब में बताई ।

-शामी, हिस्सा 1, पेज 144

तर्जमाः

(1) ऐ मेरे परवरदिगार ! अगर मेरे गुनाह बढ़ गये (तो क्या हुआ) मैं जानता हूँ कि आपकी माफ़ी मेरे गुनाहों से बढ़ी हुई है 

(2) अगर आपकी रहमत के उम्मीदवार सिर्फ़ नेक ही हों तो गुनाहगार किसे पुकारें और किससे उम्मीद रखें। 

(3) ऐ मेरे परवरदिगार मैं तेरे हुक्म के मुताबिक़ तुझे जारी व आजिज़ी से पुकारता हूँ, तू अगर मेरा हाथ नाकाम वापस लौटा देगा (यानी मुझे मायूस कर देगा) तो कौन है रहम करने वाला ?

(4) मेरे पास तो सिर्फ़ आपके बेहतरीन दरगुज़र की उम्मीद के सिवा कोई सहारा नहीं, फिर बात यह है कि मुसलमान भी हू।

Dua से बच्चा का ज़िन्दा हो जाना

हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि हम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मजलिस में बैठे हुए थे कि एक मुहाजिरा औरत अपने बच्चे को लिए हुए आई जो कि सने-बलूग को पहुंच चुका था। आप सल्ल० ने औरत को तो (मेहमान बनाकर) औरतों की तरफ़ भेज दिया और उसके बच्चे को अपने साथ रखा, कुछ दिन ही गुज़रे थे कि वह बच्चा मदीने में बबा की जद में आ गया। वह कुछ दिन बीमार रह कर इंतिक़ाल कर गया। आप सल्ल० ने उसकी आँखें बन्द कीं और उसकी तज्हीज़ व तक्फ़ीन का हुक्म फ़रमाया। जब हमने उसको गुसल देना चाहा तो आप (सल्ल०) ने फ़रमाया: ऐ अनस ! इसकी माँ को जाकर ख़बर कर दो तो मैंने उसको ख़बर कर दी। वह फ़रमाते हैं कि वह आई और उसके क़दमों के पास बैठ गई, उसका एक अंगूठा पकड़ा और फिर कहने लगी। ऐ अल्लाह ! मैं तुझपर खुशी से इस्लाम लाई और मैंने बे-रगबती इख़्तियार करते हुए बुतों की (पूजा की) मुख़ालिफ़त की और शौक़ से तेरी राह मे हिजरत की। ( हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि) ख़ुदा की क़सम ! उसकी बात पूरी भी न होने पाई थी कि उसके क़दमों ने हरकत की और उसने अपने चेहरे से कफ़न हटाया। और वह आप सल्ल० के दुनिया से रहलत फ़रमाने और उसकी माँ के इंतिक़ाल के बाद तक ज़िन्दा रहा। 

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