Duniya kab tak chalegi| Mout क्यू आति है?| Dawat-e-Tabligh

जिस तरह इंसानों और जिन्नों की उम्र मुकर्रर हैं; उसी तरह दुनिया की उम्र भी मुकर्रर है। ‘जिसने पैदा किया मौत को और जिंदगी को ताकि तुमको जांचा जाए कि तुम में कौन अच्छे काम करता है।’…

Duniya kab tak chalegi| Mout क्यू आति है?| Dawat-e-Tabligh
Duniya kab tak chalegi| Mout क्यू आति है?| Dawat-e-Tabligh

परिचय

मरने के बाद दोबारा जिन्दा होना, हश्र का काइम होना और हिसाब व किताब लिया जाना इस्लाम के बुनियादी अकीदों में शामिल है। दुनिया की जिन्दगी में किया जाने वाला छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा अमल उस दिन इन्सान के सामने आ जायेगा और अच्छा या बुरा जैसा भी वह अमल होगा उसका बदला भी ज़रुर दिया जायेगा। वहां न कोई असर व रसूख काम आयेगा, न धन दौलत और न कोई सिफारिश

इस किताब में कुरआन मजीद और हदीस शरीफ़ के हवाले से मैदाने हश्र के हालात, उसकी तफ़्सीलात, और बुरे अमलों की सज़ाएं तफ्सील से बयान की गई हैं।

अल्हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन। वस्सलातु वस्सलामु अला रसूलिही सैयदिना मुहम्मदिंव्व आलिही व अस्हाबिही अजमईन० । अम्मा बद—

 इस दुनिया में जो भी आया, हर एक ने इसको छोड़कर दूसरी दुनिया का रास्ता लिया यानी अपनी उम्र की सांस पूरी करके मौत की कठिन घाटी को तय करके बर्ज़ख़ में पहुंचा। बर्ज़ख़ में अज़ाब और तकलीफें भी हैं और आराम व राहत भी है। अपने-अपने आमाल के एतबार से बर्ज़ख़ में अलग अलग हालात से गुज़रना पड़ता है। दुनिया से जो आता है बर्ज़ख़ में जगह पाता है। ग़रज़ यह कि हर आने वाला जाएगा और

सब ठाठ पड़ा रह जायेगा

 जब लाद चलेगा बंजारा

Duniya ki kitni उम्र ha? 

जिस तरह इंसानों और जिन्नों की उम्र मुकर्रर हैं; उसी तरह दुनिया की उम्र भी मुकर्रर है। जब इस दुनिया की उम्र पूरी होगी; अचानक उसके मज्मूए को मौत आ जाएगी। एक-एक आदमी के चले जाने को मौत और पूरी दुनिया के ख़त्म हो जाने को क़ियामत कहते हैं। मौत और ज़िंदगी की हिक्मत ब्यान फरमाते हुए अल्लाह जल्ल ल शानुहू ने इर्शाद फ़रमाया है:

अल्लज़ी ख़ल कुल मौत वल हया त लियब्लु व कुम
ऐयुकुम अहसनु अ म ला०

Mout क्यू आति है? 

‘जिसने पैदा किया मौत को और जिंदगी को ताकि तुमको जांचा जाए कि तुम में कौन अच्छे काम करता है।’

यानि मौत व ज़िंदगी का यह सिलसिला इसलिए है कि अल्लाह तआला तुम्हारे आमाल की जांच करे कि कौन बुरे काम करता है और कौन अच्छे काम करता है। और अच्छे से अच्छे काम करने वाला कौन है? पहली जिंदगी में अमल का मौक़ा देकर और काम करने का तरीका बताकर इंसान को इम्तिहान में डाला। फिर दूसरी जिंदगी रखी गयी। जिसका एलान पैग़म्बरों की ज़ुबानी साफ़ कर दिया गया कि ऐ इंसानो ! तुमको मरना है और मरने के बाद जी उठना है और जी उठकर पैदा करने वाले व मालिक के हुज़ूर में जवाबदही करना है। सूरः मूमिनून में इंसान की पैदाइश के हालात ब्यान करने के बाद इर्शाद फ़रमाया :

सुम्म म इन्नकुम बञ्ज् द ज़ालि क ल मैयितून । सुम्म म इन्नकुम यौमल कियामति तुब्असून०

‘फिर तुम इसके बाद मरोगे। फिर तुम क़ियामत के दिन खड़े किये जाओगे।’

यानी यह जिंदगी, जिंदगी नहीं है और जीती जागती मूरत और हंसती-बोलती तस्वीर। देखती सुनती जान जो तुमको दी गई है, हमेशा न रहेगी, मौत की घाटी से गुज़र कर एक और जिंदगी पाओगे और अपनी उस प्यारी जान को लेकर अल्लाह के हुज़ूर में पेश होकर ‘वुफ्फियत कुल्लु नपिसम मा अमिलत’ का मंजर देखोगे। 

जैसी करनी वैसी भरनी

आमाल का बदला मिलना ज़रूरी है, इस पर तमाम अक्ल वाले एक राय हैं। ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ मशहूर मिस्ल है जो आम व ख़ास हर एक की जुबान पर है। दुनिया में जो काम इंसान करते हैं, उनके फैसले क़ियामत के दिन होंगे। क़ुरआन मजीद में क़ियामत के दिन को ‘यौमुद्दीन’ (बदले का दिन) और ‘यौमुल फ़स्ल’ (फैसले का दिन) और ‘यौमुल हिसाब’ (हिसाब का दिन) फ़रमाया गया है। उस दिन रिश्तेदार काम न आयेंगे; ताकत न चलेगी, बेकसी और बेबसी की दुनिया होगी, आमाल पेश होंगे। हर भलाई-बुराई सामने आयेगी। सूरः ज़िल्ज़ाल में फरमाया  :

यौ मइजिंय्यस्दुरुन्नासु अश्तातल्लि युरौ अअ मा हुम फ़मैयमल मिस्क़ा ल ज़र्र तिन ख़ैरैंयरः व मैंयमल मिस्का ल ज़र्रतिन शरैंयरः

‘उस दिन अलग-अलग जमाअतों में हो जाएगें ताकि आमाल को देख लें सो जिसने ज़र्रा बराबर नेकी की, वह उसे देख लेगा और जिसने ज़र्रा बराबर बुराई की वह उसे देख लेगा

अपने आप अकेले हाज़िरी होगी और पहले के और आख़िर के लोगों में से कोई छिपकर कहीं न जा सकेगा। अल्लाह का इर्शाद है :

ल क द अहसाहुम व अहम अद्दा व कुल्लुहुम आतीहि यौमल कियामति फ़र्दा ।

‘उसके पास उनकी गिनती है और गिन रखी है उनकी गिनती और क़ियामत के दिन इनमें से हर एक उसके सामने तंहा आयेगा ।’ इंसानों ने जो काम दुनिया में किये थे, उनका अक्सर हिस्सा दुनिया में ही भूल गये थे, फिर आख़िरत में तो क्या याद रखेंगे। लेकिन अल्लाह तआला उनके तमाम आमाल से इत्तिला फ़रमायेंगे। सूरः मुजादला में फ़रमाया : 

यौ म यब्असुहुमुल्लाहु जमीअन फ युनब्बिहुम बिमा अमिलू अहसाहुल्लाहु व नसूह०


मरते के साथ ही कब्र में क्यों फैसला नहीं हो जाता?

रहा यह सवाल कि नेकियों और बुराईयों का बदला क़ियामत के दिन पर उधार क्यों रखा है। मरते के साथ ही कब्र में क्यों फैसला नहीं हो जाता तो इसका जवाब यह है कि अल्लाह तआला हिकमत वाला और जानने वाला है। उनकी हिकमत चाहती है कि फ़ैसलों और बदलों के लिए क़ियामत के दिन का इंतिज़ार किया जाए। अल्लाह जल्ल ल शानुहू के इल्म में तो (खुदा ही बेहतर जाने) कितनी मस्लहतें और हिकमतें होंगी। सरसरी नज़र में जो (मस्लहत) हमारी समझ में आती है, वह यह है कि इस दुनिया में इंसान का तअल्लुक इंसान से भी है और इसके अलावा दूसरी मलूक से भी है और इंसान को अल्लाह तआला की तरफ से हुक्म दिया गया है कि से अच्छा बर्ताव रखे और अच्छा व्यवहार करे। किसी पर जानी या माली ज़ुल्म न करे। मख़्लूक के मलूक पर जो हक हैं, खुले तौर पर पाक शरीअत ने उनसे आगाह (सूचित) फ़रमा दिया है। फिर यह कि इंसान के ज़िम्मे न सिर्फ मख़्लूक के हक हैं बल्कि अल्लाह तआला के हक भी हैं। उनकी तफ्सील भी पाक शरीअत में मौजूद है उसके साथ दूसरी बात यह भी ज़ेहन में रख लीजिए कि नेक अमल और बुरे अमल दोनों की दो किस्में हैं; एक वे अमल कि जो अमल करते ही ख़त्म हो जाते हैं और उनको कर लेने के बाद इंसान अज़ाब या सवाब का हक़दार हो जाता है। दूसरे वह अमल कि जो वुजूद में आते ही ख़त्म नहीं होते बल्कि उनका असर बराबर ज़्यादा-से-ज़्यादा सवाब या अज़ाब का हक़दार होता चला जाता है, जैसे किसी शख़्स ने लिखकर या बोलकर तब्लीग़ (प्रचार) किया और उसके असर से दुनिया में नेकियां जारी हैं या किसी ने कुआं खुदवा दिया है या सराय बनवा दी है या और कोई ऐसा काम कर दिया है जिसका नफा और असर बराबर जारी है तो बहरहाल उसका सवाब भी चालू है। वह मर भी जाएगा तब भी उसका सवाब चालू रहेगा। इसके खिलाफ अगर किसी ने कोई गुनाह का काम चालू किया या किसी को गुनाह का रास्ता बता दिया या कोई ऐसी किताब लिख दी जो इंसानों को गुनाहों पर उभारती रहती है या और कोई ऐसा काम कर दिया जिसकी वजह से गुनाह बराबर जारी हैं तो बहरहाल उसके आमालनामे में गुनाह बढ़ते रहेंगे और ज्यादा-से-ज्यादा अज़ाब का हक़दार होता रहेगा। इससे यह भी साफ़ हो गया कि जिस तरह दुनिया में इंसान के आमाल का खाता बराबर लिखा जाता रहता है इसी तरह मरने के बाद भी उसके आमाल में (अच्छे हों या बुरे) बढ़ोतरी होती रहती है। 

कहने का मतलब यह है कि:

जबकि कब्र (यानी बर्ज़ख़ की दुनिया ) भी अमल का घर है और आख़िरत में जिन आमाल की वजह से अज़ाब या सवाब मिलता है; वह अब भी उसके आमालनामे में जारी हैं (चाहे उसने किये हों या वह उनके – करने की वजह बन गया हो) कैसे दे दिया जाए और आख़िरी फ़ैसला किस तरह हो? फिर चूंकि बंदे के हक के फैसले भी होना ज़रूरी हैं। इसलिए भी क़ियामत के दिन पर फ़ैसला रखा गया। क्योंकि बर्ज़ख़ की दुनिया में तमाम हक़दार मौजूद न होंगे। हर आदमी की मौत का वक्त अलग-अलग है। बर्ज़ख़ की दुनिया में यह आज पहुंचा है और जिसने उसपर ज़ुल्म किया था वह दस वर्ष बाद वहां पहुंचेगा और जिन लोगों पर उसने ज़ुल्म किया है, वह बीस वर्ष बाद दुनिया से रुख़्सत होकर बर्ज़ख़ में जगह पाएंगे। इंसाफ़ का तक़ाज़ा है कि मुद्दई और मुहुआअलैह दोनों मौजूद हों तब फ़ैसला किया जाए ताकि गायबाना फ़ैसला करने पर मुद्दई यह एतराज़ न कर सके कि मेरा हक़ कम दिलाया गया और मुहुआ अलैह यों न कह सके कि मेरे ख़िलाफ़ डिग्री देना उस वक़्त सही होता जब कि मुद्दई मौजूद होता क्या मुम्किन न था कि मुद्दई माफ़ कर देता ।

इसलिए

हिकमत व मस्लहत का तकाज़ा यह हुआ कि एक ऐसी तारीख़ फैसलों और बदलों के लिए मुकर्रर कर दी जाए जिसमें सब हाज़िर हों और जिसमें हर किस्म के आमाल (चाहे खुद किए हों या वास्ते के साथ बंदे के आमालनामे में लिखे गये हों) ख़त्म हो चुके हों ताकि सबके सामने फैसला हो और पूरे आमाल का पूरा बदला दिया जाए। इसी तारीख़ को क़ियामत का दिन कहते हैं। क़ियामत के दिन यह दुनिया ख़त्म हो जाएगी और हर किस्म के अमल और अमल के सिलसिले ख़त्म हो जाएंगे और तमाम अगले व पिछले लोग ज़िंदा करके हाज़िर किये जाएंगे और उस दिन फ़ैसले होंगे और बदले मिलेंगे। 

दुनिया में कर्मो का बदला क्यों नहीं मिलते?

बाकि रहा यह सवाल कि इस दुनिया में क्यों फ़ैसले नहीं होते और बदले क्यों नहीं मिलते तो इसका जवाब यह है कि एक तो यह दुनिया अमल की जगह है इसमें इम्तिहान के लिए आते हैं। अमल की जगह अमल का बदला मिलने लगे तो ग़ैब पर ईमान न रहे और इम्तिहान का मक़सद बेकार हो जाए। फिर यह कि अमल बराबर जारी है। नेकियों से बहुत-से गुनाह (छोटे) माफ़ होते रहते हैं और तौबा करने का भी मौका है। इसलिए यह मुनासिब और सही है कि इस जिंदगी के बाद दूसरी जिंदगी में फ़ैसले हों और बदले दिए जाएं। क़ियामत के दिन जब ख़त्म होगा और सबके फ़ैसले हो जाएंगे तो हर एक अपने-अपने अंजाम के मुताबिक दोज़ख़ में पहुंचेगा। वे गुनाहगार मोमिन बुरे आमाल की वजह से दोज़ख़ में जाएंगे। बाद में जब अल्लाह जल्ल ल शानुहू की मंशा होगी, दोज़ख़ से निकाल कर जन्नत में दाख़िल कर दिए जाएंगे। लेकिन जन्नत से निकाल कर किसी को किसी दूसरी जगह न भेजा जाएगा। क़ियामत के फैसले के बाद जन्नत का फ़ैसला हो जाना ही सच्ची कामयाबी है। क़ुरआन शरीफ़ में है :

कुल्लु नक्सिन ज़ाइक़तुल मौत। व इन्नमा तुवफ़्फ़ौ न उजू कुम यौमल कियामति मन जुहूज़ ह अनिन्नार । व उख़िलल जन्न न त फकुद फा व मल हयातुहुन्या इल्ला मताउल गुरूर०
– आले इमरा न

क्या हर जानदार को मरना है?

‘हर जान मौत को चखने वाली है और तुमको पूरे बदले क़ियामत के दिन दिए जाएंगे। पस जो शख़्स दोज़ख़ से बचा लिया गया और जन्नत में दाख़िल कर दिया गया सो वह पूरा कामयाब हुआ और दुनिया की जिंदगी धोखे की पूंजी के सिवा कुछ भी नहीं है।’ 

इंसान के आमाल का बदला जो दोज़ख़ या जन्नत की शक्ल में मिलेगा और उसके आमाल के फैसले जो कियामत के दिन होंगे, उनके हालात और तफ़सीलात क़ुरआन व हदीस में खूब खोलकर ब्यान किये गये हैं । मुसलमानों के अलावा दूसरी कौमों में भी मरने के बाद अमल का बदला मिलने के बारे में कुछ बातें मिलती हैं लेकिन इनकी कोई सही बुनियाद नहीं जिसकी वजह यह है कि उन बातों को उन्होंने अपनी अटकल से तज्वीज़ कर लिए हैं जो अल्लाह तआला के रसूलों की तालीमात और उनके बताये अक़ीदों के ख़िलाफ़ हैं । जैसे, कुछ क़ौमों में आवागमन का अक़ीदा चला आ रहा है। जिसे उन लोगों ने अपनी तरफ़ से तज्वीज़ किया है। उन लोगों का ख़्याल है कि मरने के बाद इंसान की रूह दूसरे इंसान या जानवर की योनि में जगह पाकर नया जन्म ले लेती है और हमेशा यही होता रहता है। इस अक़ीदे की वजह यह नहीं है कि खुदा के पैग़म्बरों की बतायी हुई बात को मान कर ऐसा कर रहे हैं बल्कि इस अकीदे के गढ़ने की वजह यह है कि इन लोगों को दुनिया में इंसानों के अलग-अलग मर्तबे और दर्जे इस तरह नज़र आये कि कोई हाकिम हैं, कोई महकूम (जिस पर हुकूमत की जाए) कोई अमीर है, कोई ग़रीब है, कोई ख़ादिम है, कोई मख्दूम ( जिस्की ख़िदमत की जाए)। और इसी तरह के अनगिनत फर्क हैं । इस अलगाव की वजह क्या है? इसका फ़लसफ़ा (दर्शन) उन लोगों की समझ में न आया। हज़रत मुहम्मद की शरीअत की तरफ रुजू करते तो इस अलगाव की बहुत-सी वज्हें मालूम हो जातीं। खुद समझना चाहा, इसलिए समझ न सके। मजबूर होकर यह तज्वीज़ किया कि पिछले जन्म में जो कर्म 

किये थे, यह अच्छा या बुरा हाल उसी का नतीजा है। इन नादानों का यह अकीदा जो उनका खुद गढ़ा हुआ है, बहुत-से पहलुओं से ग़लत है। अगर गौर किया जाए तो सरसरी नज़र में एक बड़ा सवाल और एतराज़ इस अकीदे के मान लेने के साथ ही मामूली समझ वाले इंसान की अक्ल में यह आता है कि अमल का बदला (अज़ाब की हैसियत में) सच में, वही बदला समझा जा सकता है, जिसके बारे में बदला मिलने वाले को उसका इल्म और यकीन हो कि मुझे यह आराम या तकलीफ फ़्लां अमल की वजह से है तो उसको बदला कहने का कोई मतलब न हुआ। दुनिया में जो लोग मौजूद हैं, जबकि उनको यह मालूम नहीं कि यह आराम या तकलीफ़ फ़्लां जगह के लिए फ़्लां अमल की वजह से है तो दुनिया के आराम व राहत या तकलीफ व मुसीबत को किसी पिछले जन्म का नतीजा किस तरह माना जाए? सजा भुगतने वाले को जब ही शर्म और पछतावा होगा जबकि उसे यह ख़बर हो कि यह फुलां अमल की सज़ा है। काश! वह अमल मैं न करता ।

बहरहाल हक़ वही है जो हज़रत मुहम्मद ने फ़रमाया और बताया। उन्होंने जो कुछ फ़रमाया, सही फ़रमाया। जो बताया, अल्लाह की तरफ से फ़रमाया। गुमान और अटकल को उन्होंने किसी मतलब का न समझा।

अब मैं क़ुरआन हकीम और नबी करीम के इर्शादात की रौशनी में क़ियामत के हालात तफ़सील से लिखता हूं। ये हालात हक हैं। इनको सच्चा जानो और अपनी आक़बत (अंजाम) की फिक्र करो ।

क़ियामत का आना ज़रूरी है। कोई माने या न माने। वादा सच्चा है। जो होकर रहेगा। जिस वक़्त कुरआन करीम नाज़िल होता था उस वक्त भी क़ियामत के इंकारी थे और आज भी इस साबित सच्चाई से इंकार करने वाले मौजूद हैं। वह्य नाज़िल होते वक्त जो लोगों को इस बारे में शक व शुब्हे थे; बहुत-से मौकों पर क़ुरआन शरीफ़ में उनके जवाब दिए गये हैं। नीचे कुछ आयतें इसी से मुतआल्लिक़ लिखी जाती हैं। सूरः यासीन में फ़रमा याः 

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