दुनिया में aur कितने दिन baki रहे? | चेहरों पर खुशी और उदासी| Dawat-e-Tabligh

वाला कि तुम दुनिया में एक दिन से ज़्यादा नहीं रहे।’ उस दिन से जो बच्चों को बूढ़ा कर देगा।’ ‘कितने चेहरे उस दिन रौशन (और) हंसते (और खुशी करते होंगे..  दुनिया में aur कितने दिन baki रहे? | चेहरों पर खुशी और उदासी| Dawat-e-Tabligh

 दुनिया में कितने दिन रहे? Maidan-e-Hashr| चेहरों पर खुशी और उदासी| Dawat-e-Tabligh
 दुनिया में कितने दिन रहे? Maidan-e-Hashr| चेहरों पर खुशी और उदासी| Dawat-e-Tabligh

दुनिया में aur कितने दिन baki रहे?

अल्लाह तआला ने इस आयत के बाद दूसरी आयत में फ़रमाया :

नहनु अलमु बिमा यकूलू न इज़ यकूलु अम्सलुहुम तरीकृतन इल्लविस्तुम इल्ला यौमा ।

‘हमको अच्छी तरह मालूम हैं, जो कुछ वे कहते हैं। जब बोलेगा उनमें का अच्छी रविश वाला कि तुम दुनिया में एक दिन से ज़्यादा नहीं रहे।’

आख़िरत के लम्बे और वहां कि दर्दनाक मंज़रों को देखकर दुनिया में या कब्र में रहना इतना कम नज़र आयेगा कि गोया दस दिन से ज़्यादा नहीं रहे। दस दिन भी किसी के ख्याल में गुज़ारेगा। वरन् जो इनमें ज़्यादा अकलमंद और अच्छी राय वाला और होशियार होगा, वह कहेगा कि दस दिन कहां? सिर्फ एक ही दिन समझो। इस बात के कहने वाले को अक्लमंद और अच्छे रवैया वाला इसलिए फरमाया कि दुनिया का ख़त्म हो जाना और आख़िरत का बाकी रहना और सख़्ती को उसने दूसरों से ज़्यादा समझा ।

सूरः नाज़िआत में फ़रमाया :

क अन्नहुम यौ म यरौ न हा लम् यल्बसू इल्ला अशीय्यतन औ जुहाहा ।

‘जब वे क़ियामत को देखेंगे तो ऐसा मालूम होगा कि दुनिया में बस एक शाम या उसकी सुबह ठहरे हैं।’

अब तो जल्दी करते हैं और कहते हैं। ‘मता हाज़ल वदु इन कुतुम सादिक़ीन । (यह वादा कब पूरा होगा अगर तुम सच्चे हो) और यह भी कहते हैं कि ‘ऐयाना मुर्साहा’ (कब पूरा होगा क़ियामत का आना) लेकिन जब वह अचानक आ पहुंचेगी, उस वक्त ऐसा मालूम होगा कि बहुत जल्द आयी, बीच में ज़रा देर भी नहीं लगी।

सूरः रूम में फ़रमाया :

वयौ म तमुरसा अ तु युक्सिमुल मुज्मूि न मा लबिसू ग़ै रसातिन क जालि क कानू युअ फकून ।

‘और जिस दिन कायम होगी कियामत, कसम खाकर कहेंगे मुमि कि हम दुनिया में एक घड़ी से ज़्यादा नहीं रहे। इसी तरह उलटे चलते थे।

कब्र में या दुनिया में रहना थोड़ा-सा मालूम होगा। जब कियामत की मुसीबत सर पर आ खड़ी होगी तो अफ़सोस करेंगे और कहेंगे कि दुनिया की और बर्ज़ख़ की जिंदगी बड़ी जल्दी ख़त्म हो गयी। कुछ ज़्यादा मुद्दत ठहरने को मौका मिलता तो इस दिन के लिए तैयारी करते। यह तो एक दम मुसीबत की घड़ी सामने आ गयी। दुनिया के मज़े और लम्बी चौड़ी उम्मीदें सब भूल जाएंगे। बेहूदा उम्र खोने और दुनिया की साज-सज्जा और ओहदों और बड़ाईयों में जो वर्षों गुज़ारे थे, उतनी लम्बी उम्र को घड़ी भर की जिंदगी बतायेंगे। अल्लाह जल्ल ल शानुहू ने फ़रमाया, कजालि क कानू युक्फ्कून यानी इसी तरह दुनिया में उलटी बातें करते थे और बेहूदा ख़्यालात जमाते थे, न दुनिया में हक को माना और दिल में उतारा, न यहां सच बोल रहे हैं।

आगे इर्शाद फ़रमाया :

व कालल्लज़ी न ऊतुल इल मा वल ईमा न लकुद लंबिस्तुम फी किताबिल्लाहि इला यौमिल बअसिफ़ हाज़ा यौमुल बसि व ला किन्ननकुम कुन्तुम ला तअलमून ।

“और कहेंगे इल्म और ईमान वाले, तुम्हारा ठहरना अल्लाह की किताब में जी उठने के दिन तक था, सो यह है जी उठने का दिन, लेकिन तुम जानते न थे।’

इल्म और ईमान वाले उस वक्त उनकी बातों को रद्द करेंगे और कहेंगे कि तुम झूठ बकते हो और यह जो कहते हो कि सिर्फ एक घड़ी रहना हुआ, सरासर गलत है। तुम ठीक अल्लाह तआला के इल्म में और लौहे महफ़ूज़’ के नविश्ता’ के मुताबिक कियामत के दिन तक ठहरे, एक सेकंड की भी कमी नहीं हुई, हर एक को जितनी उम्र मिली थी, उसने सब पूरी की। फिर बर्ज़ख़ की लम्बी जिंदगी गुज़ार कर अब मैदाने हश्र में मौजूद हुआ है। आज वह दिन आ पहुंचा जिसका आना यकीनी था। अब देख लो जिसे तुम जानते और मानते न थे। अगर पहले से उस दिन का यकीन करते तो यहां के लिए ईमान और नेकियों से तैयार होकर आते।

क़ियामत के दिन की परेशानी और हैरानी

क़ियामत का दिन होश गुम कर देने वाला होगा

सूरः इब्राहीम में फ़रमाया :

वला तहसबन्नल्लाह ग़ाफ़िलन अम्मा यअमलुज़्ज़ालिमू न इन्नमा अख़िरुहुम लियौमिन तश्ख़सु फीहिल अब्सारु मुहतिई न मुक्निई रुऊसिहिम ला यतंदु इलैहिम तर्फहुम व अफइदतुहुम हवाउ ।

‘और जो कुछ ज़ालिम करते हैं अल्लाह तआला को उनके आमाल से बेख़बर मत समझ । उनको सिर्फ उस दिन तक मोहलत दे रखी है जिसमें उन लोगों की आंखें फटी रह जाएंगी। दौड़ते होंगे (और) अपने सर ऊपर को उठाये हुए होंगे, उनकी नज़र उनकी तरफ़ हटकर न आयेगी और उनके दिल बिल्कुल बदहवास होंगे।’

महशर की तरफ (कब्रों से निकल कर ) सख्त परेशानी और हैरत से ऊपर को सर उठाये टकटकी बांधे घबराते हुए चले जाएंगे। हक्का-बक्का होकर देखते होंगे। ज़रा पलक भी न झपकेगी। दिलों का यह हाल होगा कि होश से बिल्कुल खाली होंगे, खीफ में उड़े जा रहे होंगे।

सूरः हज में फ़रमाया  :

या ऐयुहत्रासुतक रब्बकुम इन्न न जुल जुलतस्साअति शैउन अज़ीम तरौ न हा तज़हलु कुल्लु मुर्जिअतिन अम्मा अर्जुअत व तज़ कुल्लु जाति हम्लिन हम्लहा व तरन्ना स सुकारा व मा हुम विकाराला नाहि शदीद।

‘ऐ लोगो ! डरो अपने रब से बिला शुब्हा क़ियामत का भूचाल एक बड़ी चीज है जिस दिन उसको देखोगे, भूल जाएगी हर दूध पिलाने वाली अपने दूध पिलाने को और गिरा देगी हर हमल वाली अपने हमल को और तू देखेगा लोगों को नशे में और (हकीकत में), वे नशे में न होंगे लेकिन अल्लाह का अज़ाब सख़्त है।’

कियामत के बड़े जाते हैं कियामत से कुछ पहले जो कियामत की निशानियों में से हैं दूसरा उस वक़्त जब दोबारा सूर फूंके जाने के बाद कब्रों से निकल खड़े होंगे। इस आयत में अगर पहला जल्जला मुराद है तो दूध पिलाने वालियों का बच्चों को भूल जाना और हामिला औरतों का अपने-अपने हमल गिरा देना हक़ीक़ी और ज़ाहिरी मानी के एतबार से मुराद होगा और अगर दूसरे मानी मुराद हों तो यह मिसाल के तौर पर कहा गया समझा जाएगा यानी कियामत की घबराहट और सख्ती इतनी होगी कि अगर औरतों के पेटों में उस वक्त हमल हों तो उनके हमल गिर जाएं और उनकी गोदों में दूध पीते बच्चे हों तो उनको भूल जाएं।

इस वक़्त लोग इतने डरे हुए होंगे कि देखने वाला ख्याल करेगा कि ये लोग शराब के नशे में हैं हालांकि वहां नशे का क्या काम ? अज़ाब की सख़्ती होश गुम कर देगी। सूरः मुज्जम्मिल में इर्शाद है :

फ कै फ तत्तक्कू न इन कर्तुम यौमैंयज्अलुल विल्दा न शीबा ।

‘सो अगर तुम कुफ़ करोगे तो कैसे बचोगे उस दिन से जो बच्चों को बूढ़ा कर देगा।’

अगर दुनिया में बच गये तो उस दिन किस तरह बचोगे जिस दिन की तेज़ी और लम्बाई बच्चों को बूढ़ा कर देने वाली होगी। चाहें, सच में बूढ़ें न हों मगर वह दिन ऐसा सख़्त होगा कि उसकी सख़्ती और लम्बाई बच्चों को बूढ़ा कर देने वाली होगी।

चेहरों पर खुशी और उदासी

महशर में सब ही हाज़िर होंगे अल्लाह के नेक बंदों के चेहरे सफेद और खुश और हंसते-खेलते होंगे और काफिरों और नाफरमानों के चेहरों पर उदासी और ज़िल्लत छायी होगी। सूरः आले इमान में फरमाया:

यो म तब्य वुजूहुब्ब तस्वदु वुजूह । फ अम्मल्लज़ी नस्वद्दत वुजूहुहुम अ कर्तुम ब द ईमानिकुम फ कुल अजा व विमा कुन्तुम तक्कुरून । व अम्मल्लज़ी नव यज्जत बुजूहुहुम फफी रहमतिल्लाहि हुम फीहा खालिदून ।

“जिस दिन कुछ चेहरे सफेद होंगे और कुछ स्याह होंगे। सो जिनके चेहरे स्याह होंगे, उनसे कहा जाएगा क्या तुम काफिर हुए बाद ईमान लाने के। बस चखो अज़ाब इस वजह से कि तुम कुफ्र करते थे और जिनके चेहरे सफेद हुए ‘सो वह अल्लाह की रहमत में होंगे, वे उसमें हमेशा रहेंगे।’

कुछ के चेहरों पर ईमान व तक्वा का नूर चमकता होगा और इज़्ज़त के साथ खुश-खुश नज़र आएंगे उनके खिलाफ दूसरों के मुंह कुफ व निफाक को स्याही से काले होंगे। शक्ल से ज़िल्लत व रुस्वाई टपक रही होगी। हर एक का ज़ाहिर उसके भीतर का आईना होगा।

सूरः अ ब स में फरमाया :

वुजूहुयौ म इज़िम मुस्फिरः । ज़ाहिकतुम मुस्तब्शिरः । व वुजूहुंयौ म इजिन अलैहा ग़ व रः । तर्हकुहा कुतरः । उलाई के हुमुल क फ र तुल फ ज रः०

‘कितने चेहरे उस दिन रौशन (और) हंसते (और खुशी करते होंगे और कितने चेहरे उस दिन ऐसे होंगे कि उन पर गर्द पड़ी होगी और स्याही चढ़ी आती होगी। ये लोग काफिर व नाफर्मान होंगे।’

ईमान और नेक कामों की वजह से नेक बन्दों के चेहरे रौशन होंगे। उनकी शक्लों से खुशी और ताज़गी ज़ाहिर हो रही होगी और जिन नालायकों दुनिया से खुदा को भुला दिया, ईमान और नेक कामों के नूर से अलग रहे और कुफ और नाफर्मानी की स्याही में घुसे रहे, क़ियामत के दिन उनके चेहरों पर स्याही चढ़ी होगी। ज़िल्लत और रुस्वाई के साथ महशर में हाज़िर होंगे और अपने बुरे आमाल की वजह से उदास हो रहे होंगे और डरे हुए होकर यह सोचते होंगे कि वहां हमसे बुरा बर्ताव होने वाला है और वह आफत आने वाली है जो कमर तोड़ देने वाली होगी। (तजुन्नु पैंयुफ़ अ ल बिहा फाकिरः)

इर्शाद फ़रमाया सरवरे आलम ने कि क़ियामत के दिन हज़रत इब्राहीम की उनके बाप आज़र से मुलाकात हो जाएगी। उनके बाप के चेहरे पर स्याही होगी और गर्द पड़ी होगी। हज़रत इब्राहीम अपने बाप से फ़रमायेंगे – क्या मैंने न कहा था कि मेरी नाफरमानी नं करो। उनका बाप कहेगा कि आज आप की नाफरमानी न करूंगा। उसके बाद हज़रत इब्राहीम अल्लाह के दरबार में अर्ज़ करेंगे कि आपने मुझ से वादा फरमाया था कि कियामत के दिन मुझे आप रुरखा न करेंगे, इससे ज्यादा क्या रुस्वाई होगी कि मेरा बाप हलाक हो रहा है। अल्लाह ताला शाहू फरमायेंगे कि मैंने काफिरों पर जन्नत हराम कर दी गई है (तुम्हारा बाप अजाय से बचकर ‘जन्नत में नहीं जा सकेगा फिर हज़रत इब्राहीम से पूछा जाएगा कि आपके पांव में क्या है? वह नज़र करेंगे तो एक लिथड़ा हुआ बिज्जू नज़र आएगा फिर इस बिज्जू की टांगें पकड़कर दोज़ख़ में डाल दिया जाएगा।

अल्लाह तआला शाहू अपनी कुदरत से आज़र को बिज्जू की शक्ल में कर देंगे ताकि हज़रत इब्राहीम की रुस्वाई न हो और उनको अपने बाप की शक्ल देखकर तरस भी न आये। अल्लाह अल्लाह ! यह किसके बाप का अंजाम हुआ? हज़रत इब्राहीम के बाप का ! जो नबियों के बाप हैं और ख़ुदा के दोस्त हैं। जिनकी मिल्लत (तरीके) की पैरवी करने का हुक्म हज़रत मुहम्मद रसूलुल्लाह को हुआ। जिन्होंने खाना काबा बनाया। काफिर बाप के हक में उनकी सिफ़ारिश भी न चली! कहां हैं वह पीर-फकीर जो नसब और रिश्ते पर फन करने वाले हैं और जो बुरे करतूतों के साथ रिश्तों की आड़ लेकर • बख़्शे जाने के उम्मीदवार बने हुए हैं ।

महशर में पसीने की मुसीबत

हज़रत मिक़दाद 44 रिवायत करते हैं कि प्यारे नबी० ने इर्शाद फ़रमाया कि क़ियामत कि दिन सूरज मख्लूक से इतना करीब हो जाएगा कि उनसे करीब एक मील के फासले पर होगा और आमाल की बुराईयों के बराबर लोग पसीने में होंगे। बस कोई तो पसीने में टखनों तक होगा और किसी के घुटनों तक पसीना होगा और किसी के तहमद बांधने की जगह पसीना होगा और किसी का यह हाल होगा कि पांव से लेकर मुंह तक पसीना होगा। उसका पसीना लगाम की तरह मुंह में घुसा हुआ होगा।’

एक हदीस में हैं कि प्यारे नबी ने इर्शाद फरमाया कि हश्र के मैदान में इंसान को इतना पसीना आयेगा और लगातार बाकी रहेगा कि इंसान यह कह उठेगा कि ऐ रब! आप का मुझे दोज़ख़ में भेज देना मेरे लिए इस मुसीबत से आसान है। महशर के अज़ाब की सख़्ती को देखकर ऐसा कहेगा। हालांकि दोजख के अज़ाब की सख़्ती को जानता होगा ।

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सूरज बेनूर होने के बाद महशर में लोगों के सरों से एक मील होकर कैसे गर्मी पहुंचाएगा ?

1. पहले गुज़र चुका है कि कियामत कायम होने से चाँद सूरज बेनूर हो जाएंगे, आसमान फट जाएगा। अगर कोई सवाल करे कि सूरज बेनूर होने के बाद महशर में लोगों के सरों से एक मील होकर कैसे गर्मी पहुंचाएगा जवाब यह है कि एक तो बेनूर होने के साथ उसकी जलन और गर्मी का ख़त्म हो जाना जरूरी नहीं और अगर यह मान लिया जाए कि बेनूर होने के साथ उसकी जलन भी जाएगी तो दूसरा जवाब यह है कि उसको दोबारा रोशनी और गर्मी देकर महशर में सरों पर कायम किया जाएगा फिर इसके बाद दोबारा बेनूर करके दोज़ख़ में डाल दिया जाएगा ताकि उसके पुजारियों को सबक मिले और समझ लें कि यह पूजा के काबिल होता तो खुद क्यों दोज़ख़ में पड़ा होता। बहरहाल आयतों और हदीसों में जो कुछ आया है उसपर ईमान लाना जरूरी है।

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