Hazratji Maulana Yousuf कि जिंदगी |मक्तूबे गिरामी| Dawat-e-Tabligh

इसके बाद मरहूम ने हवाई जहाज से वह उड़ान भरी कि वह आसमान पर पहुंच गया और यह नाकारा ज़मीन पर ही पड़ा हुआ..

Hazratji Maulana Yousuf कि जिंदगी|मक्तूबे गिरामी| Dawat-e-Tabligh
Deen ki Mehnat

परिचय

हज़रत मौलाना शाह मुहम्मद यूसुफ़ साहब कुद्दिस सिह के बारे में सैयदुल औलिया हज़रत शेखुल हदीस

मौलाना मुहम्मद जकरिया साहब मद्दजिल्लहू का मक्तूबे गिरामी।

बनाम एडीटर साहब रिसाला ख़ुद्दामुद्दीन लाहौर

बराए रिसाला ‘हजरत जी नम्बर’

इनायत फ़रमाएम सल्लमहू, बाद सलाम मस्नून ।

कई दिन हुए, गिरामीनामा कार्ड ‘हजरत जी नम्बर’ के लिए मज़्मून की तलब में आया था। एक तो गिरामीनामा इतनी देर से पहुंचा कि आपकी तहरीर की हुई तारीख़ पर तो जवाब पहुंच ही नहीं सकता था। इसके अलावा इस नाकारा को इस क़िस्म के मज़्मून लिखने की बिल्कुल आदत नहीं और न इस क़िस्म के मज़्मूनों से मुनासबत है। हज़रते अक्दस मदनी और हज़रते अक़्स रायपुरी नव्वरल्लाहु मरक़दहुमा के विसाल पर बहुत से अह्वाब के इसरार हुए। इसी तरह दूसरे अकाबिर के इंतिक़ाल पर अहबाब के इसरार होते रहे, मगर यह नाकारा इंकार करता रहा। इस नाकारा के हवाले से इन अकाबिर के सवानहों में जहां कहीं मज़ामीन छपे हैं, उसकी सूरत यह रही है कि तालीफ़ करने वाले अबाब आकर उनके अह्वाल मालूम करते रहे और यह नाकारा अपनी मालूमात से जवाब अर्ज करता रहा। अज़ीज़ मौलाना मुहम्मद यूसुफ़ मरहूम की पैदाइश 25 जुमादल ऊला 1335 हि० मुताबिक़ 20 मार्च 1917 ई० मंगल को हुई थी, 2 जुमादस्सानी, पीर के दिन अक़ीक़ा हुआ था, इसके बाद इसके सिवा क्या कहूं—

शुरू में वह मेरा छोटा भाई था, शागिर्द था, मेरी तर्बियत में था। वह मेरी नालायकी, सख्त मिजाजी की वजह से अपने वालिद यानी मेरे चचा जान नव्वरल्लाहु मरक़दहू के मुक़ाबले में इस नाकारा से बहुत ज़्यादा डरता था। चचा जान के हुक्मों को वह पिदराना नाज की वजह से और अपने बचपन की वजह से कभी टाल देता था, लेकिन इस नाकारा की सख्त मिजाजी की वजह से मेरे कहने को नहीं टालता था। चचा जान को कभी-कभी यह इर्शाद फ़रमाना पड़ता कि यूसुफ़ से फ़्लां काम लेना है, तुम्हारे कहने से जल्दी कर देगा। दिल्ली के दोस्तों का चचा जान पर बहुत इसरार होता कि साहबजादे सल्लमहू को शादी में ज़रूर लाएं, मगर मरहूम अपने तलवे इल्म में इस क़दर मुनहमिक था कि उसको यह हरज बहुत नागवार होता। कभी-कभी इसकी नौबत आई कि इन वक़्तों में अगर इस नाकारा का दिल्ली जाना होता तो अज़ीज़ मरहूम मुझसे जाते ही यह वायदा ले लेता कि भाई जी फ़्लां जगह जाने का मुझसे आप न कहें और चाचा जान मुझसे इर्शाद फ़रमाते कि यूसुफ को भी साथ ले लीजियो तो मैं यही माज़रत करता कि उसने आते ही मुझसे यह वायदा ले लिया है कि मैं न कहूं।

यह तो शुरूआत थी, इसके बाद मरहूम ने हवाई जहाज से वह उड़ान भरी कि वह आसमान पर पहुंच गया और यह नाकारा ज़मीन पर ही पड़ा हुआ उसकी बुलन्दी को देखता रहा। चचा जान के विसाल के बाद ही एक उड़ान उसने भरी, जिसके बारे में इस नाकारा का और हज़रते अवदस रायपुरी नव्यल्लाहु मरक्रदद्दू का यह ख्याल हुआ कि चचा जान नव्वरल्लाहु मरकंदहू की निस्बते ख़ास्सा मुंतक़िल हुई है और हर-हर बात में उसका ख़ूब मुशाहदा होता। इसके बाद से उसकी तरक्क्रियात को देखता रहा। हज़रत मदनी क्रुद्दिस सिह के विसाल के बाद से मरहूम में एक जोश की कैफ़ियत पैदा हुई और किसी बड़े से बड़े जी वजाहत शख्स के सामने भी अपनी बात को बड़ी जुति और बेखौफ़ी से कहने का जहूर हुआ और वह बढ़ता ही रहा।

इसके बाद हज़रते अवदस रायपुरी नव्वरल्लाहु मरक्रदहू के विसाल के बाद उसकी बातों और तकरीरों में अन्वार और तजल्लियात का जहूर पैदा हुआ। क्या बईद है कि इन दोनों बुजुर्गों की खुसूसी तवज्जोहात और मरहूम के साथ ख़ास शफ़क़त और मुहब्बत का यह समरा हो। इन्हीं चीजों का यह असर हुआ जो इस नाकारा ने शुरू में शेर में जाहिर किया कि फिर यह नाकारा इससे मरऊब होने लगा कि उसके इसरार पर मुझे मुखालफत दुश्वार हो गई। इसका असर था कि पिछले साल अपनी इंतिहाई माजूरियों और मजबूरियों, मर्जी की शिद्दत के बावजूद जब मरहूम ने इस पर इसरार किया कि तुम्हें हज को मेरे साथ जरूर चलना है, तो मुझे इंकार की हिम्मत न पड़ी, और जब मैंने अपने मज़ों को ज़ाहिर किया और कहा कि मेरे उज़्रों को नहीं देखते हो, तो मरहूम ने यह कहा कि खूब देख रहा हूं, मगर मेरा जी चाहता है कि आप ज़रूर चलें। आखिर में अल्लाह जल्लशानुहू ने अपने लुत्फ़ व करम की वह बारिश फ़रमाई कि मुझ जैसे बे-बसीरत को भी बहुत-सी चीजें खुली महसूस होती थीं। इस क़िस्म की चीजें न लिखनी आती हैं, न लिखने को दिल चाहता है। सिर्फ़ एक औरत के ख़्वाब पर अरीज़े को ख़त्म करता हूं।

ख़्वाब तो मरहूम के हादसे के बाद लोगों ने अजीब-अजीब देखे और लिखे, लेकिन यह ख़्वाब चूंकि इस नाकारा के नज़दीक लफ़्ज़-ब-लफ़्ज़ वाक़िया है, इसलिए लिखवा रहा हूं। इस हादसे पर अपने ताल्लुक़ात के मुवाफ़िक साथ ही अपनी दिली कमज़ोरी व तहम्मुल के मुवाफ़िक़ असरात तो बहुत ही आम हुए, लेकिन एक औरत के बारे में मालूम हुआ कि वह किसी भी वक़्त चुप न होती थी, हर वक़्त रोती थी, बार-बार वुजू करती और तस्बीह लेकर बैठ जाती। वह इसी हाल में एक बार वुज़ू करके तस्बीह लेकर बैठी थी कि उसको ऊंघ आ गई। उसने अजीज मरहूम को देखा। वह फ़रमा रहे हैं कि क्यों पागल हो गई है? मरना तो सभी को है। ताल्लुक़ मालिक से पैदा किया करे हैं, बन्दे से नहीं

इस पर उसने वालिहाना अन्दाज़ में यों कहा, हजरत जी ! यह एकदम ही हुआ क्या? मरहूम ने कहा, कुछ भी नहीं। कुछ दिनों से जब मैं तक़रीर किया करता था तो मुझ पर इलाही तजल्लियात का ख़ास जहूर हुआ करता था। इस बार जब मैं रात को तक़रीर कर रहा था तो उनका इतना ज़्यादा ज़हूर हुआ कि मेरा दिल उनका तहम्मुल न कर सका और दौरा पड़ गया। इसके बाद मुझे एक बहुत बड़ा गुलाब का फूल सुंघाया गया। इसके साथ मेरी रूह निकल गई। बस इतनी सी बात हुई, फ़क़त ! अज़ीज़ मरहूम की पहली शादी मेरी सबसे बड़ी लड़की से 3 मुहर्रम सन् 1365 हि० के मज़ाहिरे उलूम के सालाना जलसे में हुई थी। हज़रत मदनी नव्वरल्लाहु मरक़दहू ने निकाह पढ़ा था, चूंकि पहले से कोई तज्वीज़ न थी। ठीक वक़्त पर चचा जान ने फ़रमाया, निकाह का इरादा है, इसलिए उस वक़्त रुख़्सती न हुई। लगभग एक साल बाद चचा जान नव्वरल्लाहु मरक़दहू की एक आमद पर इसी तरह फ़ौरी तौर पर बिना साबिक़ा तज्वीज़ के रुख़्सती हुई और 23-24 रमज़ान सन् 1358 हिο पीर-मंगल की दर्मियानी रात में 12 बजकर 40 मिनट पर अज़ीज़ हारून सल्लमहू की पैदाइश हुई। हक़ तआला शानुहू अपने फ़ज़्ल व करम से उसको अपने बाप-दादा के नक्शे कदम पर चलने की तौफ़ीक़ अता फरमाए ।

-फ़क़त वस्सलाम 

जकरिया, मज़ाहिरे उलूम 12 मुहर्रम 1385 हि० बक़लम

मुहम्मद आक़िल गुफि-र लहू

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