क्या जानवर Jannat में जाएंगे ? | कमजोर पर जुल्म करना – Dawat~e~Tabligh

जानवारो का izzat करनामचवारा ka दर्द | कमजोर पर जुल्म करना। एक मछेरे का दर्द भरा किस्सा-जैसी करनी वैसी भरनी जुल्म से बचिए। क्या जानवर Jannat में जाएंगे ? | कमजोर पर जुल्म करना – Dawat~e~Tabligh Web Stories in Hindi…

क्या जानवर Jannat में जाएंगे ? | कमजोर पर जुल्म करना - Dawat~e~Tabligh
क्या जानवर Jannat में जाएंगे ? | कमजोर पर जुल्म करना – Dawat~e~Tabligh

क्या जानवर Jannat में जाएंगे ?

  • कुछ जानवर जन्नत में जाएंगे

अल्लामा सय्यद अहमद हमवी रहमतुल्लाहि अलैहि शरह अल्-शिबाह वलू नज़ाइर, पेज 395 में ब-हवाला शरह शरअतुल इस्लाम हज़रत मक्कातिल रहमतुल्लाह अलैह से नक़ल किया गया है कि दस जानवर जन्नत में जाएंगे—

1. नाका-ए-मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ।

2. नाका-ए-सालेह अलैहिस्सलाम।

3. अजले-इब्राहीम अलैहिस्सलाम ।

4. कयो-इस्माईल अलैहिस्सलाम।

5. बकर-ए-मूसा अलैहिस्सलाम

6. हूते-यूनुस अलैहिस्सलाम ।

7. हिमारे-उजैर अलैहिस्सलाम ।

8. नमल-ए-सुलैमान अलैहिस्सलाम ।

9. हुदहुदे सुलैमान अलैहिस्सलाम ।

10. कल्बे – अरहावे- कहफ़ ।

मिश्कातुल अनवार में लिखा है कि इनका भी हश्र होगा।

-फ़ताबा महमूदिया, हिस्सा 5, पेज 372

जानवारो का izzat करना

  • बाज़ वहशी जानवरों का आंहज़रत सल्ल० की इज़्ज़त करना

हज़रत आइशा रज़ि से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ल० के घर में एक जंगली जानवर था। जब आप सल्ल० बाहर चले जाते तो इधर-उधर दौड़ता और खिलाड़ियां करता और जहां आप सल्ल० की तशरीफ़ आवरी की आहट महसूस करता बस फ़ौरन एक गोशे में दुबक कर बैठ जाता और ज़रा आवाज़ न निकालता इस ख्याल से कि मुबादा आप सल्ल० को तकलीफ़ हो ।

(मुस्नद अहमद, अबू याला, अलविदाया वन्निहाया, तर्जुमान अस-सुन्नह जिल्द 4, पेज 150 )

फायदा : जहां तक अल्फ़ाज़ रिवायत से मालूम होता है कि यह वहशी जानवर हिरण था जिसमें तर्बियत का असर बहुत कम होता है। हां, बाज़ और हैवानात ऐसे हैं जिनमें तदरीब व तर्बियत से कुछ न कुछ तहज़ीब की हरकात पैदा हो जाती हैं, मगर यह ज़ाहिर है कि उस वक़्त अरब में बिल उमूम हिरण की तर्बियत व तहज़ीब करने की आदत न थी, बिल खुसूस वैते नुबूवत में हैवानात की तर्वियत का क्या तसव्वुर किया जा सकता है पर जो जानवर घरों में घुल-मिल जाते हैं वह आम तौर पर अपने मालिक को देखकर ख़ुशी में कूदने- उछलने लगते हैं, मगर यहां सूरत उसके विपरीत थी, यानी जब आप सल्ल० बाहर तशरीफ़ ले जाते तो वह कूदता उछलता और जब वह आप सल्ल० को देख लेता, बस फ़ौरन ख़ामोश होकर एक गोशे में जा बैठता।

(तर्जुमानु-सुन्नह, जिल्द 4, पेज 150 )

मचवारा ka दर्द | कमजोर पर जुल्म करना

  • एक मछेरे का दर्द भरा किस्सा-जैसी करनी वैसी भरनी जुल्म से बचिए

अल्लामा इब्ने हजर रह० ने अपनी किताब अज्ञ जवाजिर में लिखा है कि एक शख्स ने कहा कि मैंने एक शख्स को देखा जिसका हाथ कांधे से कटा हुआ था और वह चीख-चीख कर कह रहा था मुझे देखकर इवरत हासिल करो, और किसी पर हरगिज़ जुल्म न करो मैंने आगे बढ़कर उससे पूछा कि मेरे भाई तेरा क्या क़िस्सा है? उस शख़्स ने जवाब दिया कि भाई मेरा क़िस्सा अजीब व गरीब है। दरअस्ल मैं ज़ुल्म करनेवालों का साथ दिया करता था। एक दिन का जिक्र है कि मैंने एक मछेरे को देखा जिसने काफ़ी बड़ी मछली पकड़ रखी थी। मछली मुझे पसन्द आई। मैं उसके पास पहुंचा और कहा कि मुझे यह मछली दे दो। उसने जवाब दिया में यह मछली तुम्हें नहीं दूंगा; क्योंकि इसे फ़रोख्त करके उसकी क़ीमत से मुझे अपने बाल-बच्चों का पेट पालना है। मैंने उसे मारा-पीटा और उससे ज़बरदस्ती मछली छीन ली और अपनी राह ली।

जिस वक़्त में मछली को उठाए जा रहा था, अचानक मछली ने मेरे अंगूठे में ज़ोर से काट लिया। में मछली लेकर घर आया और उसे एक तरफ़ डाल दिया। अब मेरे अंगूठे में टीस और दर्द उठा और इतनी तकलीफ़ होने लगी कि उसकी शिद्दत से मेरी नींद उड़ गई। फिर मेरा पूरा हाथ सूज गया। जब सुबह हुई तो में तबीब के पास आया और उससे दर्द की शिकायत की। तबीब ने कहा कि यह अंगूठा सड़ना शुरू हो गया है लिहाजा बेहतर है कि इसको कटवा दो, वरना पूरा हाथ सड़ जाएगा। मैंने अंगूठा कटवा कर निकलवा दिया, लेकिन उसके बाद सड़ांद हाथ में शुरू हुई और दर्द की शिद्दत से में सख्त बेचैन हो गया और सो न सका। लोगों ने मुझसे कहा कि हवेली काटकर निकलवा दो। मैंने ऐसा ही किया। अब दर्द बढ़कर पहुंचों तक पहुंच गया। मेरा चैन और नींद सब उड़ गई और में दर्द की शिद्दत से रोने और फ़रियाद करने लगा। एक शख्स ने मशविरा दिया कि कोहनी से हाथ अलग कर दो। मैंने ऐसा ही किया लेकिन अब दर्द मोंटे तक पहुंच गया और सड़ांद वहां तक पहुंच गई। लोगों ने कहा कि अब तो पूरा हाथ मोठे से कटवा देना होगा वरना तकलीफ़ पूरे बदन में फैल जाएगी। अब लोग मुझसे पूछने लगे कि आखिर यह तकलीफ तुम्हें क्योंकर शुरू हुई।

मैंने मछली का किस्सा उन्हें सुनाया। उन्होंने कहा, अगर तुम इब्तदा में मछली वाले के पास जाकर उससे माफ़ी मांगते, उसे कह-सुनकर राज़ी कर लेते और किसी सूरत में मछली को अपने लिए हलाल कर लेते तो तुम्हारा हाथ यूँ काटा न जाता इसलिए अब भी जाओ और उसको ढूंढकर उससे खुश करो, वरना तकलीफ़ पूरे बदन में फैल जाएगी। उस शख्स ने कहा कि मैंने यह सुना तो मछलीवाले को पूरे शहर में टूटने लगा। आखिर कार एक जगह उसको पा ही लिया। मैं उसके पैरों पर गिर पड़ा और उन्हें चूमकर रो-रोकर कहा कि मेरे आका तुम्हें अल्लाह का वास्ता मुझे माफ़ कर दो। उसने मुझसे पूछा तुम कौन हो? मैंने बताया कि मैं यह शख्स हूं जिसने तुमसे मछली छीन ली थी। फिर मैंने उससे अपनी कहानी बयान की और उसे अपना हाथ दिखाया यह देखकर रो पड़ा और कहा, मेरे भाई।

मैंने इस मछली को तुम्हारे लिए हलाल किया, क्योंकि तुम्हारा हश्र मैंने देख लिया। मैंने उससे कहा, मेरे आका। ख़ुदा का वास्ता देकर मैं तुमसे पूछता हूं कि जब मैंने तुम्हारी मछली छीनी तो तुमने मुझे कोई बद्दुआ दी थी। उस शख्स ने कहा, हां, मैंने उस वक्त यह दुआ मांगी कि ऐ अल्लाह ! यह अपनी कुव्वत और जोर के घमंड में मुझ पर ग़ालिब आया और तूने जो रिज़्क दिया उसने मुझसे छीन लिया और मुझ पर जुल्म किया, इसलिए तू मेरे सामने इस पर ज़ोर का करिश्मा दिखा। मैंने उसे कहा मेरे अल्लाह ने अपना ज़ोर तुम्हें दिखा दिया। अब मैं अल्लाह के सामने तौबा करता हूं और वादा करता हूं कि किसी ज़ालिम की मदद हरगिज़ नहीं करूंगा, न कभी खुद जुल्म करूंगा। न उनके दरवाज़े पर कभी जाऊंगा और इंशाअल्लाह जब तक ज़िंदा रहूंगा, अपने वादे पर कायम रहूंगा।

किसी शायर ने क्या ख़ूब कहा है :

जब तुम्हें इक्तदार हासिल है, किसी पर हरगिज़ जुल्म न

करो क्योंकि जुल्म का अंजाम नदामत और शर्मिंदगी है।

तेरी दोनों आंखें सोती हैं और मजलूम जागता है और तुझे

बद्दुआएं देता है और अल्लाह की आंख कभी नहीं सोती।

एक दूसरे शायर ने कहा :

जब ज़ालिम सवार होकर धरती का सीना रौंदता है और हर

करतूत में हद से गुज़र जाता है,

तब तुम उसे ज़माने की गर्दिश के हवाले कर दो, क्योंकि

जमाना उसके सामने वह चीज़ खोल कर रख देगा जो उसके

वहम व गुमान में भी न होगी।

( मुआशिरे की मुहलिक बीमारियां, पेज 376)

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