Jung-e-बद्र के कैदिया | गजवा-ए-बद्र ka kissa – Dawat~e~Tabligh

हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दामाद अबुल आस बिन रबीअ का दर्द भरा क़िस्सा। Jung-e-बद्र के कैदिया | गजवा-ए-बद्र ka kissa – Dawat~e~Tabligh in Hindi…

Jung-e-बद्र के कैदिया | गजवा-ए-बद्र ka kissa - Dawat~e~Tabligh
Jung-e-बद्र के कैदिया | गजवा-ए-बद्र ka kissa – Dawat~e~Tabligh

गजवा-ए-बद्र ka kissa

  • गजवा-ए-बद्र की बे-सरो-सामानी

12 मज़ानुल मुबारक को रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मदीना मुनव्वरा से रवाना हुए। 313 या 314 या 315 आदमी आपके हमराह थे। बे-सरो-सामानी का यह हाल था कि इतनी जमाअत में सिर्फ़ दो घोड़े और 70 ऊँट थे। एक घोड़ा हज़रत ज़ुबैर बिन अव्वाम का और एक हज़रत मिक़दाद का था और एक-एक ऊँट दो-दो और तीन-तीन आदमियों में बटा हुआ था। अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद फ़रमाते हैं कि बद्र में जाते वक्त एक ऊँट तीन-तीन आदमियों में बटा हुआ था। एक के बाद दूसरा सवार होता था। अबू लुबाबा रज़ियल्लाहु अन्हु और हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के शरीक थे। जब रसूलुल्लाह सल्ल० के पैदल चलने की बारी आती तो अबू लुबाबा और अली मुर्तज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु अर्ज़ करते कि या रसूलुल्लाह ! आप सवार हो जाइये हम आपके बदले में पैदल चल लेंगे, आप सल्ल० यह इर्शाद फ़रमाते तुम चलने में मुझसे ज्यादा क़वी (मज़बूत) नहीं और मैं तुमसे ज़्यादा ख़ुदा के अज्र से बे-नियाज़ नहीं ।

-सीरते मुस्तफा, हिस्सा 2, पेज 58

Jung-e-बद्र के कैदिया

  • हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दामाद अबुल आस बिन रबीअ का दर्द भरा क़िस्सा

बद्र के कैदियों में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दामाद • अबुल आस बिन रबीअ भी थे हजरत सल्ल० की साहबज़ादी हज़रत ज़ैनब रज़ियल्लाहु अन्हा जो हज़रत खदीजतुल कुब्रा रज़ियल्लाहु अन्हा के वतन से थीं, अबुल आस की बीवी थीं। हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा अबुल आस की ख़ाला थीं उनको अपनी औलाद के बराबर समझती थीं।

खुद हज़रत खदीजा रज़ियल्लाहु अन्हा ने आप सल्ल० से कहकर बेअसत से पहले हज़रत जैनव रज़ियल्लाहु अन्हा का निकाह अबुल आस से किया था। अबुल आस बड़े मालदार और अमानतदार ताजिर थे। विअसत के बाद हज़रत खदीजा रज़ियल्लाहु अन्हा और आप सल्ल० की सब साहबज़ादियाँ ईमान लाई मगर अवुल आस शिर्क पर कायम रहे। कुरैश ने अबुल आस पर बहुत जोर दिया कि अबू लहब के बेटों की तरह तुम भी मुहम्मद (सल्ल०) की बेटी को तलाक़ दे दो, जहाँ चाहोगे वहाँ तुम्हारा निकाह कर देंगे लेकिन अबुल आस ने साफ़ इंकार कर दिया और कह दिया कि जैनव जैसी शरीफ़ औरत के मुकाबले में दुनिया की किसी औरत को पसंद नहीं करता।

जब कुरेश जंगे बद्र के लिए रवाना हुए तो अबुल आस भी उनके साथ थे और लोगों के साथ आप भी गिरफ्तार हुए, अहले-मक्का ने जब अपने-अपने कैदियों का क्रिया रवाना किया तो हज़रत नव रज़ियल्लाहु अन्हा ने अपने शौहर अबुल आस के फ़िट्टे में अपना वह हार भेजा जो हज़रत खदीजा रज़ियल्लाहु अन्हा ने शादी के वक्त उन्हें दिया था। आहज़रत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उस हार को देखकर आय-दीदा हो गये और सहावा से फ़रमाया अगर मुनासिब समझो तो इस हार को वापस कर दो और उस कैदी को छोड़ दो, उसी वक्त तसलीम और इन्क्रिआद की गर्दनें झुक गई, कैदी भी आजाद कर दिया गया और हार भी वापस हो गया मगर रसूलुल्लाह सल्ल० ने अबुल आस से यह वादा ले लिया कि मक्का पहुँचकर ज़ैनब को मदीना भेद दें, अबुल आस ने मक्का पहुँचकर ज़ैनब रज़ियल्लाहु अन्हा को मदीना जाने की इजाज़त दे दी और अपने भाई कनाना विन रवीअ के साथ रवाना किया।

कनाना ने ठीक दोपहर के वक्त हज़रत जैनब रज़ियल्लाहु अन्हा को ऊँट पर सवार किया और हाथ में तीर कमान ली और रवाना हुए। आप सल्ल० की साहबज़ादी का सबके सामने मक्का से रवाना होना कुरेश को शाक मालूम हुआ, चुनांचे अबू सुफियान वगैरह ने जी-तुवा में आकर ऊँट को रोक लिया और यह कहा कि हमको मुहम्मद (सल्ल०) की बेटी को रोकने की ज़रूरत नहीं लेकिन इस तरह एलानिया तौर पर ले जाने में हमारी ज़िल्लत है, मुनासिव यह है कि इस वक्त तो मक्का को वापस चलो और रात के वक्त लेकर रवाना हो जाओ, कनाना ने इसको मंजूर नहीं किया, अबू सुफ़ियान से पहले हब्बार बिन अस्वद ने (जो बाद में मुसलमान हुए) जाकर ऊँट रोका और हज़रत ज़ैनब रज़ियल्लाहु अन्हा को डराया। ख़ौफ़ से हमल साक्रित हो गया। उस वक्त कनाना ने तीर कमान संभाली और कहा कि जो शख़्स ऊँट के क़रीब भी आएगा तीरों से उसके जिस्म को छलनी कर दूँगा ।

अल्-गर्ज़ कनाना मक्का वापिस आ गये और दो-तीन रातें गुज़ारने पर शब को रवाना हुए, इधर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जैद बिन हारिसा और एक अंसारी को हुक्म दिया कि तुम जाकर मुक्कामे-वतन या जज में ठहरो, जब जैनब आ जायें तो उनको अपने साथ ले आना, यह लोग बतन या जज पहुँचे और उधर से कनाना बिन रबीअ आते हुए मिले। कनाना वहीं से वापस हो गये और जैद बिन हारिसा अपने साथी के साथ साहबज़ादि-ए-रसूल को लेकर मदीना रवाना हुए। जंगे बद्र के एक माह बाद मदीना पहुंचीं।

साहबज़ादी आप सल्ल० के पास रहने लगीं और अबुल आस मक्का में मुकीम रहे। फ़तहे-मक्का से पहले अबुल आस तिजारत की गर्ज़ से मुल्के-शाम रवाना हुए, चूंकि अहले-मक्का को आपकी अमानत व दियानत पर एतमाद था इसलिए और लोगों का पैसा भी तिजारत में शामिल था, शाम से वापसी पर मुसलमानों का एक दस्ता मिल गया और उसने तमाम माल व मताअ ज़ब्त कर लिया। अबुल – आस छिपकर मदीना हज़रत ज़ैनब रज़ियल्लाहु अन्हा के पास आ पहुंचे।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब सुबह को नमाज़ के लिए तशरीफ़ लाये तो हज़रत ज़ैनब रज़ियल्लाहु अन्हा ने चबूतरे से आवाज़ दी, ऐ लोगो ! मैंने अबुल-आस बिन रबीअ को पनाह दी है, रसूलुल्लाह सल्ल० जब नमाज़ से फ़ारिग हुए तो लोगों की तरफ़ मुतवज्जह हुए और इर्शाद फ़रमाया :

तर्जमाः- ऐ लोगो ! क्या तुम ने भी सुना है जो मैंने सुना । लोगों ने कहा, हाँ। आप सल्ल० ने फ़रमाया क़सम है उस जाते पाक की कि मुहम्मद की जान उसके हाथ में है। मुझको इसका बिल्कुल इल्म नहीं, जो और इस वक्त तुमने सुना वही मैंने सुना । तहक़ीक़ खूब समझ लो कि मुसलमानों में अदना से अदना और कमतर से कमतर भी पनाह दे सकता दे है।

और यह फ़रमाकर साहबज़ादी के पास तशरीफ़ ले गये और यह फ़रमाया कि ऐ बेटी! इसका इक्राम करना मगर खिल्वत न करने पाये क्योंकि तू इसके लिए हलाल नहीं, यानी तू मुसलमान है और वह मुश्कि है और काफ़िर और एहले- सिरिया से यह इर्शाद फ़रमाया कि तुमको इस शख्स (यानी अबुल आस) का तअल्लुक़ हमसे मालूम है, अगर मुनासिब समझो तो इसका माल वापस कर दो वर्ना वह अल्लाह के यहाँ अतिया है जो अल्लाह ने तुमको अता फ़रमाया है और तुम ही इसके मुस्तहिक़ हो यह सुनते ही सहाब-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम ने तमाम माल वापस कर दिया- कोई डोल लाता था और कोई रस्सी, कोई लोटा और कोई चमड़े का टुकड़ा, गर्ज़ यह कि तमाम माल जर्रा जर्रा करके वापस कर दिया।

अबुल आस कुल माल लेकर मक्का रवाना हुए और जिस जिसका हिस्सा था उसका हिस्सा पूरा किया। जब शुरका के हिस्से दे चुके तो यह फ़रमाया :

तर्जमा:- ऐ कुरैश के गिरोह ! क्या किसी का माल मेरे ज़िम्मे बाक़ी रह गया है, जो उसने वसूल न कर लिया हो? कुरैश ने कहा, नहीं पस अल्लाह तुझको जज़ा-ए-ख़ैर दे। तहक़ीक, हमने तुझको वफ़ादार और शरीफ़ पाया, कहा पस मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और बेशक मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं। मैं अब तक सिर्फ इसलिए मुसलमान नहीं हुआ कि लोग यह गुमान न करें कि मैंने माल खाने की ख़ातिर ऐसा किया है, जब अल्लाह ने तुम्हारा माल तुम तक पहुंचा दिया और मैं इस ज़िम्मेदारी से बरी हो गया तब मुसलमान हुआ।

इसके बाद अबुल-आस रज़ियल्लाहु अन्हु मक्का से मदीना चले आये और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फिर हज़रत जैनब रज़ियल्लाहु अन्हा को आपकी ज़ौजियत में दे दिया।

– सीरते मुस्तफा, हिस्सा 2, पेज 124

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