कामयाबी और नाकामी की हक़ीक़ी बुनियाद|Hazratji Molana Yousuf |Dawat-e-Tabligh

Allah अपनी कुदरत से इन्हीं चीज़ों से तुमको नफ़ा पहुंचाएगा और यह नफ़ा आख़िरत तक चलेगा…

कामयाबी और नाकामी की हक़ीक़ी बुनियाद|Hazratji Molana Yousuf |Dawat-e-Tabligh

 कामयाबी और नाकामी की हक़ीक़ी बुनियाद

परिचय

नीचे की तक़रीर हजरत मौलाना मुहम्मद यूसुफ़ रहमतुल्लाह अलैहि ने अपने आख़िरी सफ़र में ख़वास के एक इतिमाअ से फ़रमाई थी, जिसको हज़रत के एक ख़ास रफ़ीने सफ़र ने क़लमबंद किया था। उन्हीं की इनायत से यह हमको हासिल हुई है। हमने पाठकों के समझने की आसानी के लिए कहीं-कहीं लफ़्ज़ी तब्दीलियां की हैं।


सब Allah करते हैं

भाइयों, दोस्तो! कायनात में जो कुछ हो रहा है और होता है, उसके दो रुख हैं-

  • एक रुख जाहिर का है और वह यह है कि चीज़ों में से चीजें निकल रही हैं और चीज़ों में से असरात और ख़वास जाहिर हो रहे हैं, जैसे मिट्टी से ग़ल्ला, ग़ल्ले से ग़िज़ा, ग़िज़ा से पेट का भरना, फिर उसका ख़ून बनना, ख़ून से मनी का यानी नुत्फ़े का बनना, फिर उससे ख़ून का लोथड़ा बनना, फिर उसमें से आज्ञा का और इंसानी शक्ल का बनना और इसी पर क्रियास कर लीजिए, दुनिया की सारी चीज़ों को यह वह रुख़ है जो इंसान पर इंसान की हैसियत से खोला गया है, यानी हर इंसान उसको देख रहा है और उसका मुशाहदा कर रहा है।
  • दूसरा रुख़ यह है कि यह सब कुछ अल्लाह की कुदरत से और उसके हुक्म से हो रहा है और यह सब अल्लाह का नज़र न आने वाला हाथ कर रहा है- यह रुख़ इंसानों पर इंसान की हैसियत से नहीं खोला गया, इसलिए हर इंसान उसको देख नहीं पाता, बल्कि यह रुख़ अंबिया अलैहिमुस्सलाम के ज़रिए इंसानों पर खोला गया है, यानी यह बात अंबिया अलैहिमुस्सलाम ने बताई है कि जो कुछ चीज़ों से बनता हुआ और ज़ाहिर होता हुआ नज़र आता है, वह चीज़ों से नहीं बनता, बल्कि अल्लाह के हुक्म और अम्र से बनता है। अल्लाह तआला क़ादिर हैं कि जिस शक्ल से जो चीज़ चाहें, बना दें या बिना किसी शक्ल के महज़ क़ुदरत और हुक्म से चीज़ बना दें, इसी तरह वह क़ादिर हैं कि जिस चीज़ से जो असर चाहें, ज़ाहिर कर दें। पानी से चाहें तो डुबा दें और चाहें तो तरा दें, आग से चाहें तो जला दें और चाहें तो न जलाएं। गिजा से चाहें तो पेट भरें और चाहें न भरें, मौत की जगह से चाहें तो जिंदगी निकाल दें और जिंदगी की जगह से चाहें, मौत निकाल दें। मोजिज्ञों से यही बात ज़ाहिर की जाती है कि चीज़ों में कुछ नहीं है। अल्लाह जिस चीज़ से जो चाहे निकाल सकता है, वह चाहे तो हुकूमतों की स्कीमों (और मंसूबों) को फेल कर दे और महकूमों की स्कीमें चला दे। उसने नमरूद की स्कीम को फ़ेल कर दिया और इब्राहीम अलैहिस्सलाम की स्कीम चला दी। फ़िरऔन के क़त्ल के इरादे के बावजूद मूसा अलैहिस्सलाम को ख़ुद उसके घर में पलवा दिया और उसके सारे लश्कर समेत समुन्दर में डुबा दिया। इब्राहीम अलैहिस्सलाम बीवी-बच्चे को ऐसे मैदान में डलवा कर जहां कोई आबादी नहीं थी, जिंदगी का कोई सामान नहीं था, पीने के लिए पानी तक भी नहीं था, उनकी यह स्कीम चला दी कि उस बच्चे की औलाद यहाँ वाली हिदायत की दावत लेकर सारी दुनिया में जावे और सारी दुनिया से लोग यहां हज को आवें, ख़ुद स्कीम वाला वहां था भी नहीं, मुल्क शाम में था, लेकिन उसकी स्कीम चल गई और जिस बच्चे के खाने-पीने का और हिफ़ाज़त का कोई बन्दोबस्त नहीं था, उसकी औलाद ‘अक्रीमुस्सलात’ को लेकर दुनिया में जाने लगी और सारी दुनिया से लोग आज तक हज को वहां आ रहे हैं। सारी हुकूमतें हज में कितने रोड़े अटका रही हैं, लेकिन हज की बरकत बराबर बढ़ रही है और इस तरह हज़रत इब्राहीम अलैहि० की चलाई हुई स्कीम अब तक कैसे ज़ोर से चल रही है । 

Allah जिंदगी बनाते हैं

आदमी समझते हैं कि खेती और बाग़ों से जिदंगी बनती है, लेकिन अल्लाह तआला ने सबा की क़ौम को खेती और बाग़ों के बावजूद हलाक कर दिया और इस्माईल अलैहिस्सलाम को ऐसे जंगल में जहां खेती और बाग़ों का निशान भी न था, पाल दिया। आज दुनिया का यक़ीन फ़ौज पर है। अल्लाह ने अबरहा की फ़ौज को हक़ीर परिंदों से हलाक करा के इस यक़ीन को ग़लत साबित कर दिया। ग़रज यह है कि मोजिज़ों से जवाहिर के आम इंसानों वाले यक़ीन की पूरी नफ़ी होती है। मोजिज्ञे ज़ाहिर करते हैं कि अल्लाह में यह कुदरत है कि वह असा अजदहा बना दें, नार को बाग़ बना दें, हाथ में रौशनी और चमक की खूबी की सित पैदा कर दें। दुनिया की सारी चीजें और सारी शक्लें घास के तिनके से लेकर एटम और राकेट तक और इसी तरह सारी ताक़तें और सारी हुकूमतें अल्लाह की कुदरत के तहत हैं- ये चीजें कुदरत नहीं हैं, बल्कि कुदरत इन पर तसरूफ़ करती है। ये सब चीजें फ़ानी हैं और कुदरत मुतबद्दल और गैर-फ़ानी है। अल्लाह चीज़ों से जिंदगी बनाते भी हैं और बिगाड़ते भी हैं, कामयाब भी करते हैं और नाकाम भी करते हैं, ग़रज़ जो कुछ भी होता है, चीज़ों से नहीं होता, अल्लाह के हुक्म और उसकी क़ुदरत से होता है।

कायनात का यह वह रुख है जो नबियों अलैहि० पर खोला जाता है और उन्हीं के ज़रिए से मालूम होता है और वही क़ुदरत के एतबार से इस्तफ़ादे के तरीके लेकर आते हैं।

Allah हमारी जिंदगी कब ठीक करेंगे? 

आलम की चीज़ों पर नज़र रखकर और उनमें नफा नुक्सान समझ कर उनको इस्तेमाल करने या उनमें अपने को लगाने का तरीका हर शख्स खुद तज्वीज़ कर सकता है, क्योंकि चीजें नजर आती हैं और हर आदमी उनको देखता है, लेकिन अल्लाह का हुक्म और उसकी कुदरत, जो चीजों में काम करती है, वह किसी को नज़र नहीं आती, इसलिए उससे फ़ायदा उठाने का तरीका इंसान ख़ुद तज्वीज़ नहीं कर सकता। यह इल्म अल्लाह तआला नबियों अलैहिस्सलाम पर खोलते हैं, इसलिए इससे फ़ायदा उठाने के तरीके उन्हीं से मालूम हो सकते हैं। उन्होंने इंसानों को शक्लों और चीज़ों से हटाया नहीं, बल्कि यह बताया कि अल्लाह की कुदरत और उसके हुक्म को असल समझते हुए इन चीज़ों में लगो और यह यक़ीन बना लो कि जब तुम अल्लाह तआला के तश्रीई अवामिर की ताबेदारी करते हुए इन शोबों में लगोगे और इन चीज़ों को इस्तेमाल करोगे तो अल्लाह तआला अपनी कुदरत से इन्हीं चीज़ों से तुमको नफ़ा पहुंचाएगा और यह नफ़ा आख़िरत तक चलेगा, बल्कि वहीं भरपूर हासिल होगा, यही है ‘ला इला-ह इल्लल्लाहु मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह’ का मंशा कि अल्लाह के सिवा किसी से कुछ नहीं होगा और कुछ नहीं मिलेगा, बस अल्लाह ही के करने से होगा और मिलेगा और उनका फ़ज़्ल व करम जब होगा, जब हमारी जिंदगी और चीज़ों में हमारा लगना मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़े पर होगा।

अब दो काम हैं, एक अपने में ला इला-ह वाले यक़ीन का पैदा करना और दूसरा हर अमल और हर शोबे में हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीके पर चलने का आदी बनना और उसकी मश्क़ करना-ये दोनों बातें पैदा करने के लिए नमाज़ दी गई और एक Deen ki मेहनत(Allah ke raste ma nikalna) दी गई और मस्जिद को इन दोनों का मर्कज़ बना दिया गया।

Azaan का मतलाब 

मस्जिद से दिन-रात में पांच बार एलान कराया जाता है, जिसमें सबसे पहले चार बार कहलवाया जाता है- ‘अल्लाहु अक्बर, अल्लाहु अक्बर, अल्लाहु अक्बर, अल्लाहु अक्बर’। इस कायनात में जो कुछ है, वह चार अनासिर (तत्त्वों) से यानी मिट्टी, पानी, हवा और आग से बना है और उनमें से हर एक का हाल यह कि उनमें से एक-एक सारी दुनिया को ख़त्म करने के लिए काफ़ी है, मिट्टी यानी ज़मीन अगर आधे दिन के लिए जलजला से हिला दी जाए तो सारी दुनिया ख़त्म हो जाए – इसी तरह अगर पानी छोड़ दिया जाए तो नूह अलैहिस्सलाम के ज़माने की तरह सारी दुनिया ग़र्क़ होकर फ़ना हो जाए इसी तरह अगर आद क़ौम की तरह हवा छोड़ दी जाए, तो सारी दुनिया का ख़ात्मा हो जाए इसी तरह अगर आग को जला डालने का हुक्म हो जाए तो सारी दुनिया राख का ढेर बन जाए तो अज्ञान में सबसे पहले चार बार कहा जाता है ‘अल्लाहु अक्बर अल्लाहु अक्बर’ (अल्लाह सबसे बड़ा है) आसमान व ज़मीन अल्लाह के सामने कुछ भी नहीं। चारों अनासिर और इनसे जो कुछ बना है, वह सब अल्लाह की मख़्लूक़ है । अल्लाह सबसे बड़ा है। ख़ुदा की हस्ती के सामने हर चीज़ हक़ीर और बे-हक़ीक़त है। अल्लाह सबसे बड़ा है। रूस और अमरीका • और दुनिया की सारी ताक़तों और हुकूमतों की अल्लाह के सामने कोई हक़ीक़त नहीं। अल्लाह की हस्ती सबसे बड़ी है, ‘अल्लाहु अक्बर, अल्लाहु अक्बर’ । 

इसके बाद दूसरी बात यह कहलवाई जाती है। ‘अश्हदु अल-ला इला-ह इल्लल्लाहु’ बनाव बिगाड़ वाला अल्लाह के सिवा कोई नहीं, शक्लों और चीज़ों से कुछ नहीं होगा, अल्लाह ही के करने से होगा । ” अश्हदु अल-ला-इला-ह इल्लल्लाहु इसके बाद कहलवाया जाता है। ‘अश्हदु अन-न मुहम्मदर्रसूलुल्लाह’ अल्लाह तआला जो सबसे बड़े हैं और जिनके हाथ में बनाव व बिगाड़ और कामयाबी व नाकामयाबी है, उनकी कुदरत से फायदा उठाने का तरीका हम ख़ुद नहीं जानते। हम इस रास्ते में नाबीना हैं, इसके राहनुमा हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं वह अल्लाह के रसूल हैं। उनके तरीके पर चल कर ही अल्लाह का फ़ज़्ल व करम हासिल किया जा सकता है। अश्हदु अन-न मुहम्मदर्रसूलल्लाह •

इसके बाद कहलवाया जाता है ‘हय-य अलस्सलात, हय-य अलल फ़लाह’० ये बातें अपने अन्दर पैदा करने के लिए हैं और अल्लाह का प्रत व करम और कामयाबी हासिल करने के लिए नमाज के लिए यहां आओ, कामयाबी यहां वाले आमाल से मिलेगी।

अल्लाह वाले आमाल में (यानी इवादतों में) कुछ तो वे हैं जिनके साथ चीज़ों में भी लग सकते हैं, चीज़ों से पूरा अलगाव ज़रूरी नहीं। हज, रोज़ा, ज़कात का हाल यही है। रोज़े में तो खाना खा नहीं सकते, मगर खाना पका सकते हैं, दूसरों को खिला सकते हैं, तिजारत और ज़राअत वग़ैरह के काम कर सकते हैं, इसी तरह जकात देते वक़्त खाना-पीना दूसरे कामों में लगना मना नहीं है। हज में भी दूसरे कामों से मना नहीं है, यहां तक कि सिला कपड़ा पहनने से रोका गया है, लेकिन पहनने के लिए कपड़ा सीने को मना नहीं है, लेकिन नमाज वह इबादत है जिसमें आदमी तमाम चीज़ों से कट कर लगता है, न खाना खाएंगे, न खिलाएंगे, न पकाएंगे, न कपड़ा सिएंगे, न किसी से कोई बात करेंगे, ध्यान भी हर चीज से हटा कर अल्लाह पर लगाने की कोशिश करेंगे तो अज्ञान के ज़रिए पहले मस्जिद से तो ‘अल्लाहु अक्बर, अल्लाहु अक्बर’ और ‘अश्हदु अल्ला इला-ह इल्लल्लाहु’ ‘अश्हदु अन-न मुहम्मदर्रसूलुल्लाह’ की आवाज़ लगवा कर यक़ीन दुरुस्त करने की दावत दी जाती है, इसके बाद नमाज़ के अमल के लिए बुलाया जाता है, जिसमें चीज़ों से कट कर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़े पर अल्लाह से वाबस्तगी की मश्क़ की जाती है और उसमें कामयाबी बताई जाती है।

हर चिस को Allah ने बनाया

भाई दोस्तो ! जो कोई मशीन बनाता है, वही उसके चलाने का तरीक़ा और बनाव- बिगाड़ की बात भी जानता है। जो मशीनें बाहर से आती हैं, उनके साथ बनाने वालों की तरफ़ से चलाने के तरीके के बारे में हिदायतें भी आती हैं – इंसान को अल्लाह ने अपनी क़ुदरत से बनाया है, मां के पेट में रखकर बनाया है, जहां किसी दूसरे का हाथ भी नहीं लग सकता, बल्कि नज़र भी नहीं जा सकती। वही अल्लाह जानता है कि इंसान की मशीन किस तरह इस्तेमाल होने में उसका बनाव और तामीर है और किस तरह इस्तेमाल होने में उसका बिगाड़ और तख़रीब है। उसने पैग़म्बरों को यही बताने के लिए भेजा और सबसे आख़िर में हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को भेजा । अब जो कोई मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़े के मुताबिक़ अपने को इस्तेमाल करेगा, वह कामयाब होगा और जो उनके तरीके के ख़िलाफ़ अपने को इस्तेमाल करेगा, वह नाकाम होगा और उसकी यह नाकामी पूरी तरह आख़िरत में ज़ाहिर होगी जो इंसानों के लिए असली और दायमी आलम है। अल्लाह तआला ने इंसानों को अलग-अलग तबक़ों में बांट दिया है हाकिम-महकूम, अमीर-गरीब, काले-गोरे वगैरह-वग़ैरह। अब उनकी तामीर और कामयाबी उन अलग-अलग तबक़ों के जोड़ में है। जोड़ वाले तरीके क़ुरआन मजीद ने और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बनाए हैं और यह भी बताया है कि अगर सारी दुनिया के ख़ज़ाने ख़र्च करके कोई जोड़ पैदा करना चाहे तो पैदा नहीं हो सकता। अल्लाह वाले आमाल में लगने से अल्लाह अपनी क़ुदरत से जोड़ पैदा कर देते हैं-


लोगो की मदद करे

(ऐ मुहम्मद ! आप सारी दुनिया के खजाने खर्च करके उनके दिलों को नहीं जोड़ सकते थे। हमने अपनी क़ुदरत से जोड़ दिया है।)

हो, अपनी ज्ञात इंसान का मिजाज है जो उससे फ़ायदा खींचे, उससे कटता है और जो उसको फ़ायदा पहुंचाए, उससे जुड़ता है, अल्लाह ने और उसकी तरफ़ से हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने वह तरीक़ा बताया जिस पर चलकर हर एक दूसरे को फ़ायदा पहुंचाने वाला बने, कोई किसी से फ़ायदा खींचने वाला न बने, ग़रीबों को बताया कि माल वालों के पास जो कुछ उससे फ़ायदा उठाने का ख्याल वे दिल से निकाल दें और खुद से हर ग़रीब व अमीर को फ़ायदा पहुंचाने वाले बन जाएं, जैसे वे रास्ता न जानते हों, तो ख़ुद चलकर और तकलीफ़ उठाकर उनको रास्ता बता दें, मैयत हो जाए तो उसको उठाने और दफ़न छगैरह में मदद दें, खुद कब्र खोदने में लग जाएं, बीमार पड़ जाएं तो बीमारपुर्सी करें, महज़ अल्लाह के लिए उनका बोझ उठायें और अगर उनके पड़े हुए पैसे नहीं मिल जाएं, तो पता चला कि उन तक पहुंचा दें, कोई ख़तरा हो तो उनकी हिफ़ाज़त करें, पहरा दें, रास्ते में अगर उनकी मोटर कहीं फंस जाए तो निकालने में मदद करें और ज़रूरत हो तो आपने झोंपड़े में उनको ठहराएं और जो मयस्सर हो, खिलाएं और जब वे इन ख़िदमतों के बदले में पैसे देने लगें तो कह दें कि मैंने जो कुछ किया था, ख़ुदा के राजी करने के लिए और उससे सवाब लेने के लिए किया, तुमसे कुछ लेने के लिए नहीं किया। तुम्हारे पैसे तुमको मुबारक – यह ग़रीबों को बताया गया और माल वालों को बताया गया कि अपने माल की हर जिंस और हर क़िस्म ग़रीबों पर लगाएं, पैसे भी खर्च करें, खाने में भी उनको शरीक करें, कपड़े भी उनको लाकर दें, अपनी मोटर और सवारी भी उनके इस्तेमाल के लिए दें और जब इसके बदले में ग़रीब अपनी जानी ख़िदमत के लिए पेश करें तो ये मालदार उनसे कहें कि हम तुमसे कोई जज्ञा नहीं चाहते, ख़ुदा से ले लेंगे। जब यह तरीका चालू होगा तो गरीबों से अमीर और अमीरों से हारीब जुड़ जाएंगे।

लोगो को फ़ायदा पहुंचाना

ऐसे ही हाकिमों और महकूमों को बताया गया कि वे एक दूसरे को फ़ायदा पहुंचाने वाले बनें, फ़ायदा खींचने वाले न बनें। हाकिमों से कहा गया कि हुकूमत के जो अख्तियार और जो वसाइल (साधन) उनके पास हों, ये उनसे महकूमों को फायदा पहुंचाएं और उनको आसानियां पहुंचाने की कोशिश करें, उनकी तिजारतों और छेडियों में उनकी मदद करें, उनके लिए क़ानूनी मुश्किलें पैदा न करें। उनसे लेने और खींचने वाले नहीं, बल्कि उनको देने वाले और नफ़ा पहुंचाने वाले बनें। जब हुकूमत के लोग ऐसा करेंगे, तो पब्लिक के अवाम उनको बदलना ही न चाहेंगे। एलेक्शन के हंगामों की ज़रूरत ही न होगी। इसी तरह महकूम अवाम से कहा गया कि वे हुकूमत वालों से लेने की न सोचें, बल्कि उनको अपनी जान व माल से फ़ायदा पहुंचाने वाले बनें और उनके मसाइल में उनकी मदद करें, उनके लिए मुश्किलें पैदा न करें। उनसे अगर कोताहियां हो तो दगुजर करें और अल्लाह के हवाले करें।

Allah कब नेमतों के दरवाज़े खोल देंगे? 

ग़रज़ यह कि हर तबके को नफ़ा पहुंचाने के तरीक़े पर लगाया गया और बताया गया कि अपने जान व माल और दर्द व फ़िक्र का ज़्यादा हिस्सा दूसरों के बनाने पर लगाओ। यह इस्लाम का बताया हुआ तरीक़ा है। अगर इस पर चला जाए तो हर तबके का दूसरे से पूरा जोड़ होगा और हर काम दयानतदारी से और ठीक-ठीक होगा कोई बेईमानी से रुपया और जायदाद पैदा करने की फ़िक्र नहीं करेगा और अगर इसके खिलाफ जेहन फायदा उठाने का हुआ तो फूट ही फूट होगी और लोगों की नीयत खराब होंगी, फिर यह होगा कि पचास लाख के ठेके वाले पुल पर सिर्फ दस लाख की लागत लगाई जाएगी, जिस वजह से पुल कमजोर बनेगा, कोई सड़क ठीक नहीं बनेगी, कोई काम ठीक नहीं होगा। ख़ूब समझ लो, लेने वाले ज़ेहन से कोई तामीर नहीं हो सकती। तामीर नफा रसानी और दूसरों को देने वाले तरीके से हो सकती है। और नफ़ा रसानी का ज़ेहन जभी बन सकता है और अपनी पास वाली चीज़ दूसरों पर लगाने का तरीक़ा जब ही चालू हो सकता है, जब यह यकीन दिल में उतर जाए कि देने वाले तो बस अल्लाह हैं, चीज़ों से कुछ नहीं होता, अल्लाह के करने से होता है और मैं जब उसकी रिज़ा के मुताबिक़ इस्तेमाल हूंगा तो अल्लाह मेरे सब काम बना देंगे और नेमतों के दरवाज़े खोल देंगे। इसकी मश्क़ नमाज़ में होगी।

क्या मौजूदा जमाने में इस्लाम चलने वाला ha? 

आज कहते हैं कि मौजूदा जमाने में इस्लाम चलने वाला नहीं है, सही है। लेने का ज़ेहन रखने वालों में देने का तरीक़ा कैसे चले, इस्लाम को अपनी ख़्वाहिश और अपनी हालत के मुताबिक़ बना के चलाओगे तो वह इस्लाम रहेगा ही नहीं, वह तो तुम्हारी बनाई एक नई चीज़ हो जाएगी।

किसी ने बदन पर गोदने वाले से शेर की तस्वीर बनवानी चाही। जब वह सूई से गोदने लगा और तक्लीफ़ हुई तो गोदने वाले से कहा कि क्या बना रहे हो? उसने कहा कि पहले शेर की दुम बना रहा हूं। उस आदमी ने कहा कि तुम छोड़ दो, वे दुम के भी शेर की तस्वीर बन सकती है उसने दुम छोड़ दी और दूसरी तरफ़ से बनाना शुरू किया। अब उसने कहा, अब क्या बना रहे हो? उसने कहा कि कान बना रहा हूं। उसने कहा, बे-कान भी शेर बन सकता है, तुम कान न बनाओ, बे-कान का शेर बना दो।

तो भाई दोस्तो! यही इस्लाम के साथ हो रहा है कि अपने मिजाज के बदल जाने की वजह से इस्लाम पर चलना मुश्किल हो रहा है, तो इस्लाम की काट-छांट की जा रही है और उसको अपनी ख्वाहिश के मुताबिक़ बनाया जा रहा है। इसलिए सबसे पहला काम यह है कि अपने मिजाज को इस्लाम के मुताबिक बना लिया जाए और यह जब बनेगा जब इस बात का यकीन पैदा हो जाए कि किसी मलूक से कुछ नहीं होता, सब अल्लाह से होता है और हालात का बनाव-बिगाड़ और तामीर व तख़ीब और कामयाबी नाकामी चीज़ों के होने न होने से नहीं होती, बल्कि अल्लाह के फैसले से होती है और अल्लाह बनाने और चमकाने का फैसला जब करेंगे, जब में मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीके पर आ जाऊंगा तो इस रास्ते पर चलने के लिए खारिजी नहीं, बल्कि दाखिली दौलतें चाहिएं, ख़ुदा का ध्यान हो, ख़ुदा का ख़ौफ़ हो – मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीके पर ख़ुदा के खजानों से मिलने का और नेमतों के दरवाजे खुलने का यकीन हो इन अन्दरूनी तब्दीलियों के लिए कुछ करना पड़ेगा चीजों से कामयाबी का यक़ीन हटाने के लिए और अल्लाह से कामयाबी का यकीन जमाने के लिए कुछ मुद्दत के लिए चीजों में से निकालना होगा। ईमान की मज्लिसों में बैठकर ईमान की बातें सुनना-सुनाना होगा। नमाज के फ़ज़ाइल और उसकी बरकतें मालूम करके इस यक़ीन के साथ नमाज में लगना होगा कि हम ख़ुदा में लगेंगे, तो ख़ुदा हमको नवाजेंगे, इसी तरह अज्ञकार व तस्वीहात के फ़ज़ाइल मालूम करके उनके यकीन के साथ उनमें लगना होगा। दूसरों के साथ अच्छे सुलूक और खिदमत की मश्क इस यक़ीन के साथ करनी होगी कि हम जितना अच्छा सुलूक अल्लाह के बन्दों के साथ करेंगे, ऐसा ही अच्छा सुलूक अल्लाह तआला अपनी शाने आली के मुताविक हमारे साथ करेंगे, ख़ास कर ईमान की निस्वत से हर मुस्लिम के इक्राम की और अपने को हक़ीर व कमतर समझने की मश्क़ करनी होगी। इन बातों को दूसरों को भी दावत अपनी हाजत समझ कर इस यक़ीन के साथ देनी होगी कि जब मैं अल्लाह के दूसरे बन्दों में इसके लिए कोशिश और मेहनत करूंगा और Allah ke रास्ते में तक्लीफ़ें और जिल्लतें उठाऊंगा तो अल्लाह मुझे इन चीज़ों से महरूम न रखेंगे, इसकी भी मश्क करनी होगी कि सारे काम सिर्फ अल्लाह की रिजा के लिए हों। इस तरह कुछ मश्क़ कर लेने से इनशाअल्लाह सब तबक़ों में जोड़ की शक्ल पैदा हो जाएगी।

Tabligh(Allah के रास्ते) के फ़ायदे

अमरीका वालों ने सब कुछ बना लिया, लेकिन कालों और गोरों को जोड़ने में वे बिल्कुल नाकाम रहे। इस तरह उन्होंने शराब बन्द करने के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर डाले और सारी कोशिशें कर लीं, लेकिन बजाए कमी के उसमें और ज़्यादती हुई अल-हम्दु लिल्लाह इस तब्लीग़ के अमल से लाखों ऐसे आदमियों के जराइम छूट गए जिनका जराइम छोड़ना नामुम्किन मालूम होता था।

अलहम्दु लिल्लाह इस काम में सारे ही तबके लग रहे हैं जो तबका इस पर मेहनत करेगा और ये बातें अपने भीतर पैदा करेगा, उससे सब लोग जुड़ जाएंगे। हम अगर अपने ही साथ जोड़ना चाहते तो जोड़ने की यह तर्कीब आपको न बताते। हम चाहते हैं कि आप सब इस तरीक़े पर कुछ मेहनत कर लें, फिर देखें कि अल्लाह तआला आप ही के ज़रिए कितनी आसानी से सब तबक़ों को जोड़ता है। 

आज हर तबके में हर जगह जूता चल रहा है और मसाइल बिगड़ते चले जा रहे हैं। इसका इलाज सिर्फ़ हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़े में है। जो जितना करेगा, अल्लाह की तरफ़ से वह उतना पा लेगा हमने इस काम के लिए कोई अंजुमन नहीं बनाई, न उसका कोई दफ़्तर है, न रजिस्टर है, न फंड है यह तारा ही मुसलमानों का काम है। हमने जारी तरीक़ों पर कोई अलग जमाअत भी नहीं बनाई है। जिस तरह मस्जिद में नमाज़ के अमल के अलग-अलग तबक़ों और मसालों वाले मुसलमान आकर जुड़ जाते हैं और नमाज से फारिग होकर अपने-अपने घरों और मशालों में चले जाते हैं। इस तरह हम सबसे कहते हैं कि कुछ बात के लिए अपने घरों और मश्ग़लों से निकल कर यह मेहनत और मश्क़ कर लीजिए और फिर अपने घरों और मशालों में आकर इन उसूलों के मुताबिक लग जाइए। आपने अगरचे यह चीज हासिल कर ली तो दुनिया भर के साइंस वाले आपते यह तरीका सीखने आएंगे और ख़ुदा ने चाहा तो आप दुनिया के इमाम होंगे।

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