कुंवारी बेतिया | एक औरत का Dil टूटा – Dawat~e~Tabligh

Islam आने से पहले aurat ka हाल। Beti ka घर से जाना। कुंवारी बेतिया | एक औरत का Dil टूटा – Dawat~e~Tabligh in Hindi Web Stories… ज़मान-ए-जाहिलियत में औरत का क्या मक़ाम था

कुंवारी बेतिया | एक औरत का Dil टूटा - Dawat~e~Tabligh
कुंवारी बेतिया | एक औरत का Dil टूटा – Dawat~e~Tabligh

एक औरत का दिल टूटा

  • एक औरत का दिल टूटा रोई, सोई आप सल्ल० की ज़ियारत हो गई

किताबों में एक अजीब वाक्रिया लिखा है कि एक ख़ातून निहायत ही पाक दामन और नेक थी। वह चाहती थी कि मुझे नबी करीम सल्ल० की ज़ियारत नसीब हो। वह दुरूद शरीफ़ भी बहुत पढ़ती थी, लेकिन ज़ियारत नहीं होती थी। उनके ख़ाविन्द बड़े अल्लाह वाले थे। एक दिन उन्होंने अपने ख़ाविन्द से अपनी यही तमन्ना ज़ाहिर की कि मेरा दिल तो चाहता है कि मुझे नबी करीम सल्ल० की ज़ियारत नसीब हो, लेकिन कभी यह शर्फ़ नसीब नहीं हुआ, इसलिए आप मुझे कोई अमल ही बता दें जिसके करने से मैं ख़्वाब में नबी करीम सल्ल० की ज़ियारत की सआदत हासिल कर लूँ। उन्होंने कहा कि मैं आपको अमल तो बताऊंगा लेकिन आपको मेरी बात माननी पड़ेगी। वह कहने लगी कि आप मुझे जो बात कहेंगे वह मैं मानूंगी। वह कहने लगे कि अच्छा तुम बन-संवर कर दुल्हन की तरह तैयार हो जाओ। उसने कहा, बहुत अच्छा।

चुनांचे उसने गुस्ल किया, दुल्हन वाले कपड़े पहने, ज़ेवर पहने और दुल्हन की तरह बन-संवर कर बैठ गई। जब वह दुल्हन की तरह बन-संवर कर बैठ गई तो वह साहब उनके भाई के घर चले गए और जाकर उससे कहा कि देखो, मेरी कितनी उम्र हो चुकी है और अपने बहन को देखो कि वह क्या बनकर बैठी हुई है। जब भाई घर आया, और उसने अपनी बहन को दुल्हन के कपड़ों में देखा तो उसने उसे डांटना शुरू किया कि तुमको शर्म नहीं आती, क्या यह उम्र दुल्हन बनने की है, तुम्हारे बाल सफ़ेद हो चुके हैं, तुम्हारी कमर सीधी नहीं होती, और बीस साल की लड़की बनकर बैठी हुई हो। अब जब भाई ने डांट पिलाई तो उसका दिल टूटा और उसने रोना शुरू कर दिया।

यहां तक कि वह रोते-रोते सो गई, अल्लाह की शान देखिए कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने उसे इसी नींद में अपने महबूब सल्ल० की ज़ियारत करवा दी। वह ज़ियारत करने के बाद बड़ी ख़ुश हुई, लेकिन ख़ाविन्द से पूछने लगी कि आपने वह अमल बताया ही नहीं जो आपने कहा था और मुझे ज़ियारत तो वैसे ही हो गई है। वे कहने लगे, अल्लाह की बन्दी ! यही अमल था। क्योंकि मैंने तेरी ज़िंदगी पर गौर किया, मुझे तेरे अंदर हर नेकी नज़र आई। तेरी ज़िंदगी शरीअत व सुन्नत के मुताबिक़ नज़र आई, अलबत्ता मैंने यह महसूस किया है कि मैं चूंकि आपसे प्यार मुहब्बत की ज़िंदगी गुज़ारता हूं इसलिए आपका दिल कभी नहीं टूटा, इस वजह से मैंने सोचा कि जब आपका दिल टूटेगा तो अल्लाह तआला की रहमत उतरेगी और आपकी तमन्ना को पूरा कर दिया जाएगा।

इसी लिए तो मैंने एक तरफ़ आपको दुल्हन की तरह बन-संवर कर बैठने को कहा और दूसरी तरफ़ आपके भाई को बुलाकर ले आया। उसने आकर आपको डांट पिलाई जिसकी वजह से आपका दिल टूटा और अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की ऐसी रहमत उतरी कि उसने आपको अपने महबूब सल्ल० की ज़ियारत करवा दी। अल्लाहु अकबर !

Islam आने से पहले aurato ka हाल

  • ज़मान-ए-जाहिलियत में औरत का क्या मक़ाम था

इन्दवाजी जिन्दगी के उनवान पर बात करते हुए इस पसमंजर को न में रखना जरूरी होगा कि इस्लाम से पहले दुनिया की मुख्तलिफ तहजीबों और मुख्तलिफ़ मुआशिरों में औरत को क्या मक़ाम हासिल था? तारीखे आलम का मुताला किया जाए तो यह बात रोज़े रौशन की तरह अयां होती है कि इस्लाम से पहले दुनिया के मुख्तलिफ़ मुमालिक में औरत अपने बुनियादी हुक्क्रूक़ से बिल्कुल महरूम थी।

1. France में औरत के बारे में यह तसव्वुर था कि यह आधा इंसान है इसलिए मुआशिरे की तमाम ख़राबियों का ज़रिया बनती है।

2. चीन में औरत के बारे में यह तसव्वुर था कि इसमें शैतानी रूह होती है लिहाजा यह बुराइयों की तरफ इंसान को दावत देती है। 

3. Japan में औरत के बारे में य तसव्वुर था कि यह नापाक पैदा की गई है, इसलिए इबादतगाहों से इसको दूर रखा जाता था। 

4. हिन्दुइज्म में जिस औरत का ख़ाविन्द मर जाता तो उसको मुआशिरे में ज़िन्दा रहने के क़ाबिल नहीं समझा जाता था। इसलिए ज़रूरी था कि वह अपने खाविन्द की नाश के साथ जिन्दा जलकर अपने आपको ख़त्म कर ले, अगर वह इस तह न करती तो उसको मुआशिर में इज्जत की निगाह से नहीं देखा जाता था।

5. ईसाई दुनिया में औरत को मारिफ़ते इलाही के रास्ते में रुकावट समझा जाता था । औरतों को तालीम दी जाती थी कि कुंवारी रहकर ज़िन्दगी गुजारें जबकि मर्द राहिब बनकर रहना एजाज समझते थे।

6. जज़ीर-ए-अरब में बेटी का पैदा होना बेइज्जती समझा जाता था। लिहाजा। मां-बाप खुद अपने हाथों से बेटी को ज़िंदा दरगोर कर दिया करते थे। औरत के हुकूक़ इस क़द्र पामाल किए जा चुके थे कि अगर कोई आदमी मर जाता तो जिस तरह विरासत की चीजें उसकी औलाद में तक्सीम होती थीं उसी तरह बीवी भी उसकी औलाद के निकाह में आ जाती थी।

7. अगर किसी औरत का ख़ाविन्द फ़ौत हो जाता तो मक्का मुकर्रमा से बाहर एक काली कोठरी में उस औरत को दो साल के लिए रखा जाता था। तहारत के लिए पानी और दूसरी ज़रूरियाते ज़िंदगी भी पूरी न दी जाती थीं। अगर दो साल यह जतन काटकर भी औरत ज़िंदा रहती तो उसका मुंह काला करके मक्का मुकर्रमा में फिराया जाता। उसके बाद उसे घर में रहने की इजाजत दी जाती थी।

अब सोचिए तो सही कि ख़ाविन्द तो मरा अपनी क़ज़ा से, भला इसमें बीवी का क्या कुसूर? मगर यह मज़्लूमा इतनी बेबस थी कि अपने हक़ में कोई आवाज़ नहीं उठा सकती थी। ऐसे माहौल में जबकि चारों तरफ़ औरत के हुकूक़ को पामाल किया जा रहा था तो अल्लाह तआला ने अपने प्यारे नबी सल्ल० को इस्लाम की नेमत देकर भेजा। आप सल्ल० दुनिया में तशरीफ़ लाए और आप सल्ल० ने आकर औरत के मक़ाम को निखारा। बताया कि ऐ लोगो ! अगर यह बेटी है तो तुम्हारी इज्जत है, अगर बहन है तो तुम्हारा नामूस है, अगर बीवी है तो ज़िंदगी की साथी हैं, अगर मां है तो उसके क़दमों में तुम्हारी जन्नत है।

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कुंवारी बेतिया 

  • सल्फ़-सालिहीन का मामूल अपनी कुंवारी बेटियों के बारे में

अल्लाह तआला ने कुरआन पाक की एक पूरी सूरत जिसे ‘सूरह निसा’ कहते हैं, उसमें मर्द और औरत की इज़दिवाजी ज़िंदगी के अहकाम बतलाए हैं सल्फ़-सालिहीन का यह मामूल था कि वह अपनी बेटियों को निकाह से पहले सूरह निसा और सूरह नूर तर्जुमा के साथ पढ़ा दिया करते थे। हमें भी चाहिए कि जिनके यहां बेटी हो वह उसको अगर पूरा कुरआन पाक तर्जुमे के साथ नहीं पढ़ा सकते तो कम-से-कम सूरह निसा और सूरह नूर को तर्जुमे के साथ पढ़ा दिया करें, ताकि लड़की अच्छी इज़दिवाजी ज़िंदगी गुज़ार सके। बाज़ सल्फ़-सालिहीन का तो अजीब मामूल था कि जब बच्ची पढ़-लिख जाती और अभी शादी का कोई इंतिज़ाम नहीं होता था (उस वक्त प्रिंटिंग प्रेस नहीं होते थे) तो यह बेटी के जिम्मे लगा देते कि बेटी अपने लिए एक कुरआन पाक लिख लो, तो यह बच्ची रोजाना बावुजू होकर ख़ुश-नवेसी से कुरआन पाक लिखती थी और जब कुरआन पाक मुकम्मल हो जाता तो सुनहरी जिल्द बांधकर बाप अपनी बेटी को जहेज़ में दिया करता था। यह पहले वक़्तों का जहेज़ हुआ करता था। गोया उसके ख़ाविन्द को पैग़ाम मिल रहा होता था कि मेरी बीवी ने अपने बाप के घर में जो ज़िंदगी गुज़ारी है उसका फ़ारिग वक़्त इस कुरआन पाक को लिखने में गुजरा है।

Beti ka घर से जाना

ख़ाविन्द के घर में अगर आप फ़ाक़ा से भी वक्त गुज़ारेंगी तो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त के यहाँ दर्जे और रुवते पाएंगी। अपने वालिद के घर की आसानियों और नाज़ व नेमत को याद न करना। हमेशा ऐसा नहीं होता कि बेटियां मां-बाप ही के घर में रहती रहें, बिलआखिरी उनको अपना घर बसाना होता ही है। अल्लाह की तरफ से जो जिंदगी की ततींव है उसी को अपनाना होता है। इसलिए अगर ख़ाविन्द के घर में रिज़्क की तंगी है या ख़ाविन्द की आदतों में से कोई आदत ख़राब है तो सब्र व तहम्मुल के साथ उसकी इस्लाह के बारे में फिक्रमंद रहें, सोच-समझ कर बातें करें, ख़िदमत के ज़रिए ख़ाविन्द का दिल जीत लें, तब आप जो भी कहेंगी खाविन्द मान लेगा।

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