क्या मरने के बाद Allah के पास जना हैं?|हमारा कर्तव्य क्या हैं?| Dawat-e-Tabligh

कल सबको अपने स्वामी के पास जाना है। जीवन भर परीक्षा से जूझना पड़े तो यह सोचकर सहन कर लेना कि इस संसार का जीवन तो कुछ दिनों तक सीमित है, मरने के बाद का जीवन वहां ही जन्नत और उसके सुख प्राप्त करने के लिए और अपने मालिक को प्रसन्न करने के लिए और उसको आंखों से देखने के लिए ये परीक्षाएं कुछ भी नहीं हैं।

क्या मरने के बाद Allah के पास जना हैं?|हमारा कर्तव्य क्या हैं?| Dawat-e-Tabligh

 ईमान की ज़रूरत

मरने के बाद के जीवन के अलावा इस संसार में भी ईमान और इस्लाम हमारी ज़रूरत है और मनुष्य का कर्तव्य है कि एक स्वामी की उपासना और आज्ञापालन करे। जो अपने स्वामी और पालनहार का दर छोड़ कर दूसरों के सामने झुकता फिरे, वह जानवरों से भी गया गुज़रा है। कुत्ता भी अपने मालिक के दर पर पड़ा रहता है और उसी से आशा रखता है। वह कैसा मनुष्य है, जो अपने सच्चे मालिक को भूल कर दर दर झुकता फिरे।

लेकिन इस ईमान की अधिक ज़रूरत मरने के बाद के लिए है जहां से मनुष्य वापस न लौटेगा और मौत पुकारने पर भी उसे मौत न मिलेगी। उस समय पछतावा भी कुछ काम न आएगा। यदि मनुष्य यहां से ईमान के बिना चला गया तो सदैव के लिए नरक की आग में जलना पड़ेगा। यदि इस दुनिया की आग की एक चिंगारी भी हमारे शरीर को छू जाए तो हम तड़प जाते हैं तो नरक की आग इस संसार की आग से सत्तर गुना अधिक तीव्र है और बेईमान वालों को उसमें सदैव के लिए जलना होगा। जब उनके बदन की खाल जल जाएगी, तो दूसरी खाल बदल दी जाएगी इस तरह निरंतर यह दंड भुगतना होगा ।

अत्यन्त महत्वपूर्ण बात

मेरे प्रिय पाठको मौत का समय न जाने कब आ जाए। जो सांस अन्दर है, उसके बाहर आने का भरोसा नहीं और जो सांस बाहर है उसके अन्दर आने का भरोसा नहीं। मौत से पहले समय है। इस कर्म के समय में अपनी सब से पहली और सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी का आभास कर लें। ईमान के बिना न यह जीवन सफल है और न मरने के बाद आने वाला जीवन ।

क्या मरने के बाद Allah के पास जना हैं? 

कल सबको अपने स्वामी के पास जाना है। वहां सबसे पहले ईमान की पूछताछ होगी। हां, इसमें मेरा व्यक्तिगत स्वार्थ भी हैं कि कल हिसाब के दिन आप यह न कह दें कि हम तक Allah (पालनहार) की बात पहुंचाई ही नहीं गयी थी।

मुझे आशा है कि ये सच्ची बातें आपके दिल में घर कर गयी होंगी। तो आइए श्रीमान ! सच्चे दिल और सच्ची आत्मा वाले मेरे प्रिय मित्र ! उस मालिक को गवाह बनाकर और ऐसे सच्चे दिल से जिसे दिलों का हाल जानने वाला मान ले, इक़रार करें और प्रण करें:

“मैं गवाही देता हूं इस बात की कि अल्लाह के सिवा कोई उपासना योग्य नहीं (वह अकेला है उसका कोई साझी नहीं) और मैं गवाही देता हूं कि मुहम्मद अल्लाह के वन्दे और उसके रसूल (दूत) हैं।”

“मैं तौबा करता हूं कुपर से, शिर्क (किसी भी तरह अल्लाह का साझी बनाने) से और हर प्रकार के गुनाहों से, और इस बात का प्रण करता हूं कि अपने पैदा करने वाले सच्चे मालिक के सब आदेशों को मानूंगा और उसके सच्चे नबी मुहम्मद (सल्ल.) का सच्चा आशा पालन करूंगा।” 

दयावान और करीम मालिक मुझे और आपको इस रास्ते पर मरते दम तक जमाए रखे। आमीन!

मेरे प्रिय मित्र ! यदि आप अपनी मौत तक इस विश्वास और ईमान के अनुसार अपना जीवन गुज़ारते रहे तो फिर मालूम होगा कि आपके इस भाई ने कैसा मुहब्बत का हक अदा किया।

क्या ईमान की परीक्षा होगी ? 

इस इस्लाम और ईमान के कारण आपकी आजमाइश भी हो सकती है मगर जीत सदैव सच की होती है। यहां भी सत्य की जीत होगी और यदि जीवन भर परीक्षा से जूझना पड़े तो यह सोचकर सहन कर लेना कि इस संसार का जीवन तो कुछ दिनों तक सीमित है, मरने के बाद का जीवन वहां ही जन्नत और उसके सुख प्राप्त करने के लिए और अपने मालिक को प्रसन्न करने के लिए और उसको आंखों से देखने के लिए ये परीक्षाएं कुछ भी नहीं हैं।

हमारा कर्तव्य क्या हैं? 

एक बात और ईमान और इस्लाम की यह सच्चाई हर उस भाई का हक और अमानत है, जिस तक यह हक नहीं पहुंचा है, इसलिए आपका भी कर्तव्य है कि निःस्वार्थ होकर अल्लाह के लिए केवल अपने भाई की हमदर्दी में उसे मालिक के प्रकोप, नरक की आग और दंड से बचाने के लिए दुख दर्द के पूरे अहसास के साथ जिस तरह अल्लाह के रसूल मुहम्मद (सल्ल.) ने उम्र भर यह सच्चाई पहुंचाई थी, आप भी पहुंचाएं। उसको सही सच्चा रास्ता समझ में आ जाए। उसके लिए अपने मालिक से दुआ करें। क्या ऐसा व्यक्ति मनुष्य कहलाने का हक़दार है, जिसके सामने एक अंध आंखों की रोशनी से महरूम होने के कारण आग के अलाव में गिरने वाला हो और वह एक बार भी फूटे मुंह से यह न कहे कि तुम्हारा यह रास्ता आग के अलाव की ओर जाता है। सच्ची मानवता की बात तो यही है कि वह उसे रोके, उसको पकड़े, बचाए और संकल्प करे कि जब तक अपना बस है, मैं कदापि उसे आग में गिरने नहीं दूंगा।

Allah के Deen कि मेहनत

ईमान लाने के बाद हर मुसलमान पर हक है कि जिसको दीन की, नबी की, कुरआन की रोशनी मिल चुकी है वह शिर्क और कुफ़ की शैतानी आग में फंसे लोगों को बचाने की धुन में लग जाए। उनकी ठोड़ी में हाथ दे, उनके पांव पकड़े कि लोग ईमान से हट कर गलत रास्ते पर न जाएं। निःस्वार्थ और सच्ची हमदर्दी में कही बात दिल पर प्रभाव डालती है। यदि आपके द्वारा एक आदमी को भी ईमान मिल गया और एक आदमी भी मालिक के सच्चे दर पर लग गया तो हमारा बेड़ा पार हो जाएगा, इसलिए कि अल्लाह उस व्यक्ति से बहुत अधिक प्रसन्न होता है, जो किसी को कुफ़ और शिर्क से निकाल कर सच्चाई के मार्ग पर लगा दे। 

आपका बेटा यदि आपसे बागी होकर दुश्मन से जा मिले और आपके बदले वह उसी के कहने पर चले फिर कोई भला आदमी उसे समझा बुझा कर आपका आज्ञा पालक बना दे तो आप उस भले आदमी से कितने प्रसन्न होंगे। मालिक उस बन्दे से इससे कहीं अधिक प्रसन्न होता है, जो दूसरे तक ईमान पहुंचाने और बांटने का साधन बन जाए। 

ईमान लाने के बाद

इस्लाम स्वीकारने के बाद जब आप मालिक के सच्चे बन्दे बन गए तो अब आप पर रोजाना पांच बार नमाज़ फ़र्ज़ हो गयी। आप इसे सीखें और पढ़ें, इससे आत्मा को सन्तुष्टि मिलेगी और अल्लाह की मुहब्बत बढ़ेगी। मालदार हैं तो दीन को निर्धारित की हुई दर से हर साल अपनी आय से हकदारों का हिस्सा जकात के रूप में निकालना होगा। रमज़ान के पूरे महीने रोजे रखने होंगे और यदि बस में हो तो उम्र में एक बार हज के लिए मक्का जाना होगा।

ख़बरदार ! अब आपका सिर अल्लाह के अलावा किसी के आगे न झुके। आपके लिए कुफ़ व शिर्क, झूठ, धोखाधड़ी, मामलों का बिगाड़, रिश्वत, अकारण हत्या कर देना, पैदा होने से पहले या पैदा होने के बाद सन्तान की हत्या, आरोप प्रत्यारोप, शराब, जुआ, सूद, सुअर का मांस ही नहीं, हलाल मांस के अलावा सारे हराम मांस और अल्लाह और उसके रसूल मुहम्मद (सल्ल.) के ज़रिए हराम ठहराई गई हर वस्तु मना है। उससे बचना चाहिए और अल्लाह की पाक और हलाल बताई हुई वस्तुओं पर अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए पूरे शौक के साथ खाना चाहिए।

अपने मालिक द्वारा दिया गया कुरआन पाक सोच समझ कर पढ़ना चाहिए और पाकी और सफ़ाई के तरीकों और दीनी मामलों को सीखना चाहिए। सच्चे दिल से यह दुआ करनी है कि ऐ हमारे मालिक! हमको, परिवार के लोगों और रिश्तेदारों को हमारे दोस्तों को और इस धरती पर बसने वाली तमाम मानवता को ईमान के साथ जिन्दा रख और ईमान के साथ इन्हें मौत दे। इसलिए कि ईमान ही मानव समाज का पहला और आख़िरी सहारा है, जिस तरह अल्लाह के एक पैग़म्बर इब्राहीम (अलैहि.) जलती हुई आग में अपने ईमान की वजह से कूद गए थे और उनका एक बाल तक न जल सका था, आज भी उस ईमान की ताकत आग को गुल व गुलज़ार बना सकती है और सच्चे रास्ते की हर रुकावट को ख़त्म कर सकती है।

आज भी हो जो इब्राहीम का ईमा पैदा

  आग कर सकती है अन्दाज़े गुलिस्तां पैदा

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