क्या मुर्दा जिंदा हो सकता है ?| KY कियामत hogi? | Dawat-e-Tabligh

कहता है कि मियां ! गली सड़ी हड्डियों को कौन जिंदा करेगा ? “क्या जब हम मर गये और मिट्टी और हड्डियां ही हड्डियां हो गये तो क्या हम उठाये जाएंगे? क्या हमारे अगले बाप-दादे भी उठाये जाएंगे?…..

क्या मुर्दा जिंदा हो सकता है?| KY कियामत hogi?| Dawat-e-Tabligh
क्या मुर्दा जिंदा हो सकता है?| KY कियामत hogi?| Dawat-e-Tabligh

क्या मुर्दा जिंदा हो सकता है?

क़ियामत का आना ज़रूरी है। कोई माने या न माने। वादा सच्चा है। जो होकर रहेगा। जिस वक़्त कुरआन करीम नाज़िल होता था उस वक्त भी क़ियामत के इंकारी थे और आज भी इस साबित सच्चाई से इंकार करने वाले मौजूद हैं। वह्य नाज़िल होते वक्त जो लोगों को इस बारे में शक व शुब्हे थे; बहुत-से मौकों पर क़ुरआन शरीफ़ में उनके जवाब दिए गये हैं। नीचे कुछ आयतें इसी से मुतआल्लिक़ लिखी जाती हैं। सूरः यासीन में फ़रमा याः 

वज़र बलना म स लौं व नसि य ख़ल्कुह । काल मैंय युयिल इज़ा म व हि य रमीम०

‘और ब्यान की (इंसान ने हमारे लिए मिसाल और भूल गया अपनी . पैदाइश को कहने लगा कौन हड्डियों को जिंदा करेगा। जबकि वह खोखली हो गयी होंगी।’

इस आयत में इंसान की नामुनासिब बात की शिकायत की गयी है कि देखो वह ख़ुदा पर भी जुम्ले चस्पां करता है और कहता है कि मियां ! गली सड़ी हड्डियों को कौन जिंदा करेगा? बस ये सब कहने की बातें हैं। ऐसा सवाल करते वक्त इंसान पैदाइश को भूल जाता है। अगर उसे अपनी पैदाइश एक ज़लील कुतरे (बूंद) से है तो अल्लाह जल्ल ल शानुहू के बारे में ऐसे लफ्ज़ कहने में कुछ तो शर्म खाता और अक्ल से काम लेता तो इस सवाल का जवाब भी अपनी पैदाइश में गौर करने से पा लेता। आगे इस सवाल का तफ़सीली जवाब देते हुए फरमायाः

मुर्दे दुबारा ज़िदा कैसे होंगे ? 

कुल युयीहल्लज़ी अन्शञू हा अव्वल मर्रतिउं वहुव बिकुल्लि ख़ल्किन अलीम ०

‘आप फ़रमा दीजिए कि इन हड्डियों को वही ज़िंदा करेगा जिसने इनको पहली बार पैदा फ़रमाया था और वह सब बनाना जानता है’।

यानी जिसने पहली बार हड्डियों को वुजूद बख़्शा और उनमें जान डाली; वही दोबारा उनको जिंदगी बख़्शेगा। वह पूरी क़ुदरत रखता है । उसके लिए सब कुछ आसान है। बदन के अंश और हड्डियों के कण जहां कहीं भी बिखरे हों उनका एक-एक कण उसके इल्म में है। वह हर तरह बनाने पर कुदरत रखता है। सोचना चाहिए कि जिसने नुत्फ़े (वीर्य) को बहुत-से हालात से गुज़ार कर जीती-जागती तस्वीर देकर रूह डाल दी भला उसके लिए यह कैसे मुम्किन है कि वह मुर्दों को जिंदा न कर सके ।

अ लै स जालि क बिकादिरिन अला ऐंयुहियल मौता०

इंसानी समझ का तकाज़ा तो यह है कि पहली बार अदम (न होना) ते वुजूद बख़्शने के बाद दोबारा जिंदगी देना आसान है। सूरः रूम में फ़रमाया  :

व हुवल्लज़ी यब्दउल ख़ल के सुम्म म युईदुहू वहुव अवनु अलैह०

‘और वही है जो पहली बार पैदा करता है, फिर उसको दोबारा पैदा कर देगा और यह (दोहराना) इसके लिए (पहली बार पैदा करने से ज़्यादा आसान है।

यानी तुम खुद ही समझ लो कि जिसने पहली बार बिना मिसाल, नक्शे और ख़ाके के वुजूद बख़्श दिया; वह दोबारा पैदा करने पर क्योंकर क़ुदरत न रखेगा। गो उसके लिए पहली पैदाइश और दूसरी पैदाइश सब बराबर है।’ लेकिन तुम्हारी समझ के एतबार से पहली बार पैदा करने से दूसरी बार दोहरा देना आसान होना चाहिए। यह अजीब बात है कि जिसने पहली बार वुजूद बख़्शा वह मौत देकर दोबारा जिंदा न कर सके, कुछ तो समझो। सूरः अह्क़ाफ़ में फ़रमायाः

अ व लम यरौ अन्नल्ला हल्लज़ी ख़ ल कस्समावाति वल् अर्जी व ल य य बिखल्किहिन्न न बिकादिरिन अला अय्युहियल मौता बला-इन्नहु अला कुल्लि शैइन क़दीर०

‘क्या नहीं देखते कि वह अल्लाह जिसने बनाये आसमान व ज़मीन और उनके बनाने से वह थका नहीं, वह कुदरत रखता है कि मुर्दों को ज़िंदा कर दे। ज़रूर ! वह हर चीज़ पर कुदरत रखता है।’

यानी जिसने आसमानों और ज़मीन जैसी बड़ी-बड़ी चीजें सिर्फ अपनी क़ुदरत से फ़रमा दीं, क्या इसपर कुदरत नहीं रखता कि मुर्दों को ज़िंदा करे। बिला शुबहा इसपर वह ज़रूर कादिर (क़ुदरत रखने वाला) है। सूरः हाम-मीम सज्दा में फ़रमायाः

व मिन आयातिही इन क तरल अर ज़ ख़ाशिअतन फ़इज़ा अन्जल्ला अलैहल माअह तज्ज़त व रबत अयाहा ल मुहिइल मौता। इन्नहू अला कुल्लि शैइन कदीर०

‘और बहुत-सी इसकी निशानियों में से एक यह है कि तू ज़मीन को देखता है; दबी पड़ती है। फिर जब हम इस पर पानी बरसाते हैं वह उभरती है। बेशक जिसने इस ज़मीन को जिंदा कर दिया है, वही मुर्दों को जिंदा करने

वाला है। बेशक वह हर चीज़ पर कादिर है।’

यानी जिस खुदावन्द करीम ने इस ज़मीन को जिंदा कर दिया वही मुर्दों के जिस्मों में दोबारा जान डाल देगा।

एक बार एक सहाबी 4 ने हज़रत रसूल करीम से सवाल किया

कि या रसूलल्लाह ! अल्लाह तआला मख़्लूक को कैसे दोबारा जिंदा फरमायेगा और (मौजूदा मख़्लूक में इसकी क्या नज़ीर (मिसाल) है? इस पर आंहज़रत सैयदे आलम ने फ़रमाया कि क्या ऐसा नहीं हुआ कि तुम अपनी कौम के जंगल पर उस वक़्त नहीं गुज़रे जबकि ज़मीन सूखी हुई थी, फिर दोबारा उस वक्त गुज़रे जबकि वह हरी-भरी होकर लहलहाती हुई थी? उन्होंने अर्ज़ किया कि जी हां, ऐसा तो हुआ है। प्यारे नबी ने फरमाया कि यही अल्लाह की निशानी है उसकी मख़्लूक में, (यानी मौत के बाद जिंदा करने की एक नज़ीर है) इसी तरह अल्लाह मुर्दों को जिंदा फरमाएगा।

KY कियामत hogi? 

कुछ जगहों पर कुरआन मजीद में कियामत के इंकारियों का सवाल नकल फ़रमाकर उनका जवाब दलील से नहीं दिया, बल्कि कियामत होने का यकीन दिलाने के लिए कियामत होने के दावे को दोहरा दिया है। चुनांचे सूरः साफ्फात में पहले इंकार करने वालों की बात नकुल फ़रमायी। फिर जवाब में दावे को दोहरा दिया। चुनांचे इर्शाद है :

अ इज़ा मिला व कुन्ना तुराबौं व इज़ामन अ इन्न ना लमबऊसून अ व आबाउनल अव्वलून । कुल नअम व अन्तुम दाख़िरून । फइनमा हि य ज़ज्रतूंव्वाहिदतुन फ इज़ा हुम यन्जुरून व कालू या वैलना हाज़ा यौमुद्दीन । हाज़ा यौमुल स्लिल्लज़ी कुन्तुम बिही तुकज़्ज़िबून ।

“क्या जब हम मर गये और मिट्टी और हड्डियां ही हड्डियां हो गये तो क्या हम उठाये जाएंगे? क्या हमारे अगले बाप-दादे भी उठाये जाएंगे? आप फरमा दीजिए कि हां, (तुम उठाये जाओगे) और जिल्लत की हालत में होगे और कहेंगे कि हाय ! हमारी ख़राबी !! यह आ गया बदले का दिन (जवाब मिलेगा कि) यह है दिन फ़ैसले का जिसको तुम झुठलाते थे ।’

सूरः सबा में इर्शाद फ़रमाया :

व कालल्लज़ी न क फ रू हल नदुल्लुकुम अला रजुलिं युनब्बि-उकुम इज़ा मुज़िक्तुम कुल ल मुमज्ज़किन इन्नकुम लफ़ी खल्किन जदीद । अफ़्त र अलल्लाहि कज़िबन अम बिही जिन्नः । बलिल्लज़ी न ला युमिनू न बिल आख़िरति फिल अज़ाब वज्जलालिल बईद ।

‘और कहने लगे काफ़िर- क्या हम बतलाएं तुमको एक मर्द जो तुम्हें ख़बर देता है कि जब तुम फट कर ज़र्रा-ज़र्रा से रेज़े (कण) हो जाओगे । तुमको फिर नये सिरे से बनना है। क्या बना लाया है अल्लाह पर झूठ या उसको जुनून है ? कुछ भी नहीं। लेकिन जो लोग आख़िरत पर ईमान नहीं रखते, आफत में हैं और गुमराही में दूर जा पड़े हैं।’

हासिल यह है कि क़ियामत हक है। अल्लाह तआला की जब मंशा होगी; सूर फूंक दिया जाएगा। कियामत आ मौजूद होगी। तो कोई भी उसको झुठलाने वाला न होगा। उसके आने का वक्त अल्लाह तआला के इल्म में मुकर्रर है। लोगों के एतराज़ करने से अल्लाह तआला वक़्त से पहले ज़ाहिर न फरमायेंगे। सूरः सबा में यह भी इर्शाद है :

व यक़ूलू न मता हाज़ल वअदु इन कुन्तुम सादिक़ीन । कुल लकुम मीआदु यौमिल्ला तस्तख़िरू न अन्हु सातौं वला तस्तदिमून ।

‘और वे कहते हैं कि यह वादा कब पूरा होगा अगर तुम सच्चे हो आप कह दीजिए कि तुम्हारे लिए वादा है एक दिन का । न एक घड़ी इससे लेट किये जाओगे और न पहले।’

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