Beti (ladki, behan) के लिए अच्छा rista (ladka) कैसे dhunde ? | शादी सुधा zindagi bachane के लिए क्या करें ? – Dawat~e~Tabligh

Beti के लिए रिस्ता। लड़की के रिस्ते के लिए लड़के में क्या dhekna ? Shaadi क्यों की जाति है ? Beti ( ladki, behan) के लिए अच्छा rista (ladka) कैसे dhunde ? | शादी सुधा zindagi bachane के लिए क्या करें ? – Dawat~e~Tabligh in Hindi…

Beti (ladki, behan) के लिए अच्छा rista (ladka) कैसे dhunde ? | शादी सुधा zindagi bachane के लिए क्या करें ? - Dawat~e~Tabligh
Beti (ladki, behan) के लिए अच्छा rista (ladka) कैसे dhunde ? | शादी सुधा zindagi bachane के लिए क्या करें ? – Dawat~e~Tabligh

Beti के लिए रिस्ता

हज़रत अब्दुल्लाह बिन मुबारक रह० की अजीब सवानेह उमरी हज़रत अब्दुल्लाह रह० के वालिद का क़िस्सा।

बहुत दिनों की बात है। शहर हर्रान में एक तुर्की ताजिर रहता था। यह बहुत बड़ा मालदार था। उसके पास अंगूर, अनार और सेब के बड़े-बड़े बाग थे, शानदार कोठियां थीं, दौलत की रेल-पेल थी, ऐश व आराम की कौन-सी चीज़ थी जो उसके पास न थी। लोग उसे देखकर उसकी ज़िंदगी पर रश्क करते थे। लेकिन एक फ़िक्र थी जो उसे अंदर ही अंदर खा रही थी। दिन-रात वह उसी फ़िक्र में घुलता । अपने दोस्तों और अज़ीज़ों से मशवरा करता लेकिन उसकी समझ में कोई बात न आती और कोई फ़ैसला न कर पाता।

बात यह थी कि उसकी एक नौजवान लड़की थी, बड़ी ही खूबसूरत, नेक और सलीका वाली, अदब, तहजीब, इल्म, हुनर, नेकी और दीनदारी सब ही खूबियां अल्लाह ने उसे दे रखी थीं घर-घर से उसके पैगाम आ रहे थे। चूंकि यह तुर्की ताजिर एक ऊंचे शरीफ़ ख़ानदान का आदमी था और फिर अल्लाह तआला ने माल व दौलत भी दे रखी थी। तबीयत में नेकी और भलाई भी थी इसलिए हर एक चाहता था कि वह उसकी लड़की को ब्याह कर लाए लेकिन तुर्की ताजिर का दिल किसी भी लड़के के लिए न टिकता था। बड़े-बड़े घरानों के पैग़ाम आए लेकिन बाप ने हर जगह इंकार ही किया। वह जिस क़िस्म के लड़के से अपनी प्यारी बेटी की शादी करना चाहता था, अभी तक उसे ऐसा कोई लड़का न मिल सका था।

Beti (ladki, behan) के लिए अच्छा rista (ladka) कैसे dhunde ?

  • हज़रत मुबारक की नेकी

उस ताजिर के एक बाग़ की देख-भाल जो साहब करते थे उनका नाम मुबारक था। थे भी वह वाकई बड़े मुबारक। बड़े ही नेक और दीनदार आदमी। ताजिर के दिल में भी उनकी बड़ी इज्ज़त थी और हर काम में वह उन पर भरोसा करता था ।

एक दिन इत्तिफ़ाक़ से यह तुर्की ताजिर अपने बाग़ में गया। मुबारक वहां अपने काम में लगे हुए थे। मालिक को देखकर झट आए, सलाम किया और बातचीत होने लगी। थोड़ी देर बाद मालिक ने कहा, “मियां मुबारक! जाओ एक मीठा-सा अनार तो तोड़ लाओ।” मुबारक बाग़ में गए और एक खूबसूरत बड़ा-सा अनार तोड़ लाए। मालिक ने तोड़ा और चन्द दाने मुंह में डाले। “अरे यह तो बहुत खट्टा है, तुम कैसा अनार तोड़कर लाए?” मालिक ने ख़फ़ा होकर कहा ।

“हुजूर! और तोड़ लाऊं। 2” मुबारक ने कहा।

मालिक ने कहा, “हां जाओ जरा मीठा-सा तोड़कर लाओ इतने दिन हो गए अभी तक तुम्हें यह न मालूम हुआ कि किस पेड़ के अनार मीठे हैं?” “हुजूर! मुझे कैसे मालूम होता? मुझे आपने खट्टे-मीठे अनार चखने के लिए तो नहीं मुक़र्रर किया है। मेरा काम तो सिर्फ़ यह है कि बाग़ की देख भाल करूं, मुझे इससे क्या मतलब कि किस पेड़ के अनार मीठे हैं और किस के खट्टे ।”

मुबारक की यह बात सुनकर मालिक बहुत ख़ुश हुआ, दिल ही दिल में कहने लगा, मुबारक कैसे दयानतदार आदमी हैं, यह तो आदमी नहीं, फ़रिश्ता लगता है, भला ऐसे लोगों का काम क्या बाग की हिफ़ाज़त है? यह शख़्स तो लायक है कि हर वक़्त मेरे साथ रहे, हर काम में मैं उससे मशवरा लूं और उसकी सोहबत में रहकर भलाई और नेकी सीखूं ।

यह सोचकर उसने मुबारक से कहा, “भाई तुम मेरे साथ कोठी पर चलो, आज से तुम वहीं कोठी में मेरे साथ रहना, बाग की हिफ़ाज़त के लिए किसी और आदमी को मुकर्रर कर दिया जाएगा।” मुबारक खुशी-खुशी अपने मालिक के साथ कोठी पर पहुंचे और आराम से रहने लगे। मालिक भी अक्सर आकर मुबारक की अच्छी सोहबत में बैठता, दीन व ईमान की बातें सुनता, ख़ुदा रसूल का ज़िक सुनता और खुश होता।

एक दिन मुबारक ने देखा कि मालिक कुछ सोच रहा है। जैसा उसे कोई बहुत बड़ी फ़िक्र हो। पूछा “क्या बात है? आज आप बड़े फिक्रमंद नज़र आ रहे हैं?” मालिक जैसे उस सवाल का इतिज़ार ही कर रहा था। उसने अपनी सारी परेशानी की कहानी सुना डाली।

मालिक ने कहा, “मुबारक! यह बताओ, मैं अब क्या करूं? बेशुमार पैगाम हैं, किसे इक़रार करूं, और किसे इंकार करूं? इसी फ़िक्र में दिन रात घुलता रहता हूं और कोई फ़ैसला नहीं कर पाता।”

मुबारक ने कहा, “बेशक यह फिक्र की बात है। जवान लड़की जब घर में बैठी हो तो मां-बाप को फ़िक्र होती है अगर मुनासिव रिश्ता मिल जाए तो ज़िंदगी भर सुख और चैन है और किसी बुरे से ख़ुदा-न-ख़ास्ता पाला पड़ जाए तो जिंदगी भर का रोना है।” “फिर ही कोई हल बताओ।” मालिक ने कहा।

हुजूर ” मेरे नजदीक तो यह कोई ऐसी बात नहीं है जिसके लिए आप दिन-रात घुलें और अपनी सेहत ख़राब करें। हम और आप ख़ुदा का शुक्र है। मुसलमान हैं, ज़िंदगी के हर मामले में प्यारे रसूल सल्ल० की पाक जिंदगी हमारे लिए बेहतरीन उसवा है। उस उसवा पर जब भी हम अमल करेंगे, इंशा अल्लाह अच्छाई ही हमारे सामने आएगी।” मुवारक ने पूरे इत्मीनान से कहा।

“अच्छा तो फिर बताओ कि प्यारे रसूल सल्ल० के उसवा की रौशनी में मुझे क्या करना चाहिए? यह तो हक़ीक़त है कि जब भी कोई मुसलमान इस बेहतरीन उसवा से मुंह मोड़ेगा जलील होगा।” मालिक ने कहा।

“देखिए जहां तक इस्लाम से पहले के लोगों का ताल्लुक है, ये लोग इञ्जत, शोहरत और खानदानी बड़ाई ढूंढ़ते थे यहूदी लोग माल पर जान छिड़कते थे, और ईसाई ख़ूबसूरती और हुस्न तलाश करते थे। लेकिन मुसलमानों को प्यारे रसूल ने ताकीद की है तुम रिश्ता करते वक्त हमेशा नेकी और दीनदारी को देखना।” मालिक यह सुनकर खुशी से उछल पड़ा और कहा, “मुबारक! ख़ुदा की कसम तुमने मेरा सारा राम धो दिया जैसे अब मुझे कोई फ़िक़ ही नहीं है।”

लड़की के रिस्ते के लिए लड़के में क्या dhekna ?

  • मुबारक की शादी

वह ख़ुश-खुश घर पहुंचा। बीवी को सारा क़िस्सा सुनाया। वह भी खुश हुई और मुबारक की नेकी और सूझ-बूझ की तारीफ़ करने लगी। तुर्की ताजिर ने मौका मुनासिव पाकर बीवी से कहा, “फिर हम क्यों न अपनी प्यारी बेटी का निकाह मुबारक से कर दें।”

“हाय क्या कहा? घर के नौकर से गुलाम से दुनिया क्या कहेंगी?” बीवी चिल्लाई “क्या हर्ज है अगर नौकर है? प्यारे रसूल सल्ल० ने फ़रमाया है कि तुम नेकी और दीनदारी को देखो। ख़ुदा की क़सम मुझे तो उस कसौटी के लिहाज़ से पूरे शहर हरान में मुबारक से ज़्यादा नेक और दीनदार नज़र नहीं आता । बड़ा ही समझदार और दयानतदार आदमी है। अगर प्यारे रसूल सल्ल० सच्चे हैं, और उनका कहा मानने में भलाई है, तो हमें दुनिया से बेफ्रिक होकर अपने जिगर के गोशे को मुबारक के हवाले कर देना चाहिए और अगर हमने ऐसा न किया तो गोया हम ख़ुद ही अपने अमल से प्यारे रसूल सल्ल० की बात को झुठलाएंगे।” तुर्की ताजिर ने इत्मीनान और यक़ीन से कहा ।

शहर का यह अज्म देखकर और सीधी-सच्ची बात सुनकर वीवी भी दिल से राजी हो गई और हर्शन के रईस की उस चांद-सी लड़की की शादी एक ऐसे गरीब से रचाई गई जिसके पास न रुपया-पैसा था, न कोई घर और न ही किसी ऊंचे घराने से उसका ताल्लुक़ था। उसके पास अगर कोई दौलत थी तो ईमान व इस्लाम की, नेकी और तक़वा की। यह वही लड़की थी जिसके लिए हर्शन के बड़े-बड़े रईसों ने पैगाम भेजे, ऊंचे-ऊंचे खानदानी लड़कों ने पैगाम भेजे। लेकिन मुबारक की नेकी और तक़वा के मुक़ाबले में हर एक ने शिकस्त खाई।

Shaadi क्यों की जाति है ?

शादी घर बसाने के लिए की जाती है घरेलू ज़िंदगी ज़ौजेन के इत्तिहाद से ही पुरसुकून बनती है शादी घर बसाने के लिए की जाती है। अगर मियां-बीवी एक दूसरे से ज्यादा तवक़्क़ुआत वाबस्ता करने और ज़िद पर अड़ जाने के बजाए दरगुज़र और ईसार का रवैया अपनाएं तो घर खुशियों का गहवारा बन सकता है। इंसान की बक़ा के लिए क़ानूने फ़ितरत मुसलसल मसरूफ़े अमल है। इसकी बुनियाद ‘मुहब्बत’ जैसे पाकीज़ा जज़्बे पर रखी गई है कि किसी भी घर को बुराइयों से पाक रखने के लिए मुहब्बत जैसे पुरबुलूस जज्बे की ज़रूरत हमेशा रहेगी। दीने इस्लाम में दिलों को आपस में जोड़ने और बाहमी हमआहंगी पैदा करने के लिए शादी जैसा मुक़द्दस बंधन मौजूद है। शादी एक ऐसा मजहबी फ़रीज़ा है जिसके सबब एक सही मुकम्मल खानदान, घर और मुआशिरा, तशकील पाता है।

Zindagi एक सफर है

यूं भी जिंदगी एक सफ़र के मानिन्द है और मियां-बीवी इस सफर के ऐसे साथी हैं जिसका रास्ता भी एक है और मंजिल भी एक अगर उनके दर्मियान मुकम्मल जेहनी हमआहंगी और जज्ब-ए-मुहब्बत मौजूद हो तो यह सफ़र निहायत आराम और सुकून से कट सकता है। वैसे जब दो रूहें निकाह जैसे पाक बंधन में बंधती हैं तो फिर उनकी यकजाई खानदान की इकाई को जन्म देती है। यही इकाई आगे जाकर बेहतर घर और सालेह मुआशिरे की सूरत में ढलती है। गोया बेहतरीन घर और सालेह मुआशिरे की तामीर के लिए ख़ानदान की इकाई की मजबूती और खूबसूरती निहायत जरूरी है। चूँकि समझिए कि पुरसुकून घर और मुआशिरा पुरसुकून इज़दवाजी ज़िंदगी से मशरुत है बजाहिर तो कोई भी लड़की नए घर की बुनियाद इसलिए नहीं रखती कि उसे आबाद न किया जाए, घर का माहौल खुशगवार न हो, मगर बाज़ औक़ात हालात मुवाफ़िक़त नहीं रखते।

बहुत कुछ तवक़्क़ोआत के ख़िलाफ़ हो जाता है तो जिंदगी का सुकून दरहम-बरहम हो जाता है ऐसा होना दुरुस्त नहीं, यह तय है कि मर्दों की बनिस्बत ख्वातीन को ज़्यादा कुरबानियां और ख़िदमात पेश करनी पड़ती हैं लेकिन औरत की कुरबानी और ईसार से एक खूबसूरत घर और मुआशिरा तख़्लीक़ पाता है तो उससे बढ़कर एजाज़ क्या होगा ।

शादी सुधा zindagi bachane के लिए क्या करें ?

आगे घर और बेहतरीन मुआशिरे की तशकील के लिए चन्द बातें दर्ज की गई हैं जो आम सी होने के बावजूद बेहद अहम और ख़ुशगवार इज़दवाजी ज़िंदगी की कुंजी हैं-

  1. दिन भर का थका-हारा शौहर जब घर में दाखिल हो तो उसका इस्तकबाल एक भरपूर मुस्कुराहट और सलाम से करें, इस तरह वह सारी थकन भूल कर अपने आपको इकदम तरो-ताज़ा महसूस करेगा। कोशिश करें कि शौहर की आमद से क़ब्ल घर की सफ़ाई और लिबास साफ़-सुथरा पहन कर हल्का-फुल्का तैयार हों और बच्चों को भी साफ़-सुथरा रखें। इस तरह घर के माहौल में खुशगवारी रची-बसी रहेगी
  2. हर हाल में अल्लाह का शुक्र अदा करें अगर शौहर की आमदनी कम हो तो इस बात का ताना कभी न दें, बल्कि ऐसे मरहले में उनका साथ दें। ऐसे हालात में किफ़ालत शुआरी से काम लें, नाकी न करें हुजूर सल्ल० ने एक मर्तबा औरतों से मुखातिब होते हुए फरमाया था कि मैंने दोजख में सबसे ज्यादा औरतों को देखा है। वजह पूछने पर बताया, शौहर की नाफरमानी और नाशुक्री की वजह से।
  3. अपने गुस्से को काबू में रखें, क्योंकि ज़्यादा तर इख्तिलाफ़ गुस्से की वजह से होते हैं। अगर शौहर गुस्से में हो तो ख़ामोश रहें। कुछ वक्त गुज़र जाने के बाद उन्हें अपनी बात निहायत ही शीरी लहजे में समझाएं ताकि वह आपके मौक़िफ़ को अच्छी तरह समझ सके, इस तरह बात कभी नहीं बढ़ेगी। अलबत्ता शौहर के दिल में आपकी अहमियत और इज्जत मजीद बढ़ जाएगी।
  4. आप ससुराली रिश्तेदारों के मुताल्लिक़ कोई बात अपने मैके में न करें। क्योंकि इस तरह दोनों ख़ानदानों के दर्मियान इख़्तिलाफ़ात पैदा होने का ख़दशा होता है। अपने सुसर, सास, ननद, जेठ और देवर की इज़्ज़त दिल से करें। उन्हें इस तरह समझें जैसे मैके में वालिदेन और बहन-भाइयों को समझती थीं, मामूली बातों को दिल पर न लें बल्कि यह सोचकर खुद को जेहनी तौर पर मुतमईन करें कि जब शादी से पहले भी कभी वालिदैन किसी बात पर डॉट देते थे या बहन-भाइयों से किसी बात पर इख़्तिलाफ़ हो जाता था तो हम एक दूसरे को जल्दी से मना लिया करते थे मैके की तरह अगर ससुराल में भी यही सोच और रवैया रखेंगी तो यक़ीनन ज़ेहनी तौर पर मुतमाइन रहेंगी, जिससे आपकी तबीयत और मिज़ाज पर भी बहुत असर पड़ेगा।
  5. कोशिश कीजिए कि शोहर की इजाज़त के बगैर कहीं बाहर न निकलें। क्योंकि इस तरह ताल्लुक्रांत में भी एतिमाद की फ़िज़ा क़ायम हो जाती है। बेहतर है कि एक-दूसरे को हर बात से आगाह रखा जाए ताकि रिश्ते में मज़बूती और एतिमाद पैदा हो।
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