Maa-baap ki nafarmani | बूढ़े माँ-बाप की खिदमत- Dawat~e~Tabligh

बच्चे कामयाब होने के बाद Maa-baap को क्यों छोड़ देते हैं? सांप के बच्चे वफ़ादार नहीं हो सकतेMaa-baap बोझ क्यों लगने लगी है ? Maa-baap ki nafarmani | बूढ़े माँ-बाप की खिदमत- Dawat~e~Tabligh in Hindi…

Maa-baap ki nafarmani | बूढ़े माँ-बाप की खिदमत- Dawat~e~Tabligh
Maa-baap ki nafarmani | बूढ़े माँ-बाप की खिदमत- Dawat~e~Tabligh

बुरे दोस्त के साथ दोस्ती करना

  • सांप के बच्चे वफ़ादार नहीं हो सकते

बुरे दोस्त के साथ दोस्ती न करें और अपने नसब को धब्बा न लगाएं, कड़वे कुएं कभी मीठे नहीं हो सकते चाहे तुम उसमें लाखों मन गुड़ डाल दो, कव्वे के बच्चे कभी हंस नहीं बना करते चाहे तुम उनको मोतियों की ग़िज़ा खिलाते रहो, सांप के बच्चे वफ़ादार नहीं हो सकते चाहे चुल्लू में दूध लेकर उनको क्यों न पिला दें। हंज़ल कभी तरबूज़ नहीं बनता है चाहे उस फल को तुम मक्का ही क्यों न लेकर चले जाओ।

Maa- baap ki bejati करना

  • नाफरमान औलाद और वालिदेन के हुकूक

इंसान पर जो हुकूक वाजिद हैं उनमें एक हुकुकुल इवाद भी है इसमें सबसे पहला हक़ रसूल सल्ल० का है। फिर आप सल्ल० के बाद निस्बती और खूनी रिश्ते का दर्जा आता है जिसमें मां-बाप, बेटे-बेटियां, भाई-बहन और दीगर रिश्तेदारों के हुक्कूक्क़ का दर्जा है। लेकिन जब हम मुआशरे का जाइज़ा लेते हैं तो यह बात साफ़ हो जाती है कि ऐसे बहुत कम लोग हैं जो वालिदैन के हुक्कूक़ का ख़ातिर ख़्वाह ख़याल रखते हैं। वालिदैन के हुक्कूक़ का ख़याल तो दरकिनार हम तो वालिदैन की नाफरमानी और हुक्म उदूली में ज़र्रा बराबर भी शर्म व नदामत महसूस नहीं करते। बाज़ तो ऐसे हैं जो अपनी बीवी के सामने वालिदैन की बेइज्ज़ती और उनसे ज़बानदराज़ी करते हैं और अफ़सोस की बात यह है कि वह उसे बहुत बड़ा कारनामा समझते हैं।

Maa-baap ka makam 

शरई नुक़्त-ए-नज़र से अगर देखा जाए तो अल्लाह रब्बुल इज्जत और उसके महबूब सरकारे दो आलम सल्ल० के बाद दुनिया में सबसे जादा अदब व एहतिराम, हुस्न व सुलूक के हक़दार वालिदैन ही हैं कुरआन शरीफ़ में अकसर मक़ामात पर अल्लाह तआला ने अपनी वहदानियत के साथ-साथ वालिदैन के साथ हुस्ने सुलूक, खुश उस्लूबी, फ़रमाबरदारी, एहसान-शनासी और शुक्र-गुज़ारी का भी दर्स दिया है। इससे यह भी वाज़ेह हो जाता है कि अल्लाह तआला की बारगाह में वालिदैन का रुत्वा क्या है और उनका मक्काम क्या है, बल्कि यहां तक हुक्म है कि अगर वालिदेन की किसी तकलीफ़देह बात से औलाद के दिल को ठेस पहुंचती है तो उन्हें उफ़ तक कहने से अल्लाह तआला ने मना फ़रमाया है।

Maa-baap ki nafarmani

हुज़ूर सल्ल० ने इरशाद फ़रमाया कि अपने मां-बाप का फ़रमांबरदार और ख़िदमतगुजार कोई भी फ़रनन्द, जब उनकी तरफ मुहब्बत से देखता है तो अल्लाह तआला उसके लिए हर निगाह के बदले एक हज का सवाब अता फ़रमाता है। इसी तरह वालिदैन की नाफ़रमानी ईज़ारसां औलाद को दुनिया व आखिर में दर्दनाक अज़ाब की भी खबर दी है।

कितनी ख़ुश नसीब है वह औलाद जिनके वालिदैन बाहयात हैं और वे अपने वालिदैन की निगहबानी और ख़िदमत में अपना वक़्त गुज़ारते हैं। जो अपने वालिदैन की मामूली सी तकलीफ का खयाल रखते हैं और उनकी छोटी बड़ी जरूरतों को खुशी-खुशी पूरा करना अपनी ख़ुशकिस्मती समझते हैं, ऐसी औलाद के लिए जन्नत की बशारत दी गई है।

बच्चे कामयाब होने के बाद Maa-baap को क्यों छोड़ देते हैं?

दौरे हाज़िर में औलाद दुनियावी तालीमात हासिल करके आला ओहदे या मुलाज़िमात पाने के बाद न सिर्फ अपने अजीज व अकारिव और ख़ानदान से कटने लगे हैं बल्कि जिन वालिदैन ने शब व रोज़ मेहनत-मशक्कत करके लिखाया पढ़ाया वही उन्हें अब हक़ीर लगने लगे हैं। वालिदेन की मामूली ग़लती, गैर-ज़रूरी कलिमात या हरकात जो बुढ़ापे और कमज़ोरी की वजह से कुदरती होते हैं, अब औलाद को बरनश्ता करने लगे हैं, मां-बाप उनकी नाराज़गी का सबब बनने लगे हैं। यह और इसी तरह की दूसरी वुजूहात की बिना पर वालिदैन को अलग कर दिया जाता है। हद तो यह है कि बाज़ औलादें अपने बीवी-बच्चों तक को उनसे मिलने से मना कर देते हैं। -सी बहुत- औलादें ऐसी भी हैं जो महज इसलिए वालिदैन से रिश्ता मुकता कर देते हैं कि जाहिल और कम पढ़े लिखे मां-बाप की वजह से उनकी मॉडर्न तहजीब और आला तर्ज के रख-रखाओ में बिगाड़ व खलल पैदा न हो जाए। इसके अलावा वे नहीं चाहते कि वालिदैन उनकी जाती जिंदगी में दखल अंदाज़ हो । इसलिए वे उन्हें अपने से दूर रखने को तर्जीह देते हैं।

इधर मां-बाप अपनी पोता-पोतियों की याद में परेशान होकर अपनी जिंदगी के आखिरी अय्याम बड़ी करमपुर्सी में गुजारते हैं। यह एक ऐसा दर्दनाक पहलू है जिससे घबराकर दूसरी क्रीमों ने बूढ़ों का हॉस्टल बना रखा है, जहाँ उम्र के आखिरी लम्हों में उन्हें वहां तनहा छोड़ दिया जाता है। वहां पहुंचकर बूढ़े बस अपनी मौत का इंतिज़ार करते नज़र आते हैं और एक दिन ऐसा आता है कि औलाद की शदीद मसरूफ़ियात की वजह से वे दूसरों के कंधों के सहारे इस दारे फ़ानी (दुनिया) से रुख्सत होते हैं ।

Maa-baap बोझ क्यों लगने लगी है ?

हमारे मुआशरे के तालीमाता, नई तहजीब के दिलदादा, फैशनपरस्त नौजवानों को अपने वालिदैन बोझ नज़र आते हैं, जिसने जाने किन-किन तकलीफ़ों, मन्नतों, अपने अरमानों और ख़्वाहिशात का गला घोंटकर औलाद को पढ़ाया-लिखाया और क़ाबिल इंसान बनाने में अपनी पूरी पूंजी और ताक़त लगा दी, लेकिन उसका बदला सिवाए हिक़ारत और नफ़रत के कुछ न मिला।

बच्चे Maa-baap को अपने साथ क्यों नहीं रखते ?

इतना कुछ होने के बाद भी मां-बाप अपनी औलाद को बुरा कहना गवारा नहीं करते, बल्कि तारीफ़ ही करते हैं, क्योंकि औलाद उनके जिगर का टुकड़ा होती है। भले ही यह टुकड़ा कितना ही फ़रेबी, एहसान फ़रामोश, खुदगर्ज़ और मफ़ादपरस्त क्यों न हो जाए। मां-बाप की नज़र में वह मासूम और बेगुनाह ही होता है। औलाद को यह भी मालूम होना चाहिए कि हर चीज़ की एक हद होती है। एक मुद्दत होती है। अगर वह उस हद से तजावुज़ कर जाए तो मां के दुखे दिल से निकली एक आह बद्दुआ बनकर हंसते खेलते, फले-फूले गुलिस्तां को तवाह व बर्बाद कर सकती है। वालिदैन चाहे किने ही ग़रीब, मुफ्लिस, कमजोर, लाचार क्यों न हों, वे हमेशा अपनी मेहनत व मुशक्कत से अपना पेट काटकर अपने बच्चों का पेट भरते हैं। मगर आज मुआशरे का हाल यह है कि पांच बच्चे मिलकर भी अपने वालिदैन को सहारा देने में आनाकानी करते हैं। कई-कई बहानों से उन्हें अपने से अलग रखने की कोशिश करते हैं। उन पांच बच्चों के लिए उनके वालिदैन एक बहुत बड़ा मसला बल्कि बहुत बड़ा बोझ और मुसीबत होते हैं।

बूढ़े माँ-बाप की खिदमत

इस्लाम में वालिदैन का इतना बड़ा रुत्वा और मक़ाम है तो हमें चाहिए कि हम अपने वालिदैन के साथ (वह चाहे कैसे भी हों) हुस्ने सुलूक से पेश आएं ताकि जन्नत के मुस्तहिक बन सकें। मां-बाप को हमेशा खुश रखने की कोशिश करें और उनकी मर्जी और मिज़ाज के खिलाफ कोई ऐसा काम न करें जो उनकी नाराज़गी का सबब बने। ख़ास तौर पर उस वक़्त उनका ज़्यादा ख्याल रखें जब वे बुढ़ापे की वजह से कमज़ोर और मिज़ाज के चिड़चिड़े हो जाते हैं। उस वक़्त वालिदैन की ख़िदमत करना और उन्हें हर तरह का आराम पहुंचाना ही असल ख़िदमत होगी। 

लुकमान अलैहि० की अपने बेटे को नसीहत

बैहक़ी की “शोबुल ईमान” ही में हज़रत हसन रज़ि० से मंकूल है कि हज़रत लुक़मान अलैहि० ने अपने बेटे से कहा, “ऐ प्यारे बेटे! मैंने चट्टान, लोहे और हर भारी चीज़ को उठाया लेकिन मैंने पड़ोसी से ज़्यादा सक़ील किसी चीज़ को नहीं पाया और मैंने तमाम कड़वी और तल्ख चीज़ों का ज़ाइक़ा चख लिया, लेकिन फ़कर व तंदरुस्ती से तल्ख कोई चीज़ नहीं पाई। ऐ बेटे! जाहिल शख्स को हरगिज़ अपने क्रासिद और नुमाइंदा मत बना और अगर नुमाइंदगी के लिए कोई क़ाबिल और अक्लमंद शख्स न मिले तो खुद अपना क्रासिद बन जा।”

” बेटे ! झूठ से ख़ुद को महफ़ूज़ रख, क्योंकि यह चिड़िया के गोश्त के मानिन्द निहायत मरगूब है। थोड़ा-सा झूठ भी इंसान को जला देता है। ऐ बेटे! जनाज़ों में शिरकत किया कर और शादी की तकरीबात में शिरकत से परहेज कर, क्योंकि जनाज़ों की शिरकत तुझे आखिरत की याद दिलाएगी और शादियों में शिरकत दुनिया की ख़्वाहिशात को जन्म देगी। आसूदा शिकम होते हुए दोबारा शिकम सैर होकर मत खा क्योंकि इस सूरत में कुत्तों को डाल देना खाने से बेहतर है। बेटे न इतना शीरीं बन कि लोग तुझे निगल जाएं और न इतना कड़वा कि थूक दिया जाए।”

(हयातुल हैवान, जिल्द 3, पेज 153)

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