मेहमान ka khayal rakhne ke faide| Aache aurat की nishani – Dawat~e~Tabligh

दो औरतों का अजीब Waqia। अच्छी औरत की क्या सिफ़ात होनी चाहिएं ? बेदीन औरत की जवान वह तलवार है, जो कभी ज़ंग आलूद नहीं होती। मेहमान ka khayal rakhne ke faide Web Stories | Aache aurat की nishani – Dawat~e~Tabligh in Hindi….

मेहमान ka khayal rakhne ke faide| Aache aurat की nishani - Dawat~e~Tabligh
मेहमान ka khayal rakhne ke faide| Aache aurat की nishani – Dawat~e~Tabligh

Aachi aurat की nishani 

  • अच्छी औरत की क्या सिफ़ात होनी चाहिएं ?

अहलुल्लाह ने लिखा है कि बीवी में चार सिफ्रात ज़रूर होनी चाहिएं :

 1. पहली सिफ़त यह है कि उसके चेहरे पर हया हो। यह बात बुनियादी हैसियत रखती है कि जिस औरत के चेहरे पर हया होगी उसका दिल भी हया से लबरेज होगा। मसल मशहूर है कि चेहरा इंसान के दिल का आइना होता है। हज़रत अबू वक्र सिद्दीक रजि० का कोल है कि मदों में भी हया बेहतर है, मगर औरत में बेहतरीन है। 

2. दूसरी सिफ़्त यह है कि उसकी जबान में शीरीनी हो यानी जो बोले तो कानों में रस घोले । यह न हो कि हर वक़्त खाविन्द को जली कटी सुनाती रहे या बच्चों को बात-बात पर झिड़कती रहे।

 3. तीसरी सित यह है कि उसके दिल में नेकी हो।

4. चौथी सिफ़त यह कि उसके हाथ काम-काज में मसरूफ़ रहें। ये खुबीयां जिस औरत में है, यकीनन वह बेहतरीन बीवी की हैसियत से जिंदगी गुज़ार सकती है।

Aachi aurat की nishani Web Stories

बद-जबानी Aurat 

  • बेदीन औरत की जवान वह तलवार है, जो कभी ज़ंग आलूद नहीं होती

बद-ज़बान बीवी अपने शौहर को क़ब्र तक पहुंचाने के लिए घोड़े की डाक का काम करती है। जिसकी बीवी बद जबान हो उसको सारी ज़िंदगी सुकून नहीं मिल सकता। औरत को कहा गया है कि वह अपनी ज़बान के अंदर नर्मी और मिठास पैदा करे और अच्छे अंदाज से बात करे। वैसे यह पक्की बात है कि मीठी से मीठी औरत क्यों न हो फिर भी उसके अंदर थोड़ी बहुत तल्खी जरूर होती है, क्योंकि ताल्लुक ही ऐसा नाज़ व अंदाज़ का होता है। ताहम औरत की जबान में नर्मी होनी चाहिए। शरीअत ने औरत से कहा कि अपने खाविन्द से नर्म अंदाज़ में बात करें, जहां किसी गैर मर्द से बात करने का वक्त हो तो सख्ती से बात करे, ताकि उसे दूसरी बात पूछने की जुर्रत न हो। आजकल की फ़ैशनेबल औरतों का मामला उल्टा है। खाविन्द से बात करनी हो तो सारी दुनिया की कड़वाहट सिमट आती है और किसी गैर से करनी हो तो सारी दुनिया की शीरीनी सिमट आती है। बहरहाल यह मुसल्लमा हक़ीक़त है कि जिन रिश्तों को तलवार नहीं काट सकती उसको जबान काट के रख देती है। यह भी याद रखिए कि औरत की जबान वह तलवार है जो कभी जंग आलूद नहीं होती। बाज औरतें तो इतनी बद जबान होती हैं कि अगर औरतें न होतीं तो नाकाबिले बरदाश्त होतीं।

कई औरतें तो बद-जबानी और बद-गुमानी ही की वजह से घर बबाद कर लेती हैं। हरम मर्द से बात करो तो नमीं से, गैर महरम से बात करनी पड़ जाए तो सख्ती से करो, किसी का कोल है कि अगर और तसारे दिन में एक मर्तबा अपने खाविन्द से नमीं से बात करे जिस नमीं से वह पड़ोसी मर्द से बात करती है तो घर आबाद रहे। इस तरह अगर मर्द पूरे दिन में एक मर्तबा बीबी को उस मुहब्बत की निगाह से देखे जिस नज़र से वह पड़ोसी औरत को देखता है तो भी घर आबाद रहे। 

नोट: गैर महरम औरत को देखना या गैर महरम मर्द को देखना शरजन नाजाइज़ है।

मेहमान ka khayal rakhne ke faide – एक किस्सा

  • दो औरतों का अजीब वाक्रिया

एक बुजुर्ग हैं, उनका नाम है हाशिम रह०। वह कहते हैं। मैं सफ़र में था तो मैं एक खेमे में उतरा। मुझे भूख लगी हुई थी। उस खेमे में एक औरत बैठी हुई थी। मैंने कहा कि बहन भूख लगी है, खाना मिल जाएगा? कहने लगी कि मैं मुसाफिरों के लिए खाना पकाने बैठी हूँ? जा अपना रास्ता ले कहने लगे कि भूख ऐसी थी कि मैं उठ न सका। मैंने सोचा कि वहीं सुस्ताकर चला जाऊंगा। इतने में उसका खाविन्द आ गया। उसने मुझे देखा और कहाः 

: मरहबा ! कौन हैं?

:कहा, मैं मुसाफिर हूं।

:खाना खाया? नहीं खाया।

:क्यों?

:मांगा था, लेकिन मिला नहीं?

उसने अपनी बीवी से कहा, ज़ालिम तूने इसे खाना ही न खिलाया। उसने कहा कि मैं कोई मुसाफ़िरों के लिए बैठी हूं। मुसाफ़िरों को खिला-खिलाकर अपना घर खाली कर लूं।

ऐसी बदअख़लाक़ी में ख़ाविन्द ने बीवी से कोई बदतमीज़ी नहीं की। कहा कि अल्लाह तुझे हिदायत दे ।

आप सल्ल० ने फरमाया कि बेहतरीन मर्द वह है जो बीबी के साथ अच्छा सुलूक करे। उन्होंने कहा, अच्छा तू अपना घर भर ले, फिर उसने बकरी जिवह की, उसको काटा और गोश्त बनाया, पकाया, खिलाया, और साथ ही माज़रत भी की और उनको रवाना किया। चलते-चलते आगे एक जगह पहुंचे, अगली मंजिल पर भी एक खेमा आया, वहां पड़ाव डाला तो एक ख़ानून बेटी थी। कहा, बहन मुसाफ़िर हूं, खाना मिल जाएगा। उसने कहा, मरहवा? अल्लाह की रहमत आ गई, अल्लाह की बरकत आ गई। अब मैं आपकी सच बताऊं। किसी ज़माने में बूढ़ियां, दादियां, कोई मेहमान आता तो वह ख़ुश होकर कहतीं, अल्लाह की बरकत आ गई, नौकरों को हटाकर खुद काम करना शुरू कर देती। और अब जब सारी सहूलतें हैं इस वक्त यह कहती हैं कि यह सेवक्त आ गया, इनको वक्त का एहसास नहीं होता और आ जाते हैं। तो उस खातून ने कहा, माशाअल्लाह, मेहमान आ गया। बरकत आ गई। जल्दी से बकरी जिवह की, पकाई और पकाकर उसके सामने रखी तो उस पर उसका खाविन्द आ गया।

:उसने कहा कौन है तू?

:कहा, जी मैं मेहमान हूं।

:यह अंगूठी कहां से ली?

:जी आपकी बेगम ने दी।

तो उसने अपनी वेगम पर चढ़ाई कर दी। तुझे शर्म नहीं आती, मेहमानों को खिलाकर मेरा घर खाली कर देगी। तो मेहमान को हंसी आ गई, जोर से कस्का लगाया तो वह कहने लगा क्यों हंसते हो? कहने लगे कि पीछे इसका उलटा देखा था, कहने लगा कि जानते भी हो वह कौन है। कहा कि वह मेरी बहन है, यह उसकी बहन है। यानी एक भाई-बहन बख़ील, एक भाई बहन सखी । (इस्लाही वाक़िअयात, पेज 135 )

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