5 waqut namaz ki kahani in Hindi | सबसे पहले kisne namaz पढ़ी ?- Dawat~e~Tabligh

सबसे पहले fazar ki namaz हजरत आदम अलैहि० ने अदा की सबसे पहले zohar ki namaz किसने पढ़ी ? सबसे पहले Asar ki namaz किसने पढ़ी ? सबसे पहले Magrib ki namaz किसने पढ़ी ? Web Stories in Hindi 5 waqut namaz ki kahani in Hindi | सबसे पहले kisne namaz पढ़ी ?- Dawat~e~Tabligh..

5 waqut namaz ki kahani in Hindi | सबसे पहले kisne namaz पढ़ी ?- Dawat~e~Tabligh
5 waqut namaz ki kahani in Hindi | सबसे पहले kisne namaz पढ़ी ?- Dawat~e~Tabligh

सबसे पहले fazar ki namaz किसने पढ़ी ? 

  • सबसे पहले नमाजे फ्रज हजरत आदम अलैहि० ने अदा की

हम जो फज्र की नमाज़ अदा करते हैं और उसमें दो रकअतें फ़र्ज़ पढ़ते हैं। उसकी हिक्मत यह है कि फ़ज़ की नमाज़ सबसे पहले आदम अलैहि० ने अदा फ़रमाई। जिस वक़्त अल्लाह तआला ने उनको दुनिया में उतारा, उस वक़्त दुनिया में रात छाई हुई थी, हज़रत आदम अलैहि० जन्नत की रौशनी से निकल कर दुनिया की इस तारीक और अंधेरी रात में दुनिया में तशरीफ़ लाए । उस वक़्त हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता था। हज़रत आदम अलैहि० को बड़ी तशवीश और परेशानी लाहिक़ हुई कि यह दुनिया इतनी तारीक है, यहाँ जिंदगी कैसे गुज़रेगी? न कोई चीज़ नज़र आती है, न जगह समझ में आती है कि हम कहां हैं और कहां जाएं? हर तरफ़ अंधेरा ही अंधेरा है। चुनांचे ख़ौफ़ महसूस होने लगा, उसके बाद आहिस्ता-आहिस्ता रौशनी होने लगी और सुबह का नूर चमकने लगा। सुबह सादिक़ ज़ाहिर हुई तो हज़रत आदम अलैहि० की जान में जान आई। उस वक़्त हज़रत आदम अलैहि० ने सूरज निकलने से पहले दो रकअतें बतौर शुक्राना अदा फ़रमाई। एक रकअत रात की तारीकी जाने के शुक्राने में अदा फरमाई और एक रकअत दिन की रौशनी नमूदार होने के शुक्राने में अदा फ़रमाई। यह दो रकअतें अल्लाह तआला को इतनी पसन्द आई कि अल्लाह तआला ने उनको हुज़ूरे अक़दस सल्ल० की उम्मत पर फ़र्ज़ फ़रमा दिया। (इनाया) इससे अंदाज़ा लगाएं कि यह फज्र की नमाज़ कितनी अहम है।

सबसे पहले zohar ki namaz किसने पढ़ी ?

  • सबसे पहले जुहर की नमाज़ हज़रत इबराहीम अलैहि ने अदा की

इसी तरह जुहर की चार रकअत जो हम अदा करते हैं। यह सबसे पहले हज़रत इबराहीम अलैहि० ने अदा फ़रमाई थीं और उस वक़्त अदा फ़रमाई थीं जिस वक़्त वह अपने बेटे हज़रत इसमाईल अलैहि० को ज़िब्ह (Zaba) करने के इम्तेहान में कामयाब हो गए थे। एक रकअत तो उस इम्तेहान में कामयाबी पर शुक्राना के तौर पर अदा फ़रमाई। कहा था कि या अल्लाह आपका शुक्र है कि आपकी मदद से मैं इस मुश्किल इम्तेहान में कामयाब हो गया। दूसरी एक अत इस बात के शुक्राने में अदा फ़रमाई थी कि अल्लाह तआला ने हज़रत इसमाईल अलैहि० के एवज़ में जन्नत से एक मेंढा उतार दिया। चूंकि वह भी अल्लाह तआला का एक खुसूसी इनाम था, इसलिए उसके शुक्राने के तौर पर दूसरी रकअत अदा फ़रमाई ।

तीसरी रकअत इस शुकाने में अदा फ़रमाई कि अल्लाह तआला ने इस मौके पर बराहे रास्त हज़रत इबराहीम अलैहि० से ख़िताब करते हुए फ़रमायाः “हमने आवाज़ दी ऐ इबराहीम बिला शुबह तुमने अपना ख़्वाब सच कर दिखाया, हम नेको-कारों को इसी तरह बदला दिया करते हैं।” (सूरा साफफात, आयत 105 )

इस ख़िताब के शुक्राने में तीसरी रकअत अदा फ़रमाई। चौथी रकअत इस बात के शुक्राने में अदा फ़रमाई कि अल्लाह तआला ने ऐसा साबिर बेटा अता फरमायां जो इस सख्त इम्तेहान के अंदर भी निहायत साबिर और मुतहम्मिल रहा और सब्र का पहाड़ बन गया। अगर वह मुतज़लज़िल हो जाता तो मेरे लिए अल्लाह का हुक्म पूरा करना दुशवार हो जाता। चुनांचे ख़्वाब देखने के बाद बेटे ही से मशविरा किया कि ऐ बेटे, मैंने यह ख्वाब देखा है। तुम गौर करो। तुम्हारा क्या इरादा है? बेटे ने जवाब दिया, “अब्बा जान, आपको जो हुक्म मिला है वह कर गुज़रिए अंक़रीब इंशाअल्लाह आप मुझे सब्र करनेवालों में से पाएंगे।” ऐसा साबिर और मुतहम्मिल बेटा मिलने के शुक्राने में चौथी रकअत अदा फ़रमाई । इस तरह ये चार रकअतें हज़रत इबराहीम अलैहि० ने जुहर के वक़्त बतौर शुक्राने के अदा फ़रमाई थीं। अल्लाह तआला को ऐसी पसन्द आईं कि सरकारे दो आलम सल्ल० की उम्मत पर फ़र्ज़ फ़रमा दीं। (इनाया)

सबसे पहले Asar ki namaz किसने पढ़ी ?

  • सबसे पहले अस्र की नमाज़ हज़रत यूनुस अलैहि० ने अदा फ़रमाई

नमाजे अस की चार रकअतें सबसे पहले हजरत यूनुस अलेहि० ने अदा फ़रमाई। जिस वक्त वह मछली के पेट में थे, वहां उन्होंने अल्लाह तआला  को पुकारा; जिसको अल्लाह तआला ने इस तरह नकल फ़रमाया है : “चुनांचे उन्होंने हमें तारीकियों में पुकारा तो हमने उनकी दुआ क़बूल कर ली, और हमने उनको उस घुटन से नजात दे दी (जो उनको मछली के पेट में हो रही थी। इसी तरह हम ईमानवारों को नजात देते हैं।”

(सूरा अंबिया, आयत 87-88 ) चुनांचे जब अल्लाह तआला ने उनको मछली के पेट से बाहर निकाला

तो उन्होंने शुकाने के तौर पर चार रकअत नमाज़ अदा की, और चार रकअतें इसलिए अदा फ़रमाई कि अल्लाह तआला ने उनको चार तारीकियों से नजात अता फरमाई थी एक मछली के पेट की तारीकी से दूसरे पानी की तारीकी से, तीसरे7 बादल की तारीकी से और चौथे रात की तारीकी से इन चारों तारीकियों से नजात के शुक्राने में अब के वक़्त हजरत यूनुस अलैहि० ने चार रकअत नमाज़ अदा फ़रमाई। अल्लाह तआला को ये चार रकअतें इतनी पसन्द आई कि हज़ूर अक़दस सल्ल० की उम्मत पर उनको फ़र्ज़ फ़रमा दिया।

सबसे पहले Magrib ki namaz किसने पढ़ी ?

  • सबसे पहले मगरिब की नमाज़ हज़रत दाऊद अलैहि० ने अदा की

मगरिब की तीन रकअतें सबसे पहले हज़रत दाऊद अलैहि० ने अदा फ़रमाई, अगरचे अंबिया अलैहि० से गुनाह सरज़द नहीं होते। वह गुनाहों से मासूम होते हैं। लेकिन बाज़ औक़ात कोई नामुनासिब काम या कोई लगज़िश, या कोई ख़िलाफ़े अदब काम भी उनसे जर्रा बराबर सरजद हो जाए तो उस पर भी उन्हें तंबीह की जाती है, और उनको तवज्जोह दिलाई जाती है और उनकी इस्लाह की जाती है। बहरहाल हज़रत दाऊद की किसी लगज़िश के बाद जब अल्लाह तआला ने उनकी बख्शिश का एलान फ़रमाया कि “फ़-सफ़रना लहू जाति-क” यानी हमने उनकी मगफिरत कर दी, तो उस वक़्त हजरत दाऊद अलैहि० ने उस बरिश के शुकाने में मगरिब के वक्त चार रकअत की नीयत बांधी। जब तीन रकअत अदा फ़रमा लीं तो उसके बाद आप पर अपनी लगज़िश के एहसास का ऐसा गलबा हुआ कि आप पर बेसाख्ता गिरया तारी हो गया। और ऐसा गिरया तारी हुआ कि उसकी शिद्दत की वजह से चौथी रकअत न पढ़ सके। चुनांचे तीन रकअत ही पर आपने इक्तफ़ा फ़रमाया (बज़लुल मज्हूद) और चौथी रकअत पढ़ने की हिम्मत न रही। ये तीन रकअत अल्लाह तआला को इतनी पसन्द आई कि हुजूर अकदस सल्ल० की उम्मत पर उनको मगरिब के वक्त फ़र्ज़ फ़रमा दिया।

सबसे पहले Isha ki namaz किसने पढ़ी ?

नमाज़े इशा की फ़र्जियत इशा के वक्त जो चार रकअत हम अदा करते हैं उसके बारे में दो क़ौल हैं। एक क़ौल यह है कि सबसे पहले हज़रत मूसा अलैहि० ने यह नमाज़ अदा की। जिस वक्त आप हज़रत शुऐब अलैहि० के पास दस साल क़याम करने के बाद अपने अहलो – अयाल के साथ मिस्र वापस लशरीफ़ ला रहे थे, आपके घर में से उम्मीद से थीं। विलादत का वक़्त क़रीब था और सफ़र भी ख़ासा तवील था। इस वजह से आपको बड़ी फ़िक्र लाहिक थी कि यह इतना लम्बा सफ़र कैसे पूरा होगा? दूसरे अपने भाई हजरत हारून अलैहि० की फ़िक थी, हज़रत तीसरे फ़िरऔन जो आपका जानी दुश्मन था, उसका ख़ौफ़ और उसकी तरफ़ से फिक्र लाहिक थी और चौथे होनेवाली औलाद की फिक्र लाहिक थी। इन चार परेशानियों के साथ आप सफ़र कर रहे थे। फिर सफ़र के दौरान सही रास्ते से भी हट गए जिसकी वजह से परेशानी में और इज़ाफ़ा हो गया इसी परेशानी के आलम में चलते-चलते आप कोहे तूर के क़रीब उसके मगरिबी और दाहनी जानिब पहुंच गए। रात अंधेरी, ठंडी और बरफानी थी अहलिया मोहतरमा को विलादत की तकलीफ़ शुरू हो गई, चक्रमाक़ पत्थर से आग न निकली इसी हैरानी व परेशानी के आलम में देखा कि कोहे तूर पर आग जल रही है। आपने अपने घरवालों से कहा कि आप यहां ठहरें में कोहे तूर से आग का कोई शोला लेकर आता हूं। जब कोहे तूर पर पहुंचे तो अल्लाह तआला से हमकलामी का शर्फ़ हासिल हुआ। आपको बतौर ख़ास हमकलामी की नेमत से नवाज़ा गया। अल्लाह तआला ने फ़रमाया :

“फिर जब वह आग के पास पहुंचे तो उनको मिन जानिबिल्लाह आवाज़ दी गई कि ऐ मूसा मैं तुम्हारा रब हूं, आप अपने जूते उतार दें। इसलिए कि आप मुक़द्दस वादी तुवा में हैं और मैंने आपको अपनी रिसालत के लिए तय कर लिया है। लिहाजा जो वाही आपकी तरफ़ भेजी जा रही है। उसको गौर से सुनें।” (कुरआन, 9/11-13)

बहरहाल, जब अल्लाह तआला की जानिब से यह इनाम हासिल हुआ तो आपकी चार परेशानियों का खात्मा हो गया। किसी ने बड़ा अच्छा शेर कहा है :

तू मिले तो कोई मर्ज़ नहीं न मिले तो कोई दवा नहीं

इस मौके पर इशा के वक़्त हजरत मूसा अलैहि० ने इन चार परेशानियों से नजात के शुक्राने में चार रकअत नमाज़ अदा फ़रमाई। यह चार रकअत अल्लाह तआला को इतनी पसन्द आईं कि हुज़ूर अक़दस सल्ल० की उम्मत पर उनको फ़र्ज़ कर दिया। (इनाया) दूसरी रिवायत यह है कि इशा की नमाज सबसे पहले जनाब मुहम्मद

रसूलुल्लाह सल्ल० ने अदा फ़रमाई (बज़लुल मज्हूद) इसलिए यह नमाज़ बहुत अहम अमल है। 

(नमाज़ की बाज़ कोताहियां, अज़ मौलाना मुफ्ती अब्दुर्र ऊफ़ सखरबी)

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