क़ियामत की तारीख़ ky hai? Maidan-e-Hashr | सूर और सूर का फूंका जाना | Dawat-e-Tabligh

पूछा कि क़ियामत कब कायम होगी, तो उनके इस सवाल के जवाब में प्यारे नबी ने इर्शाद फ़रमाया कि—

क़ियामत की तारीख़ ky hai? Maidan-e-Hashr | सूर और सूर का फूंका जाना | Dawat-e-Tabligh
क़ियामत की तारीख़ ky hai? Maidan-e-Hashr | सूर और सूर का फूंका जाना | Dawat-e-Tabligh

परिचय

क़ियामत की निशानियां इस नाचीज़ ने एक किताब में जमा कर दी हैं जो ‘रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पेशीनगोइयां’ के नाम से छप चुकी हैं इसलिए कियामत की निशानियों को उसी में पढ़ लें। अब उन लोगों का मुख़्तसर हाल लिखकर जिन पर कियामत कायम होगी, कियामत के हालात लिखना शुरू करता हूँ ।

वल्लाहु वलीयुत्तौफीक व हु व ख़ैरु औनिॐ व ख़ैरु र्रफ़ीक़ ।

कियामत किन लोगों पर कायम होगी ?

हज़रत अब्दुल्लाह बिन मस्ज़द से रिवायत है कि हज़रत रसूले करीम ने इर्शाद फ़रमाया कि क़ियामत सबसे बुरी मख़्लूक पर कायम होगी। यह भी इर्शाद फ़रमाया कि उस वक्त तक क़ियामत कायम न होगी जब तक ज़मीन में अल्लाह- अल्लाह किया जाता रहेगा। यह भी इर्शाद फ़रमाया कि क़ियामत किसी ऐसे शख़्स पर कायम न होगी जो अल्लाह-अल्लाह कहता होगा ।’

कियामत kab कायम hogi?

एक लम्बी हदीस में है कि (चूंकि किसी मुसलमान की मौजूदगी में क़ियामत कायम न होगी। इसलिए दुनिया के इसी दिन व रात के होते हुए) अचानक अल्लाह तआला एक उम्दा हवा भेज देंगे जो मुसलमानों की बगलों में लगकर हर मोमिन और मुस्लिम की रूह क़ब्ज़ कर लेगी और सबसे बुरे लोग बाक़ी रह जाएंगे जो (सबके सामने बेहयाई से) गधों की तरह औरतों से ज़िना करेंगे।”

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर से रिवायत है कि प्यारे नबी ने इर्शाद फरमाया कि दज्जाल को क़त्ल करने के बाद हज़रत ईसा सात वर्ष लोगों में रहेंगे। इस दौर में दो आदमियों के बीच ज़रा दुश्मनी न होगी। फिर अल्लाह तआला मुल्क शाम की तरफ से एक ठंढी हवा भेज देंगे, जिसकी वजह से तमाम मोमिन ख़त्म हो जाएंगे (और) ज़मीन पर कोई भी ऐसा शख्स बाकी न रहेगा, जिसके दिल में ख़ैर का (या फ़रमाया ईमान का) कोई ज़र्रा होगा। यहां तक कि अगर तुम (मुसलमानों में से) कोई शख़्स किसी पहाड़ के अन्दर (खोह में) दाख़िल हो जाएगा, तो वह हवा वहां भी दाख़िल होकर उसकी रूह कुब्ज़ कर लेगी।

इसके बाद सबसे बुरे लोग रह जाएंगे (जो बुरे करतूतों और शरारत ‘ की तरफ बढ़ने में) हल्के परिंदों की तरह (तेज़ी से उड़ने वाले) होंगे और ( दूसरों का खून बहाने और जान लेने में) दरिंदों-जैसे अख़्लाक़ वाले होंगे। न भलाई को पहचानते होंगे, न बुराई को बुराई समझते होंगे। उनका यह हाल देखकर इंसानी शक्लों में शैतान उनके पास आकर कहेगा कि (अफ़सोस ! तुम कैसे हो गये) तुम्हें शर्म नहीं आती (कि अपने बाप-दादों को छोड़ बैठे)। वे उससे कहेंगे कि तू ही बता हम क्या करें? इसलिए वे उनको बुतपरस्ती को तालीम देगा (और वे बुत की पूजा करने लगेंगे) वे इसी हाल में होंगे (यानी क़त्ल व ख़ून, बिगाड़ – फ़साद और बुत परस्ती में पड़े होंगे) और उनको खूब रोज़ी मिल रही होगी और अच्छी जिंदगी गुज़र रही होगी कि सूर फूंक दिया जाएगा। सूर की आवाज़ सब ही सुनेंगे। जो-जो सुनता जाएगा ( डर की वजह से, हैरान होकर) एक तरफ़ को गरदन झुका देगा और दूसरी तरफ़ को उठा देगा।

फिर फरमाया कि सबसे पहले जो शख़्स उसकी आवाज़ सुनेगा, वह वह होगा जो ऊटों को पानी पिलाने का हौज़ लीप रहा होगा। वह शख़्स सूर की आवाज़ सुनकर बेहोश हो जाएगा और फिर सब लोग बेहोश हो जाएंगे। फिर खुदा एक बारिश भेजेगा जो ओस की तरह होगी, उससे आदमी उग जाएंगे (यानी कब्रों में मिट्टी के जिस्म बन जाएंगे)। फिर दोबारा सूर फूंका जाएगा तो अचानक सब खड़े देखते होंगे। इसके बाद एलान होगा कि ऐ लोगो ! चलो अपने रब की तरफ़ और फ़रिश्तों को हुक्म होगा कि इनको ठहराओ । इनसे सवाल होगा। फिर एलान होगा कि (इस सारे मज्मे से ) दोजखियों को अलग कर दो। इसपर पूछा जाएगा (अल्लाह जल्ल ल शानुहू से) कि किस तादाद में से कितने दोज़ख़ी निकाले जाएं, जवाब मिलेगा कि हर हज़ार में 999 दोज़ख़ी निकालो। इसके बाद आंहज़रत सैयदे आलम ने फ़रमाया कि यह दिन होगा कि जिसके डर और दहशत से, बच्चे बूढ़े हो जाएंगे और यह दिन बड़ा ही मुसीबत का होगा।’

इन हदीसों से मालूम हुआ कि कियामत कायम होने के वक्त कोई मुसलमान दुनिया में मौजूद न होगा। इस बड़ी मुसीबत से अल्लाह तआला इन इंसानों को बचाये रखेंगे, जिनके दिल में ज़रा भी ईमान होगा ।

क़ियामत की तारीख़ ky hai?

क़ियामत की तारीख़ की ख़बर नहीं दी गई

अल्लाह तआला ही जानते हैं कि क़ियामत कब आयेगी। कुरआन शरीफ में बताया गया है कि क़ियामत अचानक आ जाएगी। बाकी उसकी मुकर्ररा तारीख़ की ख़बर नहीं दी गई। एक बार हज़रत जिब्रील ने इंसानी शक्ल में आकर मज्लिस में हाज़िर लोगों की मौजूदगी में प्यारे नबी से पूछा कि क़ियामत कब कायम होगी, तो उनके इस सवाल के जवाब में प्यारे नबी ने इर्शाद फ़रमाया कि—

मल मस्ऊलु अन्हा बि अञ्लम मिनस्साइल ।
-बुखारी व मुस्लिम

‘इस बारे में सवाल करने वाले से ज़्यादा उसको इल्म नहीं है जिस से सवाल किया गया है।’

यानी इस बारे में हम और तुम दोनों बराबर हैं। न मुझे उसके कायम होने के वक्त का इल्म है और न तुमको है। एक बार जब लोगों ने प्यारे नवी से पूछा कि क़ियामत कब आयेगी तो अल्लाह तआला शाहू की तरफ से हुक्म हुआ:

कुल इन्नमा इल्मुहा इन द रब्बी ला युजल्लीहा लिवक्कतिहा इल्ला हू । सकुलत फिस्समावाति वलुअर्जि ला तअतीकुम इल्ला बग्तः । यस्अलून क क अन्न न क हफीय्युन अन्हा कुल इन्नमा इल्मुहा इन्दल्लाहि व ला किन्न न अक्सरन्नासि ला यअलमून ।                                                 -अल-आयफ

‘आप फरमा दीजिए कि इसका इल्म सिर्फ मेरे रब ही के पास है। उसके वक़्त पर उसको सिवाए अल्लाह तआला के कोई ज़ाहिर न करेगा। आसमान व ज़मीन में बड़ी भारी घटना होगी। वह तुम पर बिल्कुल ही अचानक आ पड़ेगी। वे आपसे इस तरह पूछते हैं जैसे गोया आप उसकी खोज कर चुके हैं। आप फ़रमा दीजिए कि उसका इल्म सिर्फ अल्लाह के पास है, लेकिन अक्सर लोग नहीं जानते।’


ky क़ियामत अचानक आ जाएगी ?

सूरः अंबिया में फ़रमायाः

बल ततीहिम बग्ततन फुतबअतुहुम फु ला यस्ततीऊ न रद्दहा व ला हुम युन्ज़रून ।

‘बल्कि वह आ जाएगी अचानक उनपर और उनको बदहवास कर देगी। न उसके हटाने की उसको क़ुदरत होगी और न उनको मोहलत दी जाएगी।’

इस मुबारक आयत से और इससे पहली आयत से मालूम हुआ कि क़ियामत अचानक आ जाएगी। हज़रत रसूले करीम ने इर्शाद फरमाया कि अलबत्ता क़ियामत ज़रूर इस हालत में कायम होगी कि दो आदमियों ने अपने दर्मियान (ख़रीदने-बेचने के लिए) कपड़ा खोल रखा होगा और अभी मामला तय करने और कपड़ा लपेटने भी न पायेंगे कि क़ियामत कायम होगी। एक इंसान अपनी ऊंटनी का दूध निकाल कर जा रहा होगा कि पी भी न सकेगा और क़ियामत यक़ीनन इस हाल में कायम होगी कि इंसान अपना हौज़ लीप रहा होगा और अभी उसमें (मवेशियों को) पानी भी न पिलाने पायेगा और वाकई कियामत इस हाल में कायम होगी कि इंसान अपने मुंह की तरफ लुक्मा उठायेगा और उसे खा भी न सकेगा।’

यानी जैसे आजकल लोग कारोबार में लगे हुए हैं, उसी तरह क़ियामत के आने वाले दिन भी लगे होंगे कि अचानक क़ियामत आ पहुंचेगी। जिस दिन क़ियामत कायम होगी, वह जुमे का दिन होगा। प्यारे नबी ने इर्शाद फ़रमाया कि सब दिनों से बेहतर जुमा का दिन है। उसी दिन वह जन्नत से निकाले गये और क़ियामत जुमा ही के दिन कायम होगी।

दूसरी हदीस में है कि आंहज़रत सैयदे आलम ने फरमाया कि जुमा के दिन कियामत कायम होगी। हर क़रीबी फ़रिश्ता और आसमान और ज़मीन और पहाड़ और समुद्र, ये सब जुमा के दिन से डरते हैं कि कहीं आज कियामत न हो जाए।’

सूर और सूर का फूंका जाना

क़ियामत की शुरूआत सूर फूंकने से होगी। प्यारे नबी ने इर्शाद फरमाया कि सूर एक सींग है, जिसमें फूंका जाएगा।’ और यह भी इर्शाद फ़रमाया कि मैं मज़े की जिंदगी क्यों कर गुज़ारूंगा, हालांकि सूर फूकने वाले (फरिश्ते) ने मुंह में सूर ले रखा है और अपना कान लगा रखा है और माथा झुका रखा है। इस इंतिज़ार में कि कब सूर फूंकने का हुक्म हो। सूरः मुद्दस्सिर में सूर को नाक्रूर फ़रमाया है। चुनांचे इर्शाद है :

फ इज़ा नुकि र फिन्नाक्क्रूरि फु जालि क यौ म इज़िय्यौमुन असीरून अललकाफिरी न गैरु यसीर । 

‘फिर जब नाक्रूर (यानि सूर) फूंका जायेगा तो वह काफिरों पर एक सख़्त दिन होगा जिसमें कुछ आसानी न होगी।’

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1. बुखारी व मुस्लिम

यह जो मशहूर है कि क्रियामत मुहर्रम की दसवीं तारीख को कायम होगी, किसी हदीस से साबित नहीं है। मुजम्मञ्जूउल बहार में इसको मौजूजू यानी गढ़ी हुई बातों में गिना गया है।

2. मुस्लिम शरीफ 

3. मिश्कात शरीफ

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सूरः जुमर में इर्शाद फ़रमाया :

व नुफि ख फिस्सूरि फ स इक मन फिस्समावाति व मन फिल अर्ज़ि इल्ला मन शाअल्लाह। सुम्म म नुफि ख़ फीहि उख़्ा फ़ इज़ा हुम किया-मुय्यन्जुरून ।

‘और सूर में फूंका जाएगा। सो बेहोश हो जाएंगे। जो भी आसमानों और ज़मीन में है सिवाए उनके जिनका होश में रहना अल्लाह चाहें। फिर दोबारा सूर में फूंका जाएगा तो वह फौरन खड़े हो जाएंगे, हर तरफ़ देखते हुए।’

क़ुरआनी आयतों और नबी की हदीसों में दो बार सूर फूंके जाने का ज़िक्र है। पहली बार सूर फूंका जाएगा तो सब बेहोश हो जाएंगे ( इल्ला मन शाअल्लाह) फिर जिंदे तो मर जाएंगे और जो मर चुके थे उनकी रूहों पर बेहोशी की हालत पैदा हो जाएगी। इसके बाद दोबारा सूर फूंका जाएगा तो मुर्दों की रूहें उनके बदनों में वापस आ जाएंगी और जो बेहोश थे उनकी बेहोशी चली जाएगी। उस वक्त का अजीब व गरीब हाल देखकर सब हैरत से तकते होंगे और अल्लाह के दरबार में पेशी के लिए तेज़ी के साथ हाज़िर किए जाएंगे। सूरः यासीन में फ़रमाया :

व नुफि ख़ फिस्सूरि फ इज़ाहुम मिनल अज्दासि इला रब्बिहिम यन्सिलून । कालू यावैलना मम व अस ना मिम मदिना, हाज़ा मा व अ दर्रहमान व स द कलमुर्सलून । इन कानत् इल्ला महतौं वा हिदतन फ इजा हुम जमीउल्लदैना मुहज़रून ।

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1. मिश्कात शरीफ

2. मिश्कात शरीफ

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‘और सूर में फूंका जाएगा। बस अचानक वह अपने रब की तरफ जल्दी-जल्दी फैल पड़ेंगे। कहेंगे कि हाय! हमारी ख़राबी! किसने हमको उठा दिया, हमारे लेटने की जगह से। (जवाब मिलेगा कि) यह वह माजरा है। जिसका रहमान ने वादा किया है और पैग़म्बरों ने सच्ची ख़बर दी। बस एक चिंघाड़ होगी। फिर उसी वक्त वे सब हमारे सामने हाजिर कर दिए जाएंगे।’

यानी कोई न छिप कर जा सकेगा। सब अल्लाह के हुज़ूर में मौजूद कर दिए जाएंगे।

हज़रत अबू हुरैरः ने फरमाया कि प्यारे नबी ने पहली बार और दूसरी बार सूर फूंकने की दर्मियानी दूरी बताते हुए चालीस का अदद फ़रमाया। मौजूद लोगों ने हज़रत अबू हुरैरः से पूछा कि चालीस क्या ? चालीस दिन या चालीस माह या चालीस साल । आहज़रत ने क्या फ़रमाया? इस सवाल के जवाब में हज़रत अबू हुरैरः ने अपनी ला-इल्मी ज़ाहिर की और फरमाया कि मुझे ख़बर नहीं ( या याद नहीं) कि आंहज़रत ने सिर्फ चालीस फ़रमाया या चालीस साल या चालीस दिन फरमाया दोबारा सूर फूंके जाने के बाद अल्लाह तबारक व तआला आसमान से पानी बरसा देंगे, जिसकी वजह से लोग (कुब्रों से) उग जाएंगे जैसे (ज़मीन से) सब्ज़ी (उग जाती है)। यह भी फ़रमाया कि इंसान के जिस्म की हर चीज़ गल जाती है यानी मिट्टी में मिलकर मिट्टी हो जाती है सिवाए एक हड्डी के कि वह बाकी है। क़ियामत के दिन उसी से जिस्म बना दिए जाएंगे। यह हड्डी रीढ़ की हड्डी है।’

सूरः जुमर की आयत में यह जो फ़रमाया कि सूर फूंके जाने से सब

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1. बुखारी व मुस्लिम की एक हदीस में है कि राई के दाने के बराबर रीढ़ की हड्डी बाकी रह जाती है, उसी से दोबारा जिस्म बनेंगे।

– अत्तर्गीय वत्तहींब

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बेहोश हो जाएंगे, सिवाए उनके जिनको अल्लाह चाहे। इसके बारे में तफसीर लिखने वालों के कुछ क़ौल हैं, किसी ने फ़रमाया कि शहीद मुराद हैं। किसी ने कहा कि जिब्रील व मीकाईल और इस्राफील व इज्माईल के बारे में फ़रमाया है। किसी ने अर्श उठाने वालों को इस छूट में शामिल किया है। इनके अलावा और भी कौल हैं (अल्लाह ही बेहतर जानता है)। मुम्किन है कि बाद में इन पर भी फिना छा जाए, जिसे इस छूट में ब्यान किया जाता है। जैसा कि आयत ‘लि मनिल मुल्कल यौम । लिल्लाहिल वाहिदिल कहार’ की तफ़सीर में साहिबे मआलिमुल तंजील लिखते हैं कि जब मख़्लूक के फ़िना हो जाने के बाद अल्लाह तआला ‘लि मनिल मुल्कुल यौम’ (किस का राज है आज ?) फ़रमायेंगे, तो कोई जवाब देने वाला न होगा। इसलिए खुद ही जवाब में फ़रमायेंगेः ‘लिल्लाहिल वाहिदिल कहार’ (आज बस अल्लाह का राज है जो तहा है और कहहार’ है)

यानी आज के दिन बस उसी एक हकीकी बादशाह का राज है। जिसके सामने हर ताक्त दबी हुई है। तमाम दुनिया की हुकूमतें और राज इस वक्त फिना हैं।

हज़रत अबू हुरैरः रिवायत फ़रमाते हैं कि आहज़रत सैयदे आलम 28 ने फरमाया कि बेशक लोग क़ियामत के दिन बेहोश हो जाएंगे और मैं भी उनके साथ बेहोश हो जाऊंगा। फिर सबसे पहले मेरी ही बेहोशी दूर होगी तो अचानक देखूंगा कि मूसा अर्शे इलाही को एक तरफ पकड़े खड़े हैं। मैं नहीं जानता कि वह बेहोश होकर मुझ से पहले होश में आ चुके होंगे या उनपर बेहोशी आयी। न होगी और वे उनमें से होंगे जिनके बारे में अल्लाह का इर्शाद है ‘इल्ला मन शाअल्लाह’   है ।

-मिश्कात शरीफ

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