Real कामयाबी kisme hai? |Hazratji Molana Yousuf Bayan in Hindi| Dawat-e-Tabligh

मरने से पहले-पहले इस बात को दिल में उतार ले कि हुजूर सल्ल० के तरीक़े में इस्तेमाल होने में कामयाबी है और मुल्क व माल के चीथड़ों में कोई कामयाबी नहीं, इसको अपने पे खोल ले। मरने से पहले-पहले तेरे दिल पे खुल जाए, 


रईसुत्तब्लीग़ हजरत मौलाना मुहम्मद यूसुफ़ नव्वरल्लाहु मरदहू ने यह तकरीर दिल पज़ीर अपनी वफ़ात से एक हफ्ता पहले गुजरानवाला में जुमा की नमाज़ से पहले फ़रमाई थी, गोया यह आपकी जिंदगी का आखिरी जुमा था, जिसमें आपने यह तकरीर फ़रमाई। इससे अगले जुमा यानी 2 अप्रैल 1965 ई० को लाहौर बिलाल पार्क में आपका विसाल हो गया और आप हम सबको सोगवार छोड़कर अपने ख़ालिक हक़ीकी से जा मिले। इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन०

मुरत्तिव : मीर अब्दुल हलीम, गुजरानवाला

real कामयाबी kisme hai?
real कामयाबी kisme hai?

Allah के रास्ते(Tabligh, Jamaat) की क़ीमत(Value)- Hazratji Yousuf

मेरे भाइयो और दोस्तो!

इंसान को अल्लाह ने थोड़े दिनों के लिए इस दुनिया में भेजा है और मेहनत की दौलत देकर भेजा है और इसलिए भेजा है कि अपनी मेहनत को अपने ऊपर खर्च करके क़ीमती बना ले। अगर उसने अपनी मेहनत को अपने ऊपर खर्च करके अपने को क़ीमती बना लिया, तो हक़ तआला शानुहू दुनिया में भी रहमतों की बारिश बरसाएंगे, इनामों की बारिश बरसाएंगे, कामयाबियों के दरवाज़े खोलेंगे और जब यह मर जाएगा तो उसकी क़ीमत के एतबार से जितना उसने अपने क़ीमती बनने में मेहनत की होगी और जितना अपनी ज्ञात को क़ीमती बना लिया होगा, उसके लिहाज़ से उसे जन्नत के दर्जे अता फरमाएंगे। सातों जमीन व आसमान से दस गुने से ज्यादा से लेकर लाखों और करोड़ों गुना तक एक इंसान को मिलेगा, उसकी अपनी क्रीमत के एतवार से उसके अन्दर क्या क़ीमत है।

दुनिया की मेहनत- Hazratji Yousuf

अब मेरे अजीज दोस्तो! यह जो इंसान की मेहनत है, यह दोजखी है। इस मेहनत से दोजख़ पे बनता है। बाहर चीज़ों की शक्लें बनती है। इंसानों की मेहनत से, सड़कों की शक्ल, मोटरों की शक्ल, सवारियों की शक्ल, ग़िज्ञाओं की शक्ल, हलवों की शक्ल, खाने-पीने की चीजों की शक्ल, सवारियों की शक्ल, मकान की शक्ल, तमाम चीज़ों की शक्लें तो बनती हैं, इंसान की बाहर और यक़ीन की शक्लें बनती हैं नीयत की बनती हैं इंसान के अन्दर, इल्म और जहल की शक्लें बनती हैं इंसान के अन्दर, ग़फ़लत और ज़िक्र बनता है, इंसान के अन्दर, अख़लाक़ और बद-अखलाक़ी का नूर और जुलमत बनता है इंसान के अन्दर, तो इंसान की मेहनत से जिस तरह बाहर चीजों की शक्लें बनती हैं, उसी तरह अन्दर में ईमान की, यक़ीन की, अखलाक़ की, मुहब्बत की, अदावत की शक्लें बनती हैं। मेहनत करते-करते किसी से मुहब्बत करने वाला बनता है, किसी से अदावत करने वाला बनता है, मेहनत करते-करते किसी पर एतमाद करने वाला बनता है, किसी पर एतमाद न करने वाला बनता है।

मेहनत करते-करते, किसी पर यकीन करने वाला बनता है, किसी पर यक़ीन न करने वाला बनता है, तो मेहनत से चीज़ों की शक्लें तो बनेंगी बाहर और यक्रीन की, नीयत की, इल्म की, ध्यान की, मुहब्बत की, अदावत की, एतमाद की, भरोसे की, ये शक्लें इंसान के अन्दर बनेंगी। जो बाहर बन रही हैं शक्लें, चाहे वह वज़ीरों के हाथ में हों शक्लें, चाहे वे सदरों के हाथ में हों शक्लें, चाहे वे गवर्नरों के हाथ में हों, चाहे वे उन सरमायादारों के हाथों में शक्लें हों, चाहे वे मजदूरों के हाथों में शक्लें हों। शक्लों को इंसान हर जगह मुंतक़िल नहीं करता और इन चीजों की शक्लें इंसान के साथ हर जगह मुंतक़िल नहीं होतीं।

आप लाहौर जाएंगे, तो आपने बीस, तीस, चालीस पचास साल की मेहनत से जितनी दुकान की शक्ल बनाई है और कोठी की शक्ल बनाई है या बाग़ीचे की शक्ल बनाई है या ऐश की शक्लें बनाई हैं, वे आपके साथ लाहौर नहीं जाएंगी, कराची नहीं जाएंगी, मुलतान नहीं जाएंगी। जो बाहर का बना हुआ है, वह यहीं छोड़कर जाओगे। कुछ पैसे ले जाओगे, कुछ नकदी ले जाओगे, कुछ ले जाओगे, अक्सर बाहर का बना हुआ छोड़ जाओगे, सड़कें यहीं छोड़ जाओगे, पुल यहीं छोड़ जाओगे और जब इस मुल्क से दूसरे मुल्क में जाओगे, तो नकदी भी छोड़ के जानी पड़ेगी, सारी नकदी भी साथ नहीं ले जा सकते। जितना पैसा बना हुआ है सब यहीं छोड़ जाओगे, जितना हुकूमत तुम्हें इजाज़त देगी, उतना ले जा सकोगे, दूसरे मुल्क में सारा बना हुआ उसकी शक्ल में नहीं ले जा सकोगे।

और फिर इस दुनिया से जब आख़िरत की तरफ़ जाएंगे, तो बाहर का जितना बना हुआ है, वह सौ फ़ीसद यहां छोड़ के जाना पड़ेगा, बदन के कपड़े तक छोड़ के जाने पड़ेंगे, यह ऐनक तक छोड़ के जानी पड़ेगी, जिसके बगैर हमारा गुजारा नहीं होता, घड़ियां छोड़ के जानी पड़ेंगी, ये जूते छोड़ के जाने पड़ेंगे, तो बाहर का जितना बना हुआ है, तो यह दुनिया में किसी ने कहीं साथ छोड़ा, किसी ने कहीं साथ छोड़ा। आख़िरी चीजें जो साथ छोड़ेंगी वे उस वक्त साथ छोड़ेंगी, जब यह रूह जिस्म से निकल कर ख़ुदा की तरफ़ चलेगी। उस वक़्त जो कुछ था, यह दुनिया का बाहर का बना हुआ, वह सारे का सारा यहीं का यहीं रह जाएगा।

आख़िरत की मेहनत- Hazratji Yousuf

लेकिन मेरे प्यारे दोस्तो! जो इंसान के अन्दर बनता है, इंसान उसे चौबीस घंटे, जहां जाता है, अपने साथ लेकर जाता है। पाख़ानों में जाओगे, तो जो कुछ अन्दर का बना हुआ है, साथ ले के जाओगे, दस्तरख्वान पर बैठोगे, तो जो कुछ अन्दर का बना हुआ है, साथ ले के बैठोगे, चारपाई पर सोने के लिए जाओगे, चारपाई पर लेटोगे, तो अन्दर का जो कुछ बना हुआ है, साथ ले के लेटोगे, अगर लाहौर जाओगे, अन्दर का बना हुआ सारा लेकर जाओगे, कराची जाओगे, सारा ले के जाओगे, दुनिया के किसी मुल्क में जाओगे, अन्दर का सारा ले के जाओगे, जो यक्क़ीन अन्दर में बना हुआ साथ जाएगा और जो मुहब्बत अन्दर में बनी हुई साथ जाएगी, जो अदावत अन्दर में बनी हुई साथ जाएगी, जो इल्म अन्दर में बना हुआ साथ जाएगा, जो ध्यान अन्दर में बना हुआ साथ जाएगा, जो एतमाद और भरोसा अन्दर में बना हुआ साथ जाएगा, तो अन्दर का बना हुआ हर वक़्त साथ चलता है और बाहर का बना हुआ हर वक्त साथ नहीं चलता, यहां तक कि जब दुनिया से आख़िरत की तरफ इंसान मुंतक़िल होगा, तो अन्दर के बने हुए को सौ फ़ीसद साथ ले जाएगा। अब अगर वह बना जो क़ीमती है, तो यह जहां जाता है, कामयाब होता है और अगर अन्दर में वह बना जो वे-क़ीमत है, तो जहां जाता है, नाकाम होता है। 

वह अख़्लाक़ बना, जिसमें इज्ज़त मिलती है, वह यक्क्रीन बना, जिसमें बुलन्दी मिलती है, वह मुहब्बत बना, जिस पर इनाम मिलते हैं, वह एतमाद बना, जिस पर मदद के दरवाज़े खुलते हैं, वह इल्म बना, जिस इल्म पर ख़ुदा चमकाता है, वह ध्यान बना, जिस ध्यान पर ख़ुदा कामयाब करता है, तो अगर अन्दर में वह बना, जिसके बनने के लिए ख़ुदा ने दुनिया में भेजा और जिसके बनने के लिए ख़ुदा ने मेहनत की दौलत अता फ़रमाई, तो मेहनत करके अन्दर में अगर वह बन गया, तो दुनिया के जिस इलाक़े में चाहे फिरे, जिस मुल्क में जाए और जिस सड़क पर चाहे निकल जाए और जिस सवारी पर चाहे, सवार हो जाए, चाहे गधे पर सवार हो के निकले, चाहे मोटर पर सवार होकर निकले, चाहे पैदल निकले, चाहे सवारी में निकले, चाहे झोंपड़ों पर लेटे, चाहे कोठियों में लेटे, चाहे चटनी-रोटी खाता हुआ निकले, लाखों के खाने खाता हुआ निकले, अन्दर का बना हुआ अगर वह है, जिस पर ख़ुदा कामयाब करते हैं और जो क़ीमती है तो फिर जिस लाइन को निकलोगे, जिस शक्ल से गुजरोगे, कामयाब हो जाओगे और ख़ुदा-न-ख्वास्ता वह बन गया, जो बे-क़ीमत है, वह यक़ीन बना जिस पर ख़ुदा पकड़ करते हैं, 

वह मुहब्बत बना, जिस पर ख़ुदा मुसीबतें डालते हैं और वह एतमाद बना, जिस पर ख़ुदा जिंदगी बिगाड़ते हैं और वह इल्म बना जिसको ख़ुदा जहल क़रार देते हैं, वह ध्यान बना, जिसको अल्लाह ग़फ़लत कहते हैं, तो अगर अन्दर में वह बना, जिसके बनने पर ख़ुदा नाकाम किया करते हैं, तो दुनिया में इंसान जहां को भी निकलेग, चाहे सवारियों पर निकले, चाहे कारों में निकले, चाहे हवाई जहाजों में निकले, जलील होगा, ख़ौफ़ज़दा होगा, ग़ैर-मुतमइन होगा, परेशानहाल होगा। दुनिया में चाहे जिन शक्लों मे कोई निकले, कामयाबी नसीब नहीं होगी, शक्लें बनी हुई मिल जाएंगी, लेकिन इज्ज़त नहीं मिलेगी और जब मरेगा तो अन्दर का बना ख़ुदा हर एक को दिखाएंगे कि तेरे में क्या बना,

‘अन्दर का बना हुआ दिखा देंगे।’ साहबजादे! यह यक्रीन बना के लाए हो। यह तो दोज़ख़ वाला यक़ीन है, जन्नत में नहीं ले जाता, यह मुहब्बत तो दोजख में ले जाती है। यह तो दुनिया की मुहब्बत है, यह तो दोजख में ले जाती है। यह नहीं ले जाती जन्नत में कहां है वह अल्लाह की मुहब्बत, वह किस कोने में रखी है? लाओ, लाकर दिखाओ। लाओ वह रसूलुल्लाह सल्ल० की मुहब्बत निकाल कर दिखाओ। वह मुहब्बत जिस पर आदमी जान व माल, मां-बाप, औलाद तक कुर्बान कर दे। कहां है वह मुहब्बत? यह दिल में दिखाओ कि मुहब्बत की जगह दिल है, जुबान मुहब्बत की जगह नहीं। जुवान मुहब्बत की जगह है ही नहीं। यह तो जुबान पर है, इसको रसूलुल्लाह सल्ल० की मुहब्बत का इज़हार कहते हैं और इज़हार की जगह जुवान है। मुहब्बत की जगह जुबान नहीं, इज़्हार की जगह जुबान है।

ज़ुबान और दिल का बोल- Hazratji Yousuf

ईमान की जगह जुबान नहीं है, ज़ुबान इज़हार की जगह है। ईमान को ज़ाहिर करती है, यह जुबान ईमान की जगह नहीं है। ईमान की जगह तो दिल है, मुहब्बत की जगह तो दिल है, एतमाद की जगह तो दिल है, जुबान खाइन (खियानत करने वाली) रहती है और ऐसी मुनाफ़िक़ है यह ज़ुबान कि जो दिल में हो, उसे बोल पड़े और उसके ख़िलाफ़ भी बोल पड़े। कोई आदमी आया, अब आपको बहुत गुस्सा आया कि बे-मौक़े आ गया। रोटी खा के सोते में तो बेगम को बुला रखा है, उस वक़्त और बे-मौक़ा आ के बैठ गया और खूब तबियत में नागवारी है और जुबान से क्या कह रहे हैं, आपके आने से बड़ी मुसर्रत हुई, तो जुबान ने वह नहीं बोला, जो दिल में है, उसके ख़िलाफ़ बोला, तो ज़ुबान वह भी बोलती है जो दिल में है और जुबान वह भी बोलती है, जो दिल में नहीं है। इंसान जुबान से धोखा खा जाता है, कल को क़ियामत में जुबान से वही निकलेगा जो दिल में है और ज़ुबान वह भी बोलती है, जो दिल में नहीं होगा, वह जुबान पर नहीं आएगा।

Quran पर अमल- Hazratji Yousuf

इसीलिए लिखा है तहक़ीक़ करने वाले उलेमा ने, तफ़्सीर लिखने वालों ने कि यहां दुनिया में कोई कितना ही क़ुरआन हिफ़्ज़ कर ले और सारा पढ़ ले और ऐसा याद हो कि बे-झिझके, बे-अटके सारा कुरआन पढ़ जाए, लेकिन कल को क्रियामत में जब कुरआन पढ़ने का वक्त आएगा कि पढ़, और जन्नत के दर्जी पर चढ़, चढ़ता चला जा, पढ़ता चला जा, तो इस तरह फ़रमाया कि जितना कुरआन पर अमल होगा, जुबान पर उतना ही आएगा, अमल में नहीं होगा तो कुरआन पढ़ा नहीं जाएगा। दुनिया वाली बात नहीं है, अमल कुछ और कुरआन पढ़ रहे हैं, दिल में कुछ और जुबान पर बोल रहे हैं, वहां तो जो अमल होगा, वह जुबान बोलेगी, जो यक़ीन होगा, वह जुबान बोलेगी।

Duniya मेहनत कि जगह है- Hazratji Yousuf

इसलिए मेरे अज़ीज़ो और दोस्तो! अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने मेहनत की दौलत अता फ़रमाई और मस्जिद के अन्दर आवाज लगवाई कि देखो, अपने-अपने नक्शों से निकल कर आओ वक़्त तुम्हारे पास मौजूद है, आंख बन्द हो जाएगी, तो वक़्त जाता रहेगा मेहनत करने का। उस वक़्त अगर मेहनत कर ली तो तुम अन्दर की बुनियादों को ठीक कर लोगे। अब अगर तुमने वक़्त पर मेहनत खर्च की तो मौत के वक़्त यह हरकत ख़त्म हो जाएगी। मरने के बाद यह ख़त्म हो जाएगी। कुरआन में है, वे यों कहेंगे कि अल्लाह! हमने देख लिया –

 ‘ऐ रब! देख लिया, सुन लिया, सब हमारी समझ में आ गया। अब आप दुनिया में वापस भेजिए हम अच्छे अमल करके आएंगे।”

तो गोया आख़िरत अमल करने की जगह नहीं, अमल की जगह नहीं है आख़िरत, जैसे यह मां का पेट, यह कमाई की जगह नहीं, कमाने की जगह दुनिया है। मां का पेट है ही नहीं कमाने की, खाने की, हलवों की जगह और गुलाब जामुन की जगह और चाय पीने की जगह, वह है ही नहीं। तो अमल पर मेहनत का मैदान यह दुनिया है। अब आदमी मर जाएगा, तो आख़िरत में अमल का मैदान नहीं रहेगा, मेहनत का मैदान ख़त्म हो जाएगा। आज जैसे बनेंगे, वैसा दर्जा क़ायम हो जाएगा। ख़राब बन गए तो दोज़ख़, अच्छे बन गए तो जन्नत। जिस शक्ल के अच्छे बने, उस शक्ल की जन्नत मिलेगी। अब इसके लिए मस्जिदें बनीं और आवाज़ लगाई गई कि देखो, ये चीजें तुम्हें अपने में पैदा करनी हैं। अगर तुम अपने को क्रीमती बनाना चाहते हो, अगर कामयाब बनाना चाहते हो, तो तुम्हें अपने अन्दर ये चीजें उतारनी हैं, दिल में उतारो। जुबान से जो बोलो, उसके ख़िलाफ़ मत करो। अपनी-अपनी जुबानों से धोखे मत खाओ। तुम्हारे दिल में इन चीज़ों को देखा जाएगा कि तुममें ये हैं या नहीं।

इंसान बोहोत कमज़ोर है- Hazratji Yousuf

अब इन दो एतवारों से सारे इंसान अंधे हैं, जितने इंसान दुनिया में हैं, चाहे वे हाकिम हों या महकूम, मालदार हो या ग़रीब हो, मौलाना साहब हो, जो भी हों, इन दो बातों के एतबार से अंधे हैं। एक उन्हें ख़ुदा की ज्ञात, उनकी बड़ाई अपने आप नज़र नहीं आती। एक उन्हें गैर से न होना और ख़ुदा से होना दिखाई नहीं देता। इंसान ख़ुदा की जात के एतबार से अंधा है, बड़ाई के एतबार से भी अंधा और ख़ुदा की जात के होने को देखने के एतबार से भी अंधा। वह बीना है, जमीनों को देखने के एतवार से, पहाड़ों के एतबार से, लोहे-पीतल के एतवार से, यह बीना है मख्तूंकात के एतबार से, यह नाबीना है ख़ालिक के एतबार से, जाते वारी तआला के एतबार से नाबीना है यह।

Prophet muhammad के तरिके पर कामयाबियां- Hazratji Yousuf 

मुझे तो अपनी कामयाबी का रास्ता दिखाई नहीं देता। मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को ख़ुदा ने बीना बनाया है, वह जिस तरह कह गए, उठने-बैठने में, उस तरह चलने-फिरने में, उस तरह देखने-सुनने में, उस तरह तं तरह लेने-देने में, उस तरह पकड़ने-छोड़ने में मेरी कामयाबी है और यह जो मुल्क य माल में मुझे कामयाबियां दिखाई दे रही हैं, यह मेरा अंधापन है, मुझे ग़लत दिखाई दे रहा है, एक आदमी कमज़ोर निगाह का बाहर से आ रहा है, वह यों कहे, मियां! यह मस्जिद हिल रही है क्या? दूसरे कहें, यह मस्जिद नहीं हिल रही है, आप हिल रहे हैं, क्या भाई! यह एक के दो कैसे नज़र आ रहे हैं? एक मीनार के दो मीनार कैसे हो गए आज? लोग कहें, दूसरा मीनार नहीं बनवाया, आपकी आंख में खराबी है, आपमें अंधापन आ गया। अब यह मस्जिद इसलिए बनी कि इसके हिसाब में वक़्त निकाला जाए। खाली अल्लाहु अक्बर चाहे तुम सारी उम्र कहो, अल्लाह की बड़ाई दिल में तब बैठेगी, जब उसका कुरआन सुनोगे। सबसे पहला कुरआन अल्लाहु अक्बर का आया है, सबसे पहला क़ुरआन अश्हदु अल्ला इला-ह इल्लल्लाहु का आया है। सबसे पहला कुरआन मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्ल० का आया है, सबसे पहला क़ुरआन इन बातों का आया है। पहले मेहनत कर करके क़ुरआन सुन-सुनकर हदीसें सुन-सुनकर अल्लाह की बड़ाई को जान जाओ।

अगर तुम्हारी मुआशरत और आपस के मेल-जोल इन पांच पर आएंगे तो तुम्हें जन्नत में पहुंचाएंगे। ये पांच चीजें अपने में पैदा करना और इनके लिए वक़्त निकालना, और इसकी मेहनत का मैदान क़ायम करना, इसकी दावत देना, इसका माहौल बनाना, इसके लिए फिरना-फिराना, इसके लिए मस्जिदों में इकट्ठा करना, और होना बस एक चीज़ है कि जो अपना हिस्सा इस मेहनत में डालेगा, अल्लाह की ज्ञात से उम्मीद है कि ख़ुदा की बड़ाई उसके बोलने में आएगी, सुनने में आएगी, तालीम के हलके चल जाएंगे, कलिमे नमाज़ के फ़ज़ाइल खुल जाएंगे। कलिमे नमाज़ की तर्तीव हुजूर सल्ल० ने अपने जमाने में मस्जिद में जो चलाई थी, अगर हम अपनी मस्जिदों में बैठकर इन चीजों को चलाने लगेंगे और नमाज के बाहर जिस क़दर हमारे शोवे हैं, वे भी हुजूर सल्ल० के तरीके पर आएंगे। हुजूर सल्ल० के तरीक़े पर आ गए तो हुकूमत करके भी जन्नत में जाएंगे। अगर हुजूर सल्ल० के तरीके पर न आए तो महकूमियत में भी दोजख में जाएंगे। अगर आप हुजूर सल्ल० के तरीक़े पर चल पड़े तो मालदारी में भी जन्नत में जाएंगे। अगर हुजूर सल्ल० के तरीक़े पर न चले तो फ़क़ीरी में भी दोज़ख़ में जाएंगे। 

अपनी कमाई को Prophet muhammad के तरिके पर कैसे लावें- Hazratji Yousuf

अपनी कमाई को हुज़ूर सल्ल० के तरीक़े पर कैसे लावें। यहूद के तरीक़ों को तो हम ले आए, नसारा के तरीक़ों को तो हम आए, मुश्किों के तरीक़ों को तो हम ले आए, अपनी जान व माल के ख़र्च को उनके तरीक़ों पर तो ले आए, जिन्होंने हमें ज़िब्ह किया, हमारे टुकड़े किए और चौदह सौ वर्ष तक हमें पीसा है और अब भी पीस रहे हैं। उनके तरीक़ों पर तो हम अपना सब कुछ ले आए हैं। बच्चे उन्हीं के अच्छे लगते हैं। हुजूर सल्ल० के और आपके सहाबा के बच्चे अच्छे नहीं लगते। लिबास नसारा का अच्छा लगता है, हुजूर सल्ल० का और उनके सहाबा रजि० का लिबास अच्छा नहीं लगता। मकान नसारा के अच्छे लगते हैं, मकान हुज़ूर सल्ल० के और सहाबा रजि० के अच्छे नहीं लगते, तो जिंदगियों को यहूद और नसारा तक पहुंचा दिया हमने।

Allah के रास्ते में निकलो- Hazratji Yousuf

असल में कामयाबी की जो गारंटी है, वह तो हुजूर सल्ल० के तरीक़ों में है, मस्जिद में माहौल बना लो हुजूर सल्ल० के तरीक़ों के सीखने-सिखाने का और उसके अन्दर कामयाबी के यक़ीन बनाने में मस्जिद में माहौल, फिर अपने-अपने शोबों को धीरे-धीरे इस यक़ीन पर लाओ जितना अल्लाह शरहे सद्र नसीब फ़रमाते रहें और जितना नमाज़ और दुआओं के साथ यक़ीन बढ़ता रहे, उतना ही अपने बाहर के शोबों को भी हुजूर सल्ल० के तरीक़े पर लाते रहो। एकदम सारे तरीक़े नहीं बदला करते, हां, अलबत्ता मेहनत एकदम शुरू हो जाया करती है। आदमी मेहनत एकदम शुरू कर देता है, खेती की मेहनत एकदम शुरू कर देता है, लेकिन खेती होते-होते होती है, कोठी बनते-बनते बनती है, बस मेहनत शुरू कर दी जाए। इसीलिए तब्लीग़ में थोड़ी-सी तर्बियत अपनी मेहनत की करनी है, कलिमे नमाज़ का मस्जिद में माहौल बनाने की मेहनत, एक बार हिम्मत करके तीन चिल्ले दे दो, साल का चिल्ला देते रहो, महीने में तीन दिन के लिए निकलते रहो, हफ़्ते की दो गश्तें करते रहो। अपनी मस्जिद में तालीम, तस्बीह और नफ़्लों का और ईमान की दावत का एक माहौल बना लो। बस अगर इतना कर लिया सारे मुसलमानों ने मिलकर तो हुजूर सल्ल० के ज़माने का दीन जिंदा हो जाएगा।

और एक बात ख़ूब समझ लो कि जब एक बार आंख बन्द हो गई तो आंख बन्द नहीं होगी, ख़्वाब वाली बन्द हो गई, जागने वाली खुल गई। यह जो तुम्हारी नज़रों के सामने है, इसका कोई एतबार नहीं। जब आंख खुलगी, फिर क्या होगा। तुम्हारे सामने यह है असल, आंख खुल जाएगी उस वक्त पछतायेगा। अगर अपनी जिंदगी के शोबों में हुजूर सल्ल० के तरीके चल रहे हैं, तो चलो मुबारक हो और अगर हुजूर सल्ल० के तरीके जिंदगी के शोबों में टूटे हुए हैं, तो कमाइयां हराम हैं, जब उस पर पकड़ेंगे, तो फिर रोना पड़ेगा उस वक्त पता चलेगा। 

फिर आओ और उसे मुहल्ले में चलाओ, ख़ानदान में चलाओ, रिश्तेदारों में चलाओ। नीयत में रखो। सबसे मुंह मोड़ना है इनको सीखते-सीखते, फिर किसी के जी को लग गई, तो खानदान बन गया। खानदान बन जाएगा सारा अगर किसी एक के भी जी को लग गई।

घर की जिंदगी कैसी होनी चाहिये?- Hazratji Yousuf

और भाई! आओ अब घर की जिंदगी की तरफ़, अगर घर की जिंदगी में हुजूर सल्ल० के तरीके टूटे हुए हैं, तो अगर एक भी हराम का लुकमा खिलाया, बीबी को या औलाद को तो उस पर पकड़ेंगे कि यह क्यों खिलाया और यह जो सुवर की तरह है, सुवर पका पका के खिलाएं अपने बच्चों को, अपने बीवी-बच्चों को सुवर पका पका के खिला रहे हो और जो सूद है, वह सुवर से ज़्यादा सख्त है। उलेमा किराम ने लिखा है कि वाले जो भी शरीअत के खिलाफ़ कमाना होगा, वह सूद के हुक्म में है और सूद सुवर से ज़्यादा सख्त है तो अगर आपकी घर वाली जिंदगी सूद पैसे पर चल रही है और आपकी कमाई हुजूर सल्ल० के तरीके से हटकर चल रही है, तो मियां फिर एक मिनट की गुंजाइश नहीं ताख़ीर की कि उससे तौबा की जाए। एक मिनट की गुंजाइश नहीं ताख़ीर की, फिर तो बाहर निकलो, यक़ीनों को ठीक करो और अपनी कमाई को अपने घर को हुज़ूर सल्ल० के तरीक़े पर लाना सीखो।

अब इस तश्कील को सीखो कि किस तरह यहूद और नसारा के तरीक़ों से हटकर हुजूर सल्ल० और उनके सहाबा रजि० के तरीक़ों पर आ जावें। अब तो हालत यह है कि बीवी, बच्चे, मकान, कारोबार, उसके अन्दर, उसके सामने यहूद हैं, नसारा हैं, ये उनको देख-देख के चल रहे हैं। एक बार भी आंख उठा कर नहीं देखते कि हुजूर सल्ल० का मकान कैसा था। जब ये कपड़ा बनाते हैं, एक दिन यह तसव्वुर में नहीं आता कि अपने बच्चों के कपड़े ऐसे बना लो, जैसे हुजूर सल्ल० के थे। ये शादी करते हैं, कभी तसव्वुर में नहीं आता। हुजूर सल्ल० ने 11 ब्याह किए, जिस तरह हुजूर सल्ल० ने किया, हम भी कर लें, तो आप तो हुजूर सल्ल० को इमाम बनाएंगे ही नहीं, आज इमाम बना रखा है यहूद को, उस अंधे यहूद को जिसने हमें जिव्ह किया, चौदह सौ वर्ष तक वह इमाम बन चुके हैं ज़िदंगी में, थोड़े से नमाज़ी! कुछ पढ़ रहे, कुछ नहीं पढ़ रहे, तो नमाजियों ने भी मुक्तदा बनाया यहूद को और इन बे नमाजियों ने भी अपना मुक्तदा और इमाम बनाया नसारा को ।

दुनिया के तरिके पर नाकामी- Hazratji Yousuf

एक बड़ाई वह है, जिसको जानते हो, सबसे बड़ा बेटा, सबसे बड़ा पत्थर, सबसे बड़ी कोठी, इस क़िस्म के अक्बर बहुत बोले जाएं दुनिया में और अक्बर को देख के बोल रहे हो, देख जान के समझ के बोल रहे हो और एक अक्बर को बग़ैर देखे, बग़ैर जाने, बग़ैर समझे बोल रहे हो, जैसे बहुत बड़ा डॉक्टर जिस तरह कहे, उस तरह कर लो। बहुत बड़ा डॉक्टर, उसने कहा कि देखो, फ़्लानी चीज़ मत खाइयो, फ़्लानी मत खाइयो, फ़्लानी मत खाइयो और यह खाइयो, यह खाइयो, वह मत पीजियो, यह पीजियो अब सब क्योंकि बहुत बड़े डॉक्टर साहब हैं, उन्होंने यह परहेज़ बतलाया है, उसके कहने पर चल रहे हैं और अल्लाह को भी बहुत बड़ा कह रहा है रात दिन उन्होंने कहा, सूद मत • खाइयो, नहीं तो मुसीबत में आ जाओगे, झूठ बोल के मत खाइयो, रिश्वत से मत खाइयो, किसी का दबा के मत खाइयो। वे इसको भी कहते हैं अक्बर और वह भी कहता है कि यह खालोगे तो नुक्सान होगा, यह खा लोगे तो फ़ायदा होगा, लेकिन मजाल क्या कि उसके मना किए हुए को छोड़ दें और उसके बतलाए हुए को पकड़ लें। है कोई दुनिया में आज, है कोई मुसलमान ऐसा करने वाला। बहुत बड़ा डॉक्टर जानता है, बहुत बड़ा वज़ीर जानता है, बहुत बड़ा साईसदां जानता है, बहुत बड़ी बन्दूक्क जानता है। 

यह हर एक की जिन्स के बहुत बड़े को जानता है, लेकिन ख़ुदा को जो बहुत बड़ा कहता है, उसको बेवकूफ़ जानता ही नहीं, इसलिए कि उसने उसकी बड़ाई को दिल में उतारने के लिए कोई मेहनत ही नहीं की। उनकी बड़ाई पर मेहनत की है, उनके पास गया है, उनके पास उठा-बैठा है, उनकी लाइन की किताबें पढ़ी हैं, उनकी लाइन की चीज़ों को मालूम किया है, लेकिन अल्लाह की लाइन की चीज़ों पर कितनी मेहनत की, यक़ीन बनाने में कितने हाथ-पैर मारे, उनकी बड़ाई को दिल में उतारने में ख़ुदा की मालूमात को मालूम करने में, कितना वक़्त लगाया, कितना उसको जिंदगी में बोला, कितना उसकी बड़ाई को समझा, ग़ैरों की तरदीद अपनी जिंदगी में कितनी की। 

नबियों की जिंदगी इस तरह गुज़री कि ग़ैरों की बड़ाई की तरदीद करते हैं, उनकी तो जिंदगियां गुज़री हैं और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की जिंदगी भी उसी में गुज़र गई, लेकिन यहां इस फूटी जुबान से एक लफ़्ज़ तरदीद में इन चीज़ों के लिए नहीं निकलता कि इनसे कुछ नहीं होता, ख़ुदा सब कुछ होता है। यह कुछ भी नहीं, अल्लाह सब कुछ हैं, तो हमारी जुबानें गूंगी हैं। अल्लाहु अक्बर के एतबार से बोलने से हमारी जुबानें गूंगी हैं। ला इला-ह इल्लल्लाहु के एतबार से बोलने से हमारे कान बहरे हैं। अल्लाहु अक्बर के एतबार से सुनने से, इसलिए अंधे जो हैं, पूरे बन चुके हैं।

Real कामयाबि क्या है?- Hazratji Yousuf

यह मस्जिद इसलिए बनी थी, इस मस्जिद की तर्तीब क़ायम करो, यह सारी चीजें दिल में उतरेंगी, जान की मेहनत से, इसलिए इस बात की दावत दी गई। यह दावत जो मैं कह रहा हूं, ख़ुदा की बड़ाई की दावत, अल्लाह से होने, गैर से न होने की दावत, हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की एक बात पर होने की दावत कि जो उन्होंने फ़रमाया, अगर उसको तोड़ेंगे, तो नाकामी होगी, अगर उसको करेंगे, तो कामयाबी होगी और उसकी दावत दी जाएगी कि मुल्क व माल के नक्शे से कुछ नहीं होगा, यह सब धोखा है और जब मरोगे तो धोखा खुल जाएगा, इससे कुछ होता ही नहीं एक जलजला आता है किसी इलाके में धोखा खुल जाता है, सारी चीजें टूट के गिर जाती हैं, किसी इलाके में सैलाब आता है, धोखा खुल जाता है, सारी चीजें टूट के गिर पड़ती हैं। यह तो तुम्हारा धोखा है कि इन चीज़ों के अन्दर कामयाबी है। कामयाबी इसमें नहीं है।

Real कामयाबि किसमे है?- Hazratji Yousuf

कामयाबी इसमें है ‘हय-य अलस्सलात, हय-य अलल फ़लाह’ ही के तरीके पर नमाज़ पढ़ना सीख ले और कामयाबी ले ले, पस इसमें है कामयाबी, किसी कोठी में नहीं, किसी मकान में नहीं, किसी कारखाने में नहीं, कान खोल कर सुन ले, बाद में जब आंख खुलेगी तो पछतावेगा।

मरने से पहले-पहले इस बात को दिल में उतार ले कि हुजूर सल्ल० के तरीक़े में इस्तेमाल होने में कामयाबी है और मुल्क व माल के चीथड़ों में कोई कामयाबी नहीं, इसको अपने पे खोल ले। मरने से पहले-पहले तेरे दिल पे खुल जाए, 

Qabar के 3 सवाल?- Hazratji Yousuf

तेरे मरते ही क़ब्र में जब जाएगा, तो पहला सवाल यह होगा कि बता तेरा पालने वाला कौन है? अगर इस पर मेहनत की थी कि दुकान से पलता हूं, अपनी मेहनत से पलता हूं, पैसे से पलता हूं, तो तू कब्र में यह नहीं कह सकता कि मेरा रब ख़ुदा है। जो दिल में नहीं तो जुबान पर कैसे आए? चाहे तो करोड़ मर्तबा रोज पढ़ लिया कर डॉग डॉग ‘अल्लाहु अक्बर, अल्लाहु अक्बर’ और दुकान पर यक़ीन जमा है तो यह यक़ीन मोतबर नहीं है, जिसको पालने वाला समझा करता है, उसके ख़िलाफ़ कोई नहीं करता, कोई करता ही नहीं। उसके ख़िलाफ़ होने के मानी यह हैं कि हमने उसको जुबान से कहा, जिसकी हमें मालूमात हासिल नहीं हैं तो पहला सवाल होगा, तेरा रब कौन है? दुकान जाती रहेगी, खेती जाती रहेगी, मुल्क का नक्शा हाथ से ले लिया जाएगा, तो अगर अल्लाहु अक्बर तेरे दिल में बैठा हुआ नहीं है और यही है कि मेरी मेहनत से नक्शे बनते हैं और नक्शों से मेरी जिंदगी बनती है, तो ख़ुदा की कसम। यह आदमी कब्र में यह नहीं कह सकता कि अल्लाह मेरे रब हैं। 

दूसरा सवाल होगा, तेरा दीन क्या है? पलने के लिए क्या किया? आखिर पलने के लिए क्या किया ? कोठियां बनवाई, नक्शे बनाए, आखिर क्या किया? पलने के लिए क्या किया? अगर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीके पर यह सब किया, तो चलो कहेगा कि पलने के लिए इस्लाम पर चला हूँ और अगर यहां नक्शों ही में पलना दिखाई देता रहा तो कोई आदमी कब्र में यह नहीं कह सकता कि मेरे पलने का तरीक़ा इस्लाम है। फिर ये पूछेंगे कि उस आदमी को क्या कहता है? जिसने कमाने में यह न कहा कि जिस तरह हुजूर सल्ल० ने फ़रमाया, उस तरह कमाऊंगा और शादी करने में यह न कहा, जिस तरह हुजूर सल्ल० ने शादी को बतलाया, उस तरह करूंगा। जिंदगी में कहीं सरमायादारों को बोलता, कहीं हाकिमों को बोलता था, कहीं यूरोप को बोलता था, कहीं एशिया को बोलता था, कहीं नसारा को बोलता था, कहीं यहूद को बोलता था, मकान ऐसा बनाएंगे, कपड़े ऐसे बनाएंगे, फ़्लानी चीज़ ऐसे बनाएंगे। हुजूर सल्ल० का नाम जिंदगी के किसी मरहले में आया ही नहीं, शादी की तो ग़ैरों के नाम पर, ग़ैरों के तरीके क्या हैं, मकान बनाया तो ग़ैरों के नाम पर, फ़्लानी जैसी कोठी बनाएंगे, फ़्लानी जैसी मोटर खरीदेंगे, कहीं फूटी जुबान से ज़िदंगी के शोवों में मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का नाम न आया। वे कहेंगे क्या कहता है इस आदमी को ? वह कहेगा, मैं नहीं जानता, किसको पूछते हो? भई, मेरे तो बहुत से हैं, कोई कोठी में मेरा मुक्तदा है, कोई लिवास में मेरा मुक्तदा है, कोई ग़िज़ाओं में मेरा मुक्तदा है, कोई कामयाबी में मेरा मुक़्तदा है। मैं तो हजारों के पीछे चला हूं, एक हो तो बताऊं। तुम बताओ, तुम किसे पूछते हो? मैं तो समझा नहीं। एक आवाज आएगी, झूठा है कमबख्त! इसके लिए आग के बिस्तर बिछा दो और दोज़ख़ की खिड़की खोल दो और आग के कपड़े पहना दो। बस यही तीन सवाल हैं, मेरे अज़ीज़ो!

अभी का बुरा वक्त – Hazratji Yousuf

एक एक नक्शा बदतर है आज, औरतें कहां तक पहुंच गई औरतें यहां तक पहुंच गई कि कुत्तों से जिना कराएंगी, यूरोप की ईसाई औरतें कुत्तों से जिना कराती हैं। अगर यूरोप ही इमाम बना रहा, तो आदमी अपनी माओं से जिना करेगा, अपनी बेटियों से जिना करेगा, ये ज़िना के इमाम हैं। यहां तक पहुंचोगे, जहां ये पहुंचे हैं। उफ़ उफ़ ये खून की नदियां बहाने के इमाम है, तुम भी वहीं तक पहुंचोगे, लुटेरे बनोगे, शरीफ़ इंसान नहीं बन सकते। शरीफ़ के पीछे चलोगे, शरीफ़ बनोगे और कमीनों के पीछे चलोगे, तो कमीने बनोगे। शरीफ़ों के सरदार हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं, ये जिनके साथ शराफ़तें जमा हैं, सारी शराफ़तें, सारे कमालात, सारी खूबियां उनमें जमा हैं, उनके पीछे चलो। इसके लिए चाहिए वक्त, ज़ौक़ की तब्दीली के लिए चाहिए वक़्त और जितना उसके लिए मेहनत करोगे, जौक्र बदलेगा। हम कमाते रहें, कमाते रहें, एकदम हुजूर सल्ल० का ज़ौक़ आ जाए, यह नामुम्किन है। हम मकान बनाते हैं, कोठियां बनाते हैं, बिल्डिंगें बनाते हैं, व्याह-शादियां करते हैं, शानदार चीजें खरीदते हैं और जो पैसा हाथ में आवे, वह Ja ‘हल मिन मजीद’।

वह सारा इन्हीं में लगाते रहें और उसके लिए न माल लगे, न जान, तो ख़ुदा की कसम यहूद और नसारा की तरफ़ ज्यादा क़रीब हो जाओगे और हुजूर सल्ल० से दूर हो जाओगे और खून चूसने वालों के और क़रीब हो जाओगे। जिसने (यानी हुजूर सल्ल० ने) हमारी हिफ़ाज़त के लिए खून दिया था, उससे दूर हो जाओगे और जो अपनी हिफ़ाज़त के लिए हमारा खून करता है, उसके और क़रीब हो जाओगे, तो गोया खून देने वाले से दूर हुए और खून लेने वाले से क़रीब हुए, हालांकि हुजूर सल्ल० से क़रीब होने में हमारा फ़ायदा है और हुजूर सल्ल० से दूर होने में हमारा नुक्सान है, इसलिए कहते हैं कि इस माहौल को बदलो। यह माहौल निहायत जहरीला है, इसकी तो हर चीज़ ग़लत। इसकी एक चीज़ भी सही हो तो कहें कि कुछ सही है। मुझे बता दो कि उसकी कौन-सी चीज़ सही है।

3 दीन कि तस्किल- Hazratji Yousuf

अब एक बात हमारी मान लो सौ, डेढ़ सौ दो सौ रुपए साथ ले के हमारे साथ लाहौर चलो तीन दिन, तो सुनते रहो, फिर जितना वक़्त ख़ुदा तुम्हारे दिल में डाल दे, उतना दे दीजियों, पैसे ले के तीन दिन के लिए चलो और यह नीयत करके चलो कि अल्लाह मेरे जी में डाल दे और यों दुआ करो कि अल्लाह ! तू इसको मेरे जी में डाल दे अगर जी में न आवे तो वापस चले आइयो और अगर अल्लाह जी में डाल दे तो जितना वक़्त अल्लाह जी में डाल दे, उतना दे आइयो ।

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