सदका करने के फ़ायदे | बे-दीन को दीनदार कैसे बनाऐ ? – Dawat~e~Tabligh

चिल्ले Jammat के फ़ायदे । Allah के रास्ते में kharch, क्या काफिर का Khawab भी सच हो सकता है ? सदका करने के फ़ायदे | बे-दीन को दीनदार कैसे बनाऐ ? – Dawat~e~Tabligh in Hindi…

सदका करने के फ़ायदे | बे-दीन को दीनदार कैसे बनाऐ ? - Dawat~e~Tabligh
सदका करने के फ़ायदे | बे-दीन को दीनदार कैसे बनाऐ ? – Dawat~e~Tabligh

Allah के रास्ते में kharch | सदका करने के फ़ायदे

  • 49 करोड़ की रिवायत

1. जो शख्स अल्लाह के रास्ते में अपनी जान के ज़रिए जिहाद करे तो उसे हर दिरहम के बदले में सात लाख के बराबर अज मिलेगा। फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी बात की ताईद में यह आयत तिलावत फ़रमाई और अल्लाह जिसके लिए चाहते हैं अज को दो गुना कर देते हैं।

2. अबू दाऊद में सहूल बिन मआज अपने वालिद से रिवायत करते हैं कि आप सल्ल० ने फ़रमाया कि बिलाशुब्ह अल्लाह के रास्ते में नमाज़, रोज़ा और ज़िक्ररुल्लाह, अल्लाह के रास्ते में खर्च करने के मुक़ाबले में 700 गुना बढ़ा दिया जाता है। सात लाख को सात सौ से ज़रब देने से 49 करोड़ बनता है।

बे-दीन को दीनदार कैसे बनाऐ?

  • बे-दीन को दीनदार बनाने का एक अजीब फ़ारूक़ी नुस्ख़ा

इब्ने कसीर ने इब्ने अबि हातिम की सनद से नक़ल किया है कि मुल्क शाम में एक बड़ा बारौब आदमी था और फ़ारूक़ आज़म रज़ियल्लाहु अन्हु के पास आया करता था कुछ अर्से तक वह न आया तो फ़ारूक़ आज़म रज़ियल्लाहु अन्हु ने लोगों से उसका हाल पूछा। लोगों ने कहा कि अमीरुल मोमिनीन उसका हाल न पूछिए वह तो शराब में बद्मस्त रहने लगा। फ़ारुक़-ए-आज़म रज़ियल्लाहु अन्हु ने अपने मुंशी को बुलाया और कहा कि यह ख़त लिखो :

तर्जमाः- मिनजानिब उमर बिन ख़त्ताब (रज़ियल्लाहु अन्हु), बनाम फुलाँ बिन फुलौं । सलाम अलैक। इसके बाद मैं तुम्हारे लिए उस अल्लाह की हम्द पेश करता हूँ जिसके सिवा कोई माबूद नहीं, वह गुनाहों को माफ़ करने वाला, तौबा को क़बूल करने वाला, सख़्त अज़ाब देने वाला, बड़ी क़ुदरत वाला है, उसके सिवा कोई माबूद नहीं, उसी की तरफ़ लौटकर जाना है।

फिर मजलिस में बैठे हुए लोगों से कहा कि सब मिलकर उसके लिए दुआ करो कि अल्लाह तआला उसके क़ल्ब को फेर दे, और उसकी तौबा क़बूल फ़रमाये । फ़ारूक़े-आज़म रज़ियल्लाहु अन्हु ने जिस क़ासिद के हाथ यह ख़त भेजा था उसको हिदायत की थी कि यह ख़त उनको उस वक्त तक न दे जब तक कि वह नशे से होश में न आये और किसी दूसरे के हवाले न करे। जब उसके पास हज़रत फ़ारूके-आज़म रज़ियल्लाहु अन्हु का यह ख़त पहुँचा और उसने उसको पढ़ा तो बार-बार उन कलिमात को पढ़ता और गौर करता रहा कि इसमें मुझे सज़ा से डराया भी गया है और माफ़ करने का वादा भी किया गया है फिर रोने लगा और शराबनोशी से बाज़ आ गया और ऐसी तौबा की कि फिर शराब के पास न गया।

हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु को जब इस असर की ख़बर मिली तो लोगों से फ़रमाया कि ऐसे मामलात में तुम सबको ऐसा ही करना चाहिए कि जब कोई भाई किसी गलती में मुब्तला हो जाये तो उसको दुरुस्ती पर लाने की फ़िक्र करो और उसको अल्लाह की रहमत का भरोसा दिलाओ और अल्लाह से उसके लिए दुआ करो कि वह तौबा कर ले और तुम उसके मुक़ाबले पर शैतान के मददगार न हो यानी उसको बुरा भला कहकर या गुस्सा दिला कर और दीन से दूर कर दोगे तो यह शैतान की मदद होगी।

-मआरिफुल कुरआन, हिस्सा 7 पेज 582

क्या काफिर का Khawab भी सच हो सकता है ?

  • कभी काफ़िर, फ़ासिक़ आदमी का ख़्वाब भी सच्चा हो सकता है

यह बात भी कुरआन व हदीस से साबित और तजुर्बात से मालूम है कि सच्चे ख़्वाब कभी-कभी फ़ासिक बल्कि काफ़िर को भी आ सकते हैं। सूरः युसूफ़ ही में हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के जेल के दो साथियों के ख़्वाब और उनका सच्चा होना, उसी तरह बादशाहे मिस्र का ख़्वाब और उसका सच्चा होना, कुरआन में जिक्र है। हालांकि यह तीनों मुसलमान न थे । हदीस में कसा के ख्वाब का ज़िक्र है जो उसने रसुले-करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बिअसत के बारे में देखा था, वह ख़्वाब सही हुआ, हालांकि कस्रा मुसलमान न था। रसूले करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की फूफी आतिका ने कुफ्र की हालत में आप सल्ल० के बारे में सच्चा ख्वाब देखा था। और काफ़िर बादशाह बुख़्त नसर के जिस ख़्वाब की ताबीर हज़रत दानियाल अलैहिस्सलाम ने दी वह ख़्वाब सच्चा था।

इससे मालूम हुआ कि सिर्फ इतनी बात कि किसी को कोई सच्चा ख़्वाब नज़र आ जाये और वाक़िआ उसके मुताबिक़ हो जाये उसके नेक सालेह बल्कि मुसलमान होने की भी दलील नहीं हो सकती। हाँ, यह बात सहीह है कि आम यही है कि सच्चे और नेक लोगों के ख़्वाब अक्सर सच्चे होते हैं, फुस्साक़ व फ़ुज्जार के अक्सर हदीसुन्-नफ्स या तस्वील शैतान की क़िस्म बातिल से हुआ करते हैं मगर कभी-कभी। बहरहाल सच्चे ख़्वाब आम उम्मत के लिए हसबे तस्रीहे – हदीस एक बशारत या तंबीह से ज्यादा कोई मक़ाम नहीं रखते, न खुद इसके लिए किसी मामले में हुज्जत है, न दूसरों के लिए। कुछ नावाक़िफ़ लोग ऐसे ख़्वाब देखकर तरह-तरह के वस्वसों में मुब्तला हो जाते हैं।

कोई उनको अपनी विलायत की अलामत समझने लगता है, कोई उनसे हासिल होने वाली बातों को शरजी अहकाम का दर्जा देने लगता है। यह सब चीजें बे-बुनियाद हैं ख़ास कर जबकि यह भी मालूम हो चुका है कि सच्चे ख्वाबों में भी ज़्यादा तर नफ़्सानी या शैतानी या दोनों क़िस्म के तसव्वुरात के मिले होने का एहतिमाल है।

 –मआरिफ्फुल-कुरआन, हिर ,हिस्सा 5, पेज 9

चिल्ले Jammat के फ़ायदे

  • चिल्ले की फ़ज़ीलत

एक हदीस में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का इर्शाद हैं कि जो शख्स चालीस रोज़ इख्लास के साथ अल्लाह तआला की इबादत करे तो अल्लाह तआला उसके क़ल्ब से हिक्मत के चश्मे जारी फ़रमा देते हैं। रूहुल बयान, मआरिफुल क़ुरआन, हिस्सा 4, पेज 58

जिहाद का शौक

कुल व शिर्क का जोर तोड़ने और इस्लाम फैलाने के लिए कभी-कभी जंग के मैदान में भी उतरना पड़ता है। मुसलमान की सबसे बड़ी तमन्ना यही होती है कि उसकी जान व माल अल्लाह की राह में काम आ जाए। हज़रत अब्दुल्लाह रह० की सबसे बड़ी तमन्ना यही थी। नेकी के हर काम में आगे आगे रहते। रातें ख़ुदा की याद में गुज़ारते, दिन हदीस पढ़ने-पढ़ाने में गुज़ारते। माल व दौलत अल्लाह की राह में खर्च होता और जिहाद का मौक़ा आता तो मैदाने जंग में बहादुरी के जौहर दिखाते।

यह वह जमाना था कि मुसलमानों और रूमी काफिरों में ठनी हुई थी और आए दिन झड़पें होती रहती थीं हज़रत अब्दुल्लाह रह० उनके मुकाबलों में अक्सर शरीक होते। एक बार मुसलमानों और काफ़िरों की फ़ौजें आमने सामने थीं और बड़ा सख्त मुकाबला था एक काफ़िर अकड़ता हुआ मैदान में उतरा और मुसलमान सिपाहियों को मुक़ाबले के लिए पुकारा। मुसलमानों में से एक मुजाहिद बिफरे हुए शेर की तरह उसपर झपटा और एक ही बार में उसका काम तमाम कर दिया। फिर एक और काफ़िर इतराता हुआ मैदान में आया। मुजाहिद ने उसे भी एक ही बार में ढेर कर दिया। इसी तरह कई काफ़िर मुक़ाबले पर आए और उसने सबको जहन्नम रसीद किया।

उस बहादुर शेर की यह बहादुरी देखकर मुसलमान बहुत खुश हुए और उसको देखने के लिए आगे बढ़े ख़ुदा के सिपाही ने बन्दों की तारीफ़ से वेनियाज़ होकर मुंह पर कपड़ा डाल रखा था कपड़ा हटाया गया तो देखा कि हजरत अब्दुल्लाह इब्ने मुबारक रह०  हैं।

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