शैतान का फसाना | Shaitan की चलाकिया | Dawat-e-Tabligh

Shaitan मेरी बात क्यों मानी? तुम खुद मुज्मि हो? पैगम्बरों की दावत छोड़कर , हुज्जत और दलील के ज़रिए। मेरे झूठे और बातिल बुलावे पर तुमने क्यों कान धरा। कोई ज़बरदस्ती हाथ पकड़ के तो मैंने तुमसे कुफ़ व शिर्क के काम कराये नहीं। शैतान का फसाना | Shaitan की चलाकिया | Dawat-e-Tabligh….

शैतान का फसाना | Shaitan की चलाकिया | Dawat-e-Tabligh
शैतान का फसाना | Shaitan की चलाकिया | Dawat-e-Tabligh

शैतान का फसाना

  • अपने मानने वालों के सामने शैतान का सफाई पेश करना

दुनिया में शैतान ने अपने गिरोह के साथ इंसानों को ख़ूब बहकाया और हक़ के रास्ते से हटाकर कुफ्र व शिर्क में फांसा। मगर क़ियामत के दिन इंसानों को ही इल्ज़ाम देगा कि तुमने मेरी बात क्यों मानी। मेरा तुम पर क्या ज़ोर था। चुनांचे अल्लाह का इर्शाद है :

‘और जब फ़ैसले हो चुकेंगे, शैतान कहेगा कि (मुझे बुरा कहना नाहक है) क्योंकि बिला शुब्हा अल्लाह ने तुमसे सच्चे वादे किये थे, और मैंने (भी) तुमसे वायदे किये थे। सो मैंने जो वादे के ख़िलाफ़ किये थे और तुम पर मेरा कुछ ज़ोर इससे ज़्यादा तो चलता न था कि मैंने तुमको दावत दी। सो तुमने (खुद ही) मेरा कहना मान लिया। सो तुम मुझ पर मलामत न करो और अपने को मलामत करो। न मैं तुम्हारा मददगार हूं न तुम मेरे। मैं तुम्हारे इस फेल (काम) से खुद बेज़ार हूं कि तुमने इससे पहले (दुनिया में मुझे खुदा का शरीक करार दिया । यकीनन ज़ालिमों के लिए दर्दनाक अज़ाब ‘है ।”

शैतान के कहने का मतलब यह है कि मैंने तुमको बहकाया। सच्चे रास्ते से हटाने की कोशिश की। यह तो मेरा काम था। तुमने मेरी बात क्यों मानी? तुम खुद मुज्मि हो? पैगम्बरों की दावत छोड़कर , हुज्जत और दलील के ज़रिए होती थी। मेरे झूठे और बातिल बुलावे पर तुमने क्यों कान धरा। कोई ज़बरदस्ती हाथ पकड़ के तो मैंने तुमसे कुफ़ व शिर्क के काम कराये नहीं। मुझे बुरा कहने से क्या बनेगा। खुद अपने नफ़्सों को मलामत करो। हम आपस में एक दूसरे की मदद नहीं कर सकते। अब तो अज़ाब चखना ही है। दुनिया में जो तुमने मुझे खुदा का शरीक बनाया मैं उससे बेज़ारी ज़ाहिर करता हूं।

शैतान के कहने पर चलने वाले की हसरत व अफ़सोस का जो उस वक़्त हाल होगा, ज़ाहिर है।

Jinn से ख़िताब

जिन्नों को ख़िताब करके अल्लाह जल्ल ल शानुहू सवाल फ़रमायेंगे जैसा कि सूरः अविया में फ़रमाया :

‘और जिस दिन अल्लाह इन सबको जमा करेगा (और फरमायेगा) ऐ जिन्नों की जमाअत! तुमने इंसानों में से बड़ी जमाअत बस में कर ली थी।’ आगे फरमाया :

‘और कहेंगे जिन्नों के दोस्त आदमियों में से कि ऐ हमारे रब! फ़ायदा उठाया हम में एक ने दूसरे से और हम पहुंच गये अपने उस मुकर्रर वक्त को जो आपने हमारे लिऐ मुकर्रर फ़रमाया।’

दुनिया में तो लोग बुत वगैरह पूजते हैं, वे सच में खुबीस जिन्न व शैतान ही की पूजा करते हैं, इस ख्याल से कि वे हमारे काम निकालेंगे, उन की नियाजें चढ़ाते हैं और उनके आस-पास नाचते और गाते-बजाते हैं। इस्लाम से पहले यह भी कायदा था कि आई वक़्त में जिन्नों से मदद तलव किया करते थे, जब आख़िरत में जिन्न और उनकी पूजा करने वाले पकड़े जाएंगे तो मुश्कि कहेंगे कि हमारे परवरदिगार! वह तो हमने वक़्ती कार्रवाई कर ली थी और मौत का वादा आने से पहले-पहले दुनिया की ज़रूरतों के लिऐ हम एक-दूसरे से काम निकालने के कुछ उपाय कर लिया करते थे। आगे फरमाया :

‘अल्लाह तआला का इर्शाद होगा कि दोज़ख़ है तुम्हारा ठिकाना । उसमें हमेशा रहोगे मगर हां, जो अल्लाह चाहे’। बेशक तेरा रब हिकमत वाला और जानने वाला है और इसी तरह हम साथ मिला देंगे गुनहगारों को एक-दूसरे से उनके आमाल की वजह से।’

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दोज़ख़ का अज़ाब काफिरों के लिए हमेशा है अल्लाह के चाहने से अगर अल्लाह चाहे तो ख़त्म कर दे लेकिन इसका फैसला हो चुका कि काफिर व मुश्कि की बख्शिश नहीं। ये लोग हमेशा दोज़ख़ में रहेंगे। पैग़म्बरों के ज़रिए इसकी ख़बर दी जा चुकी है। 

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फिर आगे फरमाया :

‘ऐ जिन्नो और इंसानों की जमाअत ! क्या तुम्हारे पास तुम में से रसूल नहीं आये थे जो तुमको मेरी आयतें सुनाते थे और उस दिन के पेश आने से डराते थे। जिन्न व इंसान इक़रार करते हुए अर्ज़ करेंगे कि हमने अपने गुनाह का इक़रार कर लिया और उनको दुनिया की जिंदगी ने धोखा दिया और इकरारी होंगे कि वे काफिर थे।

इस आयत से साफ़ ज़ाहिर है कि जिन्नों और इंसानों से इकट्ठा ख़िताब और सवाल होगा कि रसूल तुम्हारे पास पहुंचे या नहीं? सवाल के जवाब में जुर्म का इक़रार करेंगे और यह मानेंगे कि हां ! रसूल हमारे पास आये थे। सच में हम ही मुज्मि हैं। इस आयत में हैं कि अपने काफिर होने का इक़रार करेंगे और कुछ आयतों में है कि ‘मा कुन्ना मुश्किीन’ (हम मुश्कि न थे) कहेंगे। इस शुब्हे का जवाब यह है कि पहले इंकार करेंगे और फिर आमालनामों और गवाहियों के ज़रिए इक़रार कर लेंगे और यह इंसान का कायदा है कि पहले जुर्म मानने से इंकार करते है। फिर जब इस तरह जान छूटती नज़र नहीं आती तो यह समझकर शायद इक़रार करने ही से ख़लासी हो जाए, इक़रार कर लेता है (लेकिन वहां काफ़िर व मुश्कि की ख़लासी न होगी) ।

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