सिफ़ारीश किन के लिए होगी ? | बच्चे का (इंतिकाल) मरना कैसा है ? | Dawat-e-Tabligh

मौजूदगी में बच्चे का इंतिकाल हो जाए। बच्चे की मौत पर जो मां-बाप को ग़म होता है। अगर अधूरा बच्चा गिर गया तो वह भी मां-बाप को… । सिफ़ारीश किन के लिए होगी ? | बच्चे का (इंतिकाल) मरना कैसा है ? | Dawat-e-Tabligh

सिफ़ारीश किन के लिए होगी ? | बच्चे का (इंतिकाल) मरना कैसा है ? | Dawat-e-Tabligh
सिफ़ारीश किन के लिए होगी ? | बच्चे का (इंतिकाल) मरना कैसा है ? | Dawat-e-Tabligh

शफाअत

क़ियामत में शफाअत भी अल्लाह जल्ल ल शानुहू क़ुबूल फरमाएंगे और उससे ईमान वालों को बड़ा नफा पहुंचेगा। आंहज़रत सैयदे आलम ने इर्शाद फ़रमाया है कि कियामत के दिन तीन गिरोह शफाअत करेंगे।

1) अंबिया किराम अलैहिमुस्सलातु वस्स्लाम,

2) उलमा और

3) शुहदा’

लेकिन शफाअत वही कर सकेगा, जिसे अल्लाह तआला की तरफ से शफाअत करने की इजाज़त होगी। जैसा कि आयतल कुर्सी में फ़रमाया :

मन जल्लजी यशफर इन द हु इल्ला बिइज़्निह ।

‘कोई है जो उसके दरबार में शफाअत करे बगैर उसकी इजाज़त के।’ और सूरः ताहा में फ़रमाया :

‘उस दिन सिफारिश नफा न देगी मगर ऐसे शख़्स को जिसके वास्ते

अल्लाह ने इजाज़त दे दी है और इसके वास्ते बोलना पसन्द कर लिया हो।’

जिसको अल्लाह जल्लल शानुहू की तरफ से शफाअत की इजाज़त होगी, वही शफाअत कर सकेगा और जिसके लिए शफाअत की इजाज़त होगी, इसी के बारे में शफाअत करने वाले शफाअत करने की हिम्मत करेंगे। काफिरों के हक में शफाअत करने की इजाजत न होगी और न कोई उनका दोस्त और सिफारिशी होगा। अल्लाह का इर्शाद है :

‘जालिमों का न कोई दोस्त होगा और न कोई सिफारिशी, जिसका कहा माना जाए।’

5 सिफ़ारीश

मिर्कात शरह मिश्कात में लिखा है कि क़ियामत के दिन पांच तरह की शफाअतें होंगी। सबसे पहली शफाअत हश्र के मैदान में जमा होने के बाद हिसाब-किताब शुरू कराने के लिए (जिसका ज़िक्र तफसील से गुज़र चुका है) तमाम नवी अल्लाह के दरबार में शफाअत करने से इंकार कर देंगे और आंहज़रत सैयदे आलम तमाम अगले-पिछले मुस्लिमों और काफ़िरों के लिए शफाअत फरमाएंगे। दूसरी शफाअत बहुत से ईमान वालों को जन्नत में बगैर हिसाब दाखिल कराने के बारे में होगी। यह सिफारिश भी आहज़रत सैयदे आलम फ़रमायेंगे। तीसरी शफाअत उन लोगों के लिए होगी जो बदआमालियों की वजह से दोज़ख़ के हकदार हो चुके होंगे। यह शफाअत आहज़रत सैयदे आलम भी फ़रमायेंगे और आपके अलावा मोमिन और • शहीद, आलिम भी उनकी शफाअत करेंगे। चौथी शफाअत उन गुनाहगारों के बारे में होगी जो दोज़ख़ में दाखिल हो चुके होंगे। उनको दोज़ख़ से निकालने के लिए नबीयों और फ़रिश्ते शफाअत करेंगे। पांचवी शफाअत जन्नतियों के दर्जे बुलन्द कराने के लिए होंगीं ।

सिफ़ारीश किन के लिए होगी ? 

हज़रत औफ बिन मालिक से रिवायत है कि आहज़रत सैयदे आलम ने इर्शाद फ़रमाया कि मेरे रब के पास से एक कासिद ने आकर (अल्लाह तआला की तरफ से) मुझे यह पैग़ाम दिया कि या तो मैं इस बात को अख्तियार कर लूं कि मेरी आधी उम्मत बिला हिसाब व अज़ाब जन्नत में दाख़िल हो जाए या इसको आख़्तियार कर लूं कि (अपनी उम्मत में से जिसके लिए भी चाहूँ, शफाअत कर सकूं। इसलिए मैंने शफाअत को अख़्तियार कर लिया और मेरी शफाअत उन लोगों के लिए होगी, जो अल्लाह के साथ किसी को शरीक नहीं करते।

-मिश्कात शरीफ

चूंकि आंहज़रत सैयदे आलम ने उम्मत का ज्यादा नफा उसी में समझा कि हर शख़्स के लिए शफाअत करने का हक़ ले लें। इसलिए आपने उसी को अख्तियार फ़रमाया ।

हज़रत अबू हुरैरः से रिवायत है कि आहज़रत ने फरमाया कि (अल्लाह की तरफ़ से हर नबी को) एक मक़बूल दुआ दी गयी। पस हर नबी  ने दुनिया में मांग कर कुबूल करा ली और मैंने (इस दुआ को दुनिया में मांगकर ख़त्म नहीं कर दी, बल्कि उस दुआ को क्रियामत के दिन तक के लिए छिपा रखी है, ताकि उस दिन अपनी उम्मत की शफाअत में उसको काम में लाऊं। पस मेरी शफाअत इन्शाअल्लाह मेरे हर उस उम्मती को ज़रूर पहुंचेगी जो इस हाल में मर गया हो कि अल्लाह के साथ किसी को शरीक न करता था। 

– मुस्लिम शरीफ

एक दुआ

इस मुबारक हदीस के अन्दाज़ से साफ़ मालूम होता है कि अल्लाह जल्ल ल शानुहू की यह आदत थी कि हर नबी को ख़ास तौर पर यह अख़्तियार देते थे कि एक दुआ ज़रूर ही क़बूल होती ही थी। लेकिन ख़ास एजाज़ के लिए अल्लाह जल्ल ल शानुहू ने हर नबी को अख्तियार दिया कि एक बार तुम जो चाहो, मांग लो। प्यारे नबी ने फ़रमाया कि वह ख़ास दुआ हर नबी ने दुनिया ही में मांग ली। मैंने यहां नहीं मांगी। बल्कि कियामत के दिन के लिए रख छोड़ी है। उसे अपनी उम्मत की शफाअत के लिए इस्तेमाल करूंगा।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उम्र बिन आस से रिवायत है कि आहज़रत सैयदे आलम ने इर्शाद फ़रमाया कि (हमारे) इस किले के मानने वालों में इतनी ज्यादा तादाद दोज़ख़ में दाख़िल होगी कि जिसका इल्म अल्लाह ही को है (और यह दोज़ख़ का दाख़िला) अल्लाह की नाफरमानियों की वजह से और नाफरमानियों पर जुअंत (दुस्साहस) करने और अल्लाह के. हुक्म के ख़िलाफ़ चलने की वजह से (होगी)। पस मैं सज्दा में पड़कर अल्लाह की तारीफ़ में लग जाऊंगा जैसा कि खड़े होकर उसकी तारीफ़ ब्यान करूंगा। इसके बाद (अल्लाह तआला की तरफ से ) हुक्म होगा कि अपना सर उठाओ और सवाल करो। तुम्हारा सवाल पूरा किया जाएगा और शफाअत करो, तुम्हारी शफाअत मानी जाएगी।

– मुस्लिम शरीफ

हज़रत अली बिन अबी तालिब से रिवायत है कि आहज़रत सैयदे आलम ने इर्शाद फ़रमाया कि मैं अपनी उम्मत के लिए शफाअत करता रहूंगा और अल्लाह मेरी शफाअत कुबूल फरमाते रहेंगे, यहां तक कि अल्लाह तआला मुझसे पूछेगा कि ऐ मुहम्मद ! क्या राज़ी हो गये, मैं अर्ज करूंगा कि ऐ रब! मैं राज़ी हो गया।      

-तर्गीब व तहींब 

Prophet Mohammad की लोगो के लिए मोहब्बत

हज़रत इब्ने अब्बास से रिवायत है कि आहज़रत ने फ़रमाया कि नबियों के लिए (कियामत के दिन) नूर के मिंबर रख दिए जाएंगे, जिन पर वे तशरीफ फरमा होंगे और मेरा मिंबर खाली रहेगा। मैं उस पर इस डर से न बैठूंगा कि कहीं जन्नत में मुझे न भेज दिया जाए और मेरे बाद, मेरी उम्मत ( शफाअत से महरूम) न रह जाए। मैं अर्ज करूंगा कि ऐ रब ! मेरी उम्मत !! मेरी उम्मत !!! अल्लाह जल्ल ल शानुहू फरमाएंगे कि ऐ मुहम्मद ! तुम अपनी उम्मत के बारे में मुझसे क्या चाहते हो? मैं अर्ज करूंगा कि उनका हिसाब जल्दी कर दिया जाए। चुनांचे उम्मते मुहम्मदी को बुलाकर उनका हिसाब जल्दी कर दिया जाएगा। नतीजे के तौर पर कुछ तो उनमें अल्लाह की रहमत से और कुछ मेरी शफाअत से जन्नत में दाख़िल होगा। मैं सिफारिश करता ही रहूंगा। यहां तक कि जो लोग दोज़ख़ में भेज दिए गए होंगे। उनके निकालने के लिए भी (अल्लाह तआला की तरफ से) मुझे (उनके लिखे हुए नामों की) एक किताब दे दी जाएगी। यहां तक कि (मालिक) दोज़ख़ के दारोगा मुझसे कहेंगे कि आपने अपनी उम्मत में से किसी को भी अल्लाह के गुस्से के लिए नहीं छोड़ा जो अजाब में पड़ा रहा चला जाता (बल्कि सबको निकलवा लिया)।

 -तर्गीब व तहब

Prophet Mohammad की सिफ़ारीश

शिफाअत वाली हदीस में हैं कि सरवरे आलम ने फरमाया कि मैं अर्श के नीचे अपने रब के लिए सज्दे में जा पडूंगा। फिर अल्लाह मुझे अपनी वे हम्दें और उम्दा तारीफ बता देगा जो मुझसे पहले किसी को न बताई होंगी। फिर अल्लाह का इर्शाद होगा कि ऐ मुहम्मद ! अपना सर उठाओ और सवाल करो। तुम्हारा सवाल पूरा किया जाएगा और सिफारिश करो, तुम्हारी सिफारिश क़ुबूल की जाएगी। चुनांचे मैं सर उठाऊंगा। और ‘या रब्बि उम्मती। या रब्बि उम्मती। या रब्बि उम्मती! (ऐ मेरे रब ! मेरी उम्मत, ऐ मेरे रब! मेरी उम्मत, ऐ मेरे रब: मेरी उम्मत) कहूंगा। इसलिए मुझसे कहा जाएगा कि ऐ मुहम्मद! अपनी उम्मत के उन लोगों को जन्नत के दरवाज़ों में से दाहिने दरवाज़े से जन्नत में दाखिल कर दो, जिनसे कोई हिसाब नहीं है। (फिर फरमाया कि) कसम उस ज़ात की, जिसके कब्ज़े में मेरी जान है, जन्नत के दरवाज़े इतने चौड़े हैं, जितना कि मक्का और हिज्र’ (हिज्र अरब के एक शहर का नाम था, जो मक्का से काफी दूर था) । के दर्मियान फासला है।                   

  -मिश्कात शरीफ 

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अल्लाह हाथ, लप, कदम और चेहरे से पाक है। क़ुरआन व हदीस में जहां कहीं इन चीज़ों का ज़िक्र आया है, उन पर ईमान लाओ कि उनका जो मतलव अल्लाह के नज़दीक है। यही हमारे नज़दीक है और इनका ज़ाहिरी मतलब लेकर अल्लाह के लिए जिस्म तज्वीज़ कभी न करो। 

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हज़रत आइशा फ़रमाती हैं कि मैंने एक नमाज़ में आंहज़रत को यह दुआ करते हुए सुना कि अल्लाहुम्म म हासिब्नी हिसाबैंयसीरा ।

(ऐ अल्लाह! मुझसे आसान हिसाब लीजियो) मैंने अर्ज़ किया ऐ अल्लाह के नबी ! आसान हिसाब का क्या मतलब है? इर्शाद फ़रमाया आसान हिसाब यह है कि आमालनामे से आंखें बचा कर मुंह फेर लिया जाए ( और छानबीन न की जाए) यह सच है कि जिससे छानबीन करके हिसाब लिया गया, वह हलाक हुआ ।

– अहमद

तंबीह

आंहज़रत की शफाअत ज़रूर होगी और हदीसों में जो कुछ आया है, सब सही और दुरुस्त है। लेकिन शफाअत के भरोसे पर भले काम न करना और गुनाहों में पड़े रहना बड़ी नादानी है। यह तो शफाअत की हदीसों से ही मालूम हुआ और आगे आने वाली हदीसों से भी यह बात साफ हो जाएगी कि इस उम्मत के आदमी बुहत बड़ी तादाद में दोज़ख़ में जाएंगे। दोज़ख़ में जाने और फिर कितनी मुद्दत अज़ाब भुगतने के बाद शफाअत से निकलना होगा। यह खुदा ही बेहतर जाने ! अब कौन-सा गुनाहगार और नेक अमल से ख़ाली यह कह सकता है कि मैं दोज़ख़ में हरगिज़ न जाऊंगा? कोई भी यह दावा नहीं कर सकता फिर गुनाहों पर जुर्जत करना और नेकियों से खाली हाथ रहना कौन-सी समझदारी है? इन ही समूहों (पृष्ठों) में अभी करीब ही गुज़र चुका है कि आहज़रत सैयदे आलम ने फरमाया कि (हमारे) इस किले को मानने वालों में से इतनी बड़ी तादाद दोजख में दाखिल होगी कि जिसका इल्म अल्लाह ही को है और यह दोज़ख़ का दाखिला अल्लाह की नाफरमानियों और नाफरमानियों पर जुअंत करने और ख़ुदा के हुक्म के खिलाफ करने की वजह से होगा।

लोगो की सिफ़ारीश

  • मोमिनों की शफाअत

आहज़रत सैयदे आलम की शफाअत उम्मत के लिए रहमत होगी और आप के तुफैल में आप के बहुत-से उम्मतियों को भी शफाअत करने का एजाज़ (श्रेय) मिलेगा। हज़रत अबू सईद से रिवायत है कि आहज़रत सैयदे आलम ने फ़रमाया कि बिला शुव्हा मेरी उम्मत के कुछ लोग पूरी जमाअतों के लिए शफाअत करेंगे और कुछ एक क़बीले के लिए और कुछ लोग उस्बा’ के लिए और कुछ एक शख़्स के लिए सिफारिश करेंगे। यहां तक कि सारी उम्मत जन्नत में दाखिल हो जाएगी और एक हदीस में है कि आहज़रत सैयदे आलम ने फ़रमाया कि मेरी उम्मत के एक शख़्स की शफाअत के क़बीला बनू तमीम के आदमियों से भी ज्यादा लोग जन्नत में दाखिल होंगे। -मिश्कात शरीफ

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दस से चालीस तक की तादाद के गिरोह को उस्वा कहते हैं। 

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हजरत अनस से रिवायत है कि आहजरत सैयदे आलम ने फ़रमाया कि (जन्नतियों के रास्ते में) दोज़ख़ में जाने वालों की लाइन बनी खड़ी होगी। इसी बीच एक जन्नती वहां से गुज़रेगा । दोज़ख़ियों की लाइन वालों में से एक शख़्स उस जन्नती से कहेगा कि ऐ साहब! क्या आप मुझे पहचानते नहीं? मैंने आप को दुनिया में एक बार पानी पिलाया था । इसलिए मेहरवानी फ़रमाकर मेरी शफाअत कर दीजिए और दोज़खियों की इन लाइन वालों में से कोई गुज़रने वाला जन्नती से कहेगा कि मैंने आप को वुज़ू का पानी दिया था (मेहरबानी फरमाकर शफाअत कर दीजिए) चुनांचे जन्नती शफाअत करके जन्नत में दाखिल कर देगा।

-इब्ने माजा

लानत करने वाले 

  • लानत करने वाले शफाअत नहीं कर सकेंगे

हज़रत अबुर्दा से रिवायत है कि आंहज़रत सैयदे आलम ने इर्शाद फरमाया कि लानत करने की आदत वाले कियामत के दिन न गवाह बनेंगे, न शफाअत करने के अहल होंगे यानी उनकी इस बुरी आदत की वजह से गवाही और शफाअत का ओहदा न दिया जाएगा जो बड़ी सआदत और इज्ज़त का रुत्वा है।

– मुस्लिम शरीफ

Allah के लिए Jaan देने वाले की सिफ़ारीश

मुजाहिद की शफाअत

तिर्मिज़ी शरीफ़ की एक लम्बी रिवायत में है, जिसे हज़रत मिक्दाम बिन मसूदीकर्ब ने रिवायत की है कि आहज़रत सैयदे आलम ने शहीद की बड़ाईयां ब्यान करते हुए भी यह फरमाया कि सत्तर रिश्तेदारों के बारे में उसकी शफाअत क़ुबूल की जाएगी।                                            -मिश्कात शरीफ

मां-बाप के लिए बच्चे की सिफ़ारीश 

मां-बाप के हक में नाबालिग बच्चे की शफाअत

हज़रत अब्दुल्लाह बिन मस्ज़द से रिवायत है कि आहज़रत सैयदे आलम ने फरमाया कि जिसने तीन बच्चे (पहले से अपने) आगे (आख़िरत में) भेज दिए थे जो बालिग न हुए थे वे बच्चे उसके लिए मर्द हो या औरत, दोज़ख़ से बचाने के लिए मज़बूत किले (की तरह) काम आने वाले बन जाएंगे। यह सुनकर हज़रत अबूज़र ने अर्ज़ किया कि मैंने तो सिर्फ दो बच्चे आगे भेजे हैं। मेरे बारे में क्या फ़रमाते हैं? नबी करीम का इर्शाद हुआ कि दो बच्चे जो आगे भेजे हैं, उनके बारे में भी यही बात है। हज़रत उबई बिन कब  ने अर्ज़ किया कि मैंने तो एक ही बच्चा आगे भेजा है। आंहज़रत ने फ़रमाया कि एक के बारे में भी यही बात है।        

-मिश्कात शरीफ

बच्चे का (इंतिकाल) मरना कैसा है ?

आगे भेजने का मतलब यह है कि मां-बाप या दोनों में से एक की मौजूदगी में बच्चे का इंतिकाल हो जाए। बच्चे की मौत पर जो मां-बाप को ग़म होता है। उसके बदले में अल्लाह जल्ल ल शानुहू ने यह खुशी रखी है। कि वह बच्चा मां-बाप के बख़्शवाने के लिए जोर लगायेगा। अगर अधूरा बच्चा गिर गया तो वह भी मां-बाप को बख़्शवाने के लिए ज़ोर लगायेगा । जैसा कि हज़रत अली ने आंहज़रत सैयदे आलम का इर्शाद नकुल फ़रमाया है कि बिला शुब्हा अधूरा रह गया बच्चा भी उस वक्त अपने रब से बड़ी ज़बरदस्त सिफारिश मां-बाप के लिए करेगा जबकि उसके मां-बाप दोज़ख़ में दाखिल कर दिए जाएंगे। उसकी ज़ोरदार सिफारिश पर उससे कहा जाएगा कि ऐ अधूरे बच्चे जो अपने रब से ( मां-बाप की बख्शिश के लिए) जोर लगा रहा है। अपने मां-बाप को जन्नत में दाखिल कर दे। इसके बाद वह अपनी नाफ़ के ज़रिए खींचता हुआ ले जाकर उन दोनों को जन्नत में दाखिल कर देगा ।

– इब्नेमाजा शरीफ

Quran के हाफ़िज़ की सिफ़ारीश 

कुरआन के हाफ़िज़ की शफाअत

हज़रत अली से रिवायत है कि आहज़रत सैयदे आलम ने इर्शाद फ़रमाया कि जिसने क़ुरआन पढ़ा और उसको अच्छी तरह याद कर लिया और क़ुरआन ने जिन चीजों और कामों को हलाल बताया है, उनको (अपने अमल और अक़ीदे में) हलाल रखा और जिन चीज़ों को उसने हराम बताया है, उनको (अपने अमल और अकीदे में) हराम ही रखा तो उसको अल्लाह जन्न्त में दाख़िल फरमायेंगे और उसके घर वालों में से ऐसे दस आदमियों के बारे में उसकी शफाअत क़ुबूल फरमायेंगे जिन के लिए (बुरे आमाल की वजह से) दोज़ख़ में जाना ज़रूरी हो चुका होगा। 

– तिर्मिज़ी शरीफ़ वगैरह

तंबीह

जिसे कुरआन मजीद याद हो। उसकी शफाअत दस आदमियों के हक  में ‘कुबूल होगी। जैसा कि अभी ऊपर की हदीस में गुज़रा। लेकिन इसी के साथ हदीस शरीफ़ में यह शर्त भी है कि कुरआन पाक पर अमल करने वाला हो। क़ुरआन मजीद के मुतालबों और तकाज़ों को पूरा करता हो । हराम से बचता हो, हलाल पर अमल करता हो। लेकिन जिसने कुरआन शरीफ़ के उस तक़ाज़ों और मुतालबों को पीठ पीछे डाला तो खुद क़ुरआन शरीफ़ उस पर दावा करेगा और दोज़ख़ में दाखिल कर देगा। बहुत-से लोग गुनाह करते जाते हैं और नेक अमल से कतराते हैं और नसीहत करने पर कहते हैं कि साहब! हमारा बेटा या भतीजा या फ़्लां रिश्तेदार हाफ़िज़ है। वह बख़्शवा लेगा। हालांकि यह नहीं देखते कि क़ुरआन शरीफ़ पर वह अमल भी करता है या नहीं। आजकल तो अमल करने वाला कोई-कोई है। दूसरे के भरोसे पर खुद गुनाहों में पड़ना नादानी है। हां, नेक अमल करते हुए अपने रिश्तेदार हाफ़िज़ की शफाअत की उम्मीद रखे और साथ-ही-साथ उसे कुरआन शरीफ के मुताबिक़ भी चलाते रहें ।

रोज़ा और क़ुरआन की सिफ़ारीश 

रोज़ा और क़ुरआन की शफाअत

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर से रिवायत है कि हज़रत सैयदे आलम ने फ़रमाया कि रोज़े और कुरआन बन्दे के लिए शफाअत करेंगे । रोज़े अर्ज़ करेंगे कि ऐ रब! मैंने उसको दिन में खाने से और दूसरी ख़्वाहिशों से रोक दिया था। इसलिए इसके हक में मेरी शफाअत क़ुबूल फरमाइए और कुरआन अर्ज़ करेगा कि ऐ रब! मैंने उसको रात को सोने से रोक दिया था । क्योंकि यह रात को मुझे पढ़ता या सुनता था, इसलिए मेरी शफाअत उसके हक़ में कुबूल फरमाइए। इसके बाद सैयदे आलम ने फ़रमाया कि आख़िर में दोनों की शफाअत क़ुबूल कर ली जाएगी।

-मिश्कात

हज़रत अबू उमामा से रिवायत है कि आंहज़रत सैयदे आलम ने फ़रमाया कि रोज़े रखो और क़ुरआन शरीफ़ पढ़ो। क्योंकि वह क़ियामत के दिन अपने आदमियों के लिए शफाअत करने वाला बनकर आएगा। (फिर फ़रमाया कि) दोनों सूरतों बकरः और इम्रान को पढ़ा करो जो बहुत ज़्यादा रौशन हैं। क्योंकि वे कियामत के दिन दो बादलों या दो सायबानों या परिंदों की दो जमाअतों की तरह जो लाइन बनाये हुए हों, आयेंगी और अपने पढ़ने वालों के लिए बड़ी ज़ोर से सिफारिश करेंगी।

– मुस्लिम शरीफ

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