Talak se Bachne ka Waqia |Pati ka patni ke liye Pyar – Dawat~e~Tabligh

माल भी मिल गया और बीवी भी हाथ से नहीं गई। इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैहि की जहानत के वाक़िआत in Hindi. Talak se Bachne ka Waqia |Pati ka patni ke liye Pyar – Dawat~e~Tabligh…..

Talak se Bachne ka Waqia |Pati ka patni ke liye Pyar - Dawat~e~Tabligh
Talak se Bachne ka Waqia |Pati ka patni ke liye Pyar – Dawat~e~Tabligh

Pati ka patni ke liye Pyar

  • इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैहि की जहानत के वाक़िआत

पहला वाक़िआ

एक शख्स था, उसकी बीवी उसको मुँह नहीं लगाती थी और वह सी जान से उसका आशिक़ था, बीवी की तबीयत शौहर से नहीं मिलती थी, इसलिए वह तलाक़ लेना चाहती थी मगर मर्द तलाक़ नहीं देता था, मर्द उसको यही नहीं कि सताता नहीं था बल्कि मोहब्बत करता था मगर वह रहना ही नहीं चाहती थी। एक दिन दोनों मियां-बीवी बैठे हुए बातचीत कर रहे थे, बीवी कुछ कह रही थी, मर्द ने भी कोई जुमला कहा। वस वह चुप होकर बैठ गई, मर्द ने कहा कि अगर सुबह सादिक़ से पहले-पहले तू न बोली तो तुझ पर तलाक़ है। वह चुप हो गई और इरादा कर लिया कि मैं ख़ामोश रहूँगी ताकि इससे किसी तरह पीछा छूट जाये। वह बेचारा परेशान हुआ और हर चंद बुलाना चाहता था मगर वह बोलती ही नहीं थी। अब वह समझ गया कि यह तलाक़ लेना चाहती है और इस तरह बीवी मुझसे जुदा हो जायेगी। अब उसने फुक्हा के दरवाज़े झांकने शुरू किये। उनसे जाकर अपना हाल बयान किया, उन्होंने यही कहा कि अगर वह चुप रही तो तलाक़ पड़ जायेगी, यह तो तेरी तरफ़ से शर्त है उसकी।

सूरत यही है कि उसकी जाकर खुशामद करो और सुबह सादिक़ से पहले किसी तरह चुलवाओ वर्ना सुबह सादिक़ होते ही वह तेरे हाथ से निकल जायेगी, सबने यही जवाब दिया फिर वह इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाहि अलैहि के पास पहुँचा। वह वहाँ का हाज़िर पाश था। मुतफ़क्किर और परेशान बैठ गया, इमाम साहब ने फ़रमाया कि आज क्या बात है, परेशान क्यों हो? उसने कहा कि हज़रत वालिआ यह है कि बीवी से मैंने कह दिया कि तू अगर सुब्ह सादिक़ तक न बोली तो तुझ पर तलाक़, अब वह ख़ामोश होकर बैठ गई है। इमाम अबू हनीफ़ा रह० ने फ़रमाया, तलाक़ नहीं पड़ेगी। मुतमइन रह। अब वह मुतमइन होकर आ गया, फुक्हा ने इमाम साहब पर तन शुरू किया कि अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैहि हराम को हलाल बताना चाहते हैं, एक साफ़ सरीह हुक्म है उसको कह दिया कि तलाक़ नहीं पड़ेगी।

इमाम साहब रह० ने यह किया कि सुबह सादिक़ में जब आधा घंटा रह गया तो मस्जिद में जाकर ज़ोर-ज़ोर से तहज्जुद की अजान देना शुरू कर दी, उस औरत ने जब अज़ान की आवाज़ सुनी तो समझी सुब्ह सादिक़ हो गई, बस बोल पड़ी और कहने लगी सुक सादिक हो गई, अब मैं मुतल्ला हो गई, अब में तेरे पास नहीं रहूंगी, जब तहकीक किया तो मालूम हुआ कि सुबह सादिक़ नहीं हुई, वह तहज्जुद की अज़ान थी, लोग क़ायल हो गये कि वाकई इमाम साहब फ़क़ीह भी हैं और मुदब्बिर भी ।

– मजालिस हकीमुल इस्लाम, पेज  214

Talak se Bachne ka Waqia

  • दूसरा वाक़िआ

एक मर्तबा एक घर में चोरी हुई, चोर उसी मुहल्ले का था, चोरों ने घर वालों को पकड़ा और जबरदस्ती हलफ़ लिया कि अगर तू किसी को हमारा पता बतलायेगा तो तेरी बीबी पर तलाक़ उस बेचारे ने मजबूरन तलाक़ का हलफ़ लिया। वह चोर उसका सारा माल लेकर चले गये, अब वह बहुत पेरशान हुआ कि अगर में चोरों का पता बतलाता हूँ तो माल तो मिल जायेगा मगर बीबी हाथ से जाएगी और अगर पता नहीं बतलाता हूँ तो बीबी तो रहेगी मगर सारा घर खाली हो जाता है तो माल और बीबी में तक़ाबुल पड़ गया तो माल रखे या बीवी रखे और किसी से कह भी नहीं सकता था क्योंकि वह अहद कर चुका था। फिर इमाम साहब रहमतुल्लाह अलैहि की मज्लिस में हाज़िर हुआ, वह बहुत गमगीन और उदास और परेशान था। इमाम साहब रह० ने फ़रमाया कि आज तुम बहुत उदास हो क्या बात है? उसने कहा, हज़रत में कह नहीं सकता, फ़रमाया, कुछ तो कहो।

उसने कहा कि हज़रत अगर मैंने कहा तो न जाने क्या हो जायेगा, फिर फ़रमाया कि इज्मालन कहो, तो उसने कहा कि हज़रत चोरी हो गई है और मैंने यह अहद कर लिया है कि अगर मैंने उन चोरों का पता किसी को बतलाया तो बीबी पर तलाक, मुझे मालूम है कि चोर कौन हैं, वह तो मुहल्ले के हैं लेकिन अगर पता बतलाता हूँ तो बीबी पर तलाक़ पड़ जायेगी। इमाम साहब ने फ़रमाया कि मुत्मइन रह, बीवी भी हाथ से नहीं जाएगी और माल भी मिल जाएगा और तू ही पता बतलाएगा। कूफ़ा में फिर शोर हो गया कि अबू हनीफ़ा रह० यह क्या कर रहे हैं? यह तो एक अहद है जब वह पूरा करेगा तो बीबी पर तलाक़ पड़ जायेगी, यह इमाम साहब रह० ने कैसे कह दिया कि न बीवी जाएगी और न माल जाएगा। उलमा और फुक्हा परेशान हो गये। 1

इमाम साहब रह० ने फ़रमाया कि कल जुहर की नमाज़ मैं तुम्हारे मुहल्ले की मसजिद में आकर पढूंगा। चुनांचे इमाम साहब तशरीफ़ ले गये, वहाँ नमाज़ पढ़ी और उसके बाद एलान कर दिया कि मसजिद के दरवाज़े बंद कर दिये जाएं कोई बाहर न जाये, इसमें चोर भी मौजूद थे। उस मसजिद का एक दरवाज़ा खोल दिया, एक तरफ़ खुद बैठ गये और एक तरफ़ उसको बिठा दिया और फ़रमाया कि एक-एक आदमी निकलेगा जो चोर न हो उसके बारे में कहते जाना यह चोर नहीं है। और जब चोर निकलने लगे तो चुप होकर बैठ जाना, चुनांचे जो चोर नहीं होते थे, उनके बारे में कहा जाता था कि यह चोर नहीं है, यह भी चोर नहीं और जब चोर निकलने लगता तो ख़ामोश होकर बैठ जाता इस तरह उसने बतलाया नहीं मगर बिना बतलाये सारे चोर जान लिये गये कि ये सब चोर हैं। चुनांचे चोर भी पकड़े गये, माल भी मिल गया और बीवी भी हाथ से नहीं गई। यह तदबीर की बात है।

 – मजालिस हकीमुल इस्लाम, पेज 216

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