तिजारत किसलिए करना है ? | Deen के नाम पर Paisa कमाने वाले – Dawat~e~Tabligh

नया Ghar ख़रीद ने की tamanna, Saman महंगा बेचना कैसा है? महंगा बेचने के लिए Saman जमा करना। तिजारत करना। islam के नाम पर Paisa कमाने वाले। तिजारत किसलिए करना है ? | Deen के नाम पर Paisa कमाने वाले – Dawat~e~Tabligh…

तिजारत किसलिए करना है ? | Deen के नाम पर Paisa कमाने वाले - Dawat~e~Tabligh
तिजारत किसलिए करना है ? | Deen के नाम पर Paisa कमाने वाले – Dawat~e~Tabligh

तिजारत करना

माल की बेजा मुहब्बत, जमा करने की हवस और उस पर इतराना तो बेशक बहुत बड़ी बुराई है और इस्लामी जिंदगी से इसका कोई जोड़ नहीं है। लेकिन अच्छे कामों में खर्च करने के लिए माल कमाना एक पसन्दीदा काम है और इस्लाम ने इस पर उभारा है।

प्यारे रसूल सल्ल० ने एक बार हज़रत सअद बिन अबी वक़्क़ास रजि० से फ़रमाया, “अगर तुम अपने वारिसों को खुशहाल छोड़ जाओ तो यह इससे बेहतर है कि तुम उन्हें ग़रीब छोड़ जाओ और वे तुम्हारे बाद भीख मांगते फिरें ।”

हज़रत क़ैस रह० अपने बेटे हज़रत हाकिम रह० से फ़रमाया करते थे, “माल जमा करो। क्योंकि माल से शरीफ़ों की इज़्ज़त होती है और वह कमीन लोगों से बेपरवाह हो जाते हैं।”

हज़रत सईद इब्ने मुसय्यिब रह० फ़रमाया करते थे कि “ख़ुदा की क़सम वह आदमी किसी काम का नहीं है जो अपनी इज़्ज़त व आवरू बचाने के लिए माल जमा नहीं करता।”

हज़रत अबू कलावा रह० फ़रमाया करते थे कि “बाज़ार में जमकर कारोबार करो। तुम दीन पर मज़बूती के साथ जम सकोगे और लोगों से बेनियाज़ होगे” हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर रज़ि० फ़रमाया करते थे, “अगर मेरे पास उहुद पहाड़ के बराबर सोना हो और मैं उसकी ज़कात अदा करता हूं तो मुझे माल से कोई ख़तरा नहीं।”

बुजुर्गों के इन अक़वाल से मालूम होता है कि माल कमाना कोई बुराई नहीं है जिससे घिन की जाए। बुराई तो असल में यह है कि आदमी माल व दौलत की मुहब्बत में दीन से गाफिल हो जाए। आखिरत को भूलकर अय्याशी में पड़ जाए हमारे बुजुगों ने दीन की ऊंची से ऊंची ख़िदमत की है लेकिन हमेशा अपनी रोज़ी ख़ुद कमाते, कारोबार करते, या और कोई पेशा करते, दूसरों के सहारे पर कभी ज़िंदगी न गुज़ारते हज़रत अब्दुल्लाह रह० बहुत बड़े कारोबारी थे उनकी तिजारत बहुत 1 बड़े पैमाने पर थी। खुरासान से क़ीमती सामान लाते और हिजाज़ में बेचते थे । अल्लाह ने तिजारत में खूब बरकत दी थी। साल में एक लाख तो गरीबों और मिस्कीनों को  ख़ैरात देते।

तिजारत किसलिए करना है ?

एक मर्तबा उनके मशहूर शागिर्द हज़रत फ़ुज़ैल रह० ने उनसे पूछा, “हज़रत आप लोगों को तो नसीहत करते हैं कि दुनिया से दूर रहो और आखिरत कमाने की फिक्र करो और खुद क्रीमती कीमती सामानों की तिजारत करते हैं?”

फ़रमाया, “फ़ुज़ैल! तुमने यह भी सोचा कि मैं तिजारत किस लिए करता हूँ। मैं तिजारत सिर्फ इसलिए करता हूं कि मुसीबतों से बच सकूँ, अपनी इज्ज़त-आबरू की हिफ़ाज़त कर सकूं, अपने-परायों के जो हुकूक मुझ पर आते हैं उन्हें अच्छी तरह अदा कर सकूं, और इत्मीनान के साथ अल्लाह की बन्दगी कर सकूँ।”

नया Ghar ख़रीद ने की tamanna

  • कल बिन देखे सौदा था इसलिए ससता था

हारून रशीद के ज़माने में बहलूल रह० नामी एक बुजुर्ग गुज़रे हैं। वह मजज़ूब और साहिबे हाल थे। हारून रशीद उनका बड़ा एहतिराम करता था। हारून रशीद की बीवी जुबैदा खातून भी एक नेक और पारसा औरत थी। उसने अपने महल में एक हज़ार ऐसी ख़ादिमाएं रखी हुई थीं जो क़ुरआन की हाफ़िज़ा और क़ारिया थीं। उन सबकी ड्यूटियां मुख्तलिफ़ शिफ्टों में लगी हुई थीं। चुनांचे उसके महल से चौबीस घंटे उन बच्चियों के क़ुरआन पढ़ने की आवाज़ आ रही होती थी। उसका महल कुरआन का गुलशन महसूस होता था।

एक दिन हारून रशीद अपनी बीवी के साथ दरिया के किनारे टहल रहा था कि एक जगह बहलूल दाना रह० को बैठे हुए देखा। उसने कहा, अस्सलामु अलैकुम। बहलूल दाना रह० ने जवाब में कहा, ‘व अलैकुमुस्सलम ।’ हारून रशीद ने कहा, बहलूल ! क्या कर रहे हो? उन्होंने कहा कि मैं रेत के घर बना रहा हूं। पूछा, किसके लिए बना रहे हो? बहलूल ने जवाब दिया कि जो आदमी इसको ख़रीदेगा मैं उसके लिए दुआ करूंगा कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त उसके बदले उसको जन्नत में घर अता फ़रमा दे। बादशाह ने पूछा, बहलूल इस घर की क़ीमत क्या है? उन्होंने कहा कि एक दीनार हारून रशीद ने समझा कि यह एक दीवाने की बड़ है, लिहाज़ा वह आगे चला गया।

उसके पीछे जुबैदा खातून आई उसने वहसूल रह० को सलाम किया, फिर पूछा बहलूल क्या कर रहे हो? उन्होंने कहा कि में रेत के घर बना रहा हूं। उसने पूछा, किस लिए घर बना रहे हो? बहलूल रह० ने कहा कि जो आदमी इस घर को ख़रीदेगा में उसके लिए दुआ करूंगा कि या अल्लाह ! इसके बदले उसको जन्नत में घर अता फ़रमा दे। उसने पूछा, बहलोल इस घर की क़ीमत क्या है? बहलूल ने कहा, एक दीनार जुबैदा खातून ने एक दीनार निकाल कर उसको दे दिया और कहा कि मेरे लिए दुआ कर देना। वह दुआ करवा कर चली गई।

रात को जब हारून रशीद सोया तो उसने ख़्वाब में जन्नत के मनाज़िर देखे। आवारें, मुर्गज़ारें और फल-फूल वगैरह देखने के उलावा बड़े ऊंचे-ऊंचे खूबसूरत महलात भी देखे। एक सुर्ख़ याकूत के बने हुए महल पर उसने ज़ुबैदा का नाम लिखा हुआ देखा। हारून रशीद ने सोचा कि देखूं तो सही क्यों कि यह मेरी बीवी का घर है। वह महल में दाखिल होने के लिए जैसे ही दरवाज़े पर पहुंचा तो एक दरबान ने उसे रोक लिया। हारून रशीद कहने लगा, इस पर तो मेरी बीवी का नाम लिखा हुआ है, इसलिए मुझे अंदर जाना है। उसने कहा, नहीं, यहां का दस्तूर अलग है, जिसका नाम होता है उसी को अंदर जाने की इजाज़त होती है, किसी और को इजाज़त नहीं होती, लिहाज़ा आपको दाखिल होने की इजाज़त नहीं है।” जब दरबान ने हारून रशीद को पीछे हटाया तो उसकी आंख खुल गई। उसे वेदार होने पर फ़ौरन ख़्याल आया कि मुझे तो लगता है कि बहलूल की दुआ जुबैदा के हक़ में अल्लाह रब्बुल इज्जत के यहां क़बूल हो गई। फिर उसे अपने आप पर अफ़सोस हुआ कि मैं भी अपने लिए एक घर खरीद लेता तो कितना अच्छा होता। वह सारी रात इसी अफ़सोस में करवटें बदलता रहा। सुबह हुई तो उसने दिल में सोचा कि आज फिर मैं ज़रूर दरिया के किनारे जाऊंगा। अगर आज मुझे बहलूल मिले तो मैं एक मकान ज़रूर खरीदूंगा।

चुनांचे वह शाम को फिर बीवी को लेकर चल पड़ा। वह बहलूल को तलाश करते हुए इधर-उधर देख रहा था। उसने देखा कि एक जगह बहलूल बैठा उसी तरह का मकान बना रहा था। उसने कहा, अस्सलामु अलैकुम! बहलोल ने जवाब में व अलैकुमुस्सलाम कहा। हारून रशीद ने पूछा, क्या कर रहे हो? बहलोल ने कहा, मैं घर बना रहा हूं। उसने पूछा किस लिए? बहलूल ने कहा, जो आदमी यह घर ख़रीदेगा मैं उसके लिए दुआ करूंगा कि अल्लाह तआला उसे उसके बदले जन्नत में घर अता कर दे। हारून रशीद ने पूछा, बहलूल इसकी क़ीमत क्या है? बहलोल ने कहा, इसकी क़ीमत पूरी दुनिया की बादशाही है। हारून रशीद ने कहा, इतनी क़ीमत तो मैं दे नहीं सकता, कल तो एक दीनार के बदले दे रहे थे और आज पूरी दुनिया की बादशाही मांगते हो बहलोल ने कहा, बादशाह सलामत ! कल बिन देखें मामला था और आज देखा हुआ मामला है। कल बिन देखे सौदा था इसलिए सस्ता मिल रहा था और आज चूंकि देख के आए हो इसलिए अब उसकी क़ीमत ज़्यादा देनी पड़ेगी

हमारी मिसाल ऐसे ही है कि आज हमने अल्लाह तआला और उसके रसूल सल्ल० को बिन देखे माना था इसलिए जन्नत बड़ी सस्ती है। लेकिन जब मौत के वक़्त आख़िरत की निशानियां देख लेंगे तो उसके बाद फिर उसकी क़ीमत अदा नहीं कर सकेंगे। इरशाद बारी तआला है :

” रोज़े महशर मुज्मि यह तमन्ना करेगा कि काश मैं अपनी सज्ञा के बदले में अपना बेटा दे देता, बीवी दे देता, अपना भाई दे देता, वह ख़ानदान वाले दे देता जो उसे ठिकाना देते यहां तक कि जो कुछ दुनिया में है वह सब दे देता और मैं जहन्नम से बच जाता ! फ़रमाया हरगिज़ नहीं, हरगिज़ नहीं ।

(कुरआन, 70:11-14 )

Saman महंगा बेचना कैसा है? 

  • महंगा बेचने के लिए गुल्ला जमा करना मुहलिक बीमारी का सबब है

मुसनद की एक रिवायत में है कि अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर फारूक रज़ियल्लाहु अन्हु मस्जिद से निकले तो अनाज फैला हुआ देखा, पूछा यह गुल्ला कहाँ से आ गया? लोगों ने कहा बिकने के लिए आया है। आपने दुआ की खुदाया इसमें बरकत दे, लोगों ने कहा यह गुल्ला गिरा भाव बेचने के लिए पहले से जमा कर लिया था। पूछा, किसने जमा किया था? लोगों ने कहा, एक तो फ़ख़ ने जो हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु के मौला है और दूसरे आप के आज़ाद कर्दा गुलाम मे आपने दोनों को बुलवाया और फ़रमाया कि तुमने ऐसा क्यों किया? जवाब दिया कि हम अपने मालों से ख़रीदते हैं, लिहाजा जब चाहें बेचें, हमें इख़्तियार है।

आप ने फ़रमाया, सुनो, मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सुना है कि जो शख्स मुसलमानों में महंगा बेचने के ख्यात से गुस्ता रोककर रखे उसे ख़ुदा तआत्ता मुफ़्लिस कर देगा या जुज़ामी यह सुन कर हज़रत फरों तो फ़रमाने लगे कि मेरी तीया है! मैं खुदा तआला से फिर आप से अहद करता हूँ कि फिर यह काम न करूंगा, लेकिन हज़रत उमर फ़ारूक़ रजि० के गुलाम ने फिर भी कहा कि हम अपने माल से ख़रीदते हैं और नफ़ा उठाकर बेचते हैं इसमें क्या हर्ज है? रावी-ए-हदीस हज़रत अबू बहचा रह० फ़रमाते हैं कि मैंने फिर देखा कि उसे जुज़ाम हो गया और जुज़ामी बना फिरता था इब्ने माजा में है कि जो शख्स मुसलमानों का गुस्सा गिरे भाव बेचने के लिए रोक रखे अल्लाह तआला उसे मुफ़्लिस कर देगा या जुज़ामी।

– तफ्सीर इब्ने कसीर, पेज 372

Deen के नाम पर Paisa कमाने वाले

  • दीन के नाम पर दुनिया कमाने वाले रियाकारों को सख़्त तंबीह

हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया आख़िरी ज़माने में कुछ ऐसे मक्कार लोग पैदा होंगे जो दीन की आड़ में दुनिया का शिकार करेंगे, वह लोगों पर अपनी दरवेशी और मिस्कीनी ज़ाहिर करने और उनको मुतास्सिर करने के लिए भेड़ों की खाल का लिबास पहनेंगे, उनकी ज़बानें शकर से ज्यादा मीठी होंगी मगर उनके सीनों में भेड़ों के से दिल होंगे। (उनके बारे में) अल्लाह तआला का फ़रमान हैं, क्या यह लोग मेरे ढील देने से धोखा खा रहे हैं या मुझसे निडर होकर मेरे मुक़ाबले में जुरअत कर रहे हैं? तो मुझे अपनी क़सम हैं कि मैं मक्कारों पर उन्हीं में ऐसा फ़ितना खड़ा करूंगा जो उनमें के अक्लमन्दों और दानाओं को भी हैरान बना के छोड़ेगा ।

 -जामे तिर्मिज़ी

फ़ायदा: – इस हदीस से मालूम हुआ कि रियाकारी की यह ख़ास क़िस्म कि आबिदों, ज़ाहिदों की सूरत बनाकर और अपने अंदरूनी हाल के बिल्कुल उल्टे उन ख़ासान-ए-खुदा की सी नर्म व शीरीं बातें करके अल्लाह के सादा-लौह बन्दों को अपनी अक़ीदत के जाल में फ़ांसा जाये और उनसे दुनिया कमाई जाये, बदूतरीन क़िस्म की रियाकारी है और ऐसे लोगों को अल्लाह तआला की तंबीह है कि वह मरने से पहले इस दुनिया में भी सख़्त फ़िल्मों में मुब्तला किया जाएंगे।

– मआरिफुल हदीस, हिस्सा 2, पेज 334

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