Malik और गुलामों का इन्साफ | Zulm करने वाले | Dawat-e-Tabligh

मेरे कुछ गुलाम हैं जो मुझसे झूठ बोलते हैं और मेरी ख़ियानत करते हैं और मेरी नाफरमानी करते हैं, और मेरी तरफ से यह है कि उनको गालियां देता हूं और सज़ा में मारता भी हूं। अब मेरा और उनका क्या मामला होगा? मालिकों और गुलामों का इन्साफ | Zulm करने वाले | Dawat-e-Tabligh

मालिकों और गुलामों का इन्साफ | Zulm करने वाले | Dawat-e-Tabligh
मालिकों और गुलामों का इन्साफ | Zulm करने वाले | Dawat-e-Tabligh

मरने के बाद की ज़िन्दगी

इस संसार में मनुष्य का यह जीवन अस्थायी है और मरने के बाद उसे एक और जीवन मिलने वाला है जो सदैव रहेगा। अपने सच्चे मालिक की उपासना और उसके आज्ञापालन के बिना उसे मरने के बाद वाले जीवन में जन्नत हासिल नहीं हो सकती बल्कि उसे सदैव के लिए नरक का ईंधन बनना पड़ेगा। आज हमारे लाखों करोड़ों भाई अनजाने में नरक का इंधन बनने की दौड़ में लगे हुए हैं और ऐसे रास्ते पर चल पड़े हैं, जो सीधा नरक की ओर जाता है। इन हालात में उन सभी लोगों की ज़िम्मेदारी है जो केवल अल्लाह के लिए लोगों से प्रेम करते हैं. और सच्ची मानवता पर विश्वास रखते हैं कि वे आगे आएं और लोगों को नरक की आग से बचाने का अपना दायित्व पूरा करें। 

Allah का सख़्त हिसाब

हज़रत आइशा से यह भी रिवायत है कि नबी अकरम ने इर्शाद फ़रमाया कि क़ियामत के दिन जिससे (सही मानी में) हिसाब लिया गया। वह बर्बाद होकर रहेगा। यह सुनकर मैंने अर्ज़ किया कि ऐ अल्लाह के रसूल! अल्लाह तआला फ़रमाते हैं ‘फ़ सौ फ युहासबु हिसाबैंयसीरा ।’ (कि जिसके दाहिने हाथ में आमालनामा दिया गया। सो उससे बहुत जल्द आसान हिसाब होगा, इससे मालूम हुआ कि कुछ हिसाब देने वाले ऐसे भी होंगे, जो निजात पा जाएंगे।) आंहज़रत ने इस सवाल के जवाब में फ़रमाया (आसान हिसाब से सही मानी में खोद-कुरेद और छानबीन वाला हिसाब मुराद नहीं है, बल्कि आसान हिसाब से यह मुराद है कि बन्दे के सामने सिर्फ आमालनामा पेश करके छोड़ दिया जाए। लेकिन जिसकी छानबीन हुई, वह तो बर्बाद ही होकर रहेगा।

-बुखारी व मुस्लिम शरीफ

अच्छे लोगो पर अल्लाह का ख़ास करम

मोमिन पर अल्लाह का ख़ास करम

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर से रिवायत है कि आहज़रत सैयदे आलम ने फ़रमाया कि बेशक (क़ियामत के दिन) अल्लाह तआला मोमिन को अपने क़रीब करेंगे और (महशर वालों से उसे छिपा करके) फरमायेंगे कि क्या तुझे फ़्लां गुनाह याद है? क्या तुझे फ़्लां गुनाह याद है? वह जवाब में अर्ज़ करेगा कि, हां, ऐ रब! याद है, यहां तक कि अल्लाह तआला उससे गुनाहों का इकरार करा लेंगे और वह अपने दिल में यकीन कर लेगा कि मैं बर्बाद हो चुका। अल्लाह तआला फ़रमायेंगे कि मैंने दुनिया में तेरे ऐबों को छिपाया और उन गुनाहों को ज़ाहिर न होने दिया और अब मैं बख़्शिश कर देता हूं। इसके बाद नेकियों का आमालनामा उसे इनायत कर दिया जाएगा। लेकिन काफ़िर और मुनाफिक लोगों का प्रोपगंडा किया जाएगा। सारी मख़्लूक के सामने उसके मुतअल्लिक ज़ोर से पुकार दिया जाएगा कि ये वे लोग हैं जिन्होंने अपने रब के बारे में झूठी बातें गढ़ी थीं। ख़बरदार ! अल्लाह की लानत है ज़ालिमों पर ।                 -बुखारी व मुस्लिम

Allah को हर चिस का जवाब देना होगा

बग़ैर किसी वास्ते और पर्दे के अल्लाह को जवाब देना होगा

हज़रत इद्दी बिन हातिम रिवायत फ़रमाते हैं कि आहज़रत सैयदे आलम ने इर्शाद फ़रमाया कि तुम में से कोई भी ऐसा नहीं है, जिससे उसका रब खुद (हिसाब लेने के सिलसिले में) बात न करे। बन्दे के और उसके रब के दर्मियान कोई वास्ता और कोई पर्दा न होगा। उस वक़्त बन्दा अपने दाहिने तरफ़ नज़र करेगा तो अपने आमाल के अलावा कुछ नज़र न आयेगा और अपने बाएं तरफ़ नज़र करेगा तो जो पहले से करके भेजा था, वह नज़र आएगा और अपने सामने नज़र करेगा तो सामने दोज़ख़ ही पर नजर पड़ेगी लिहाजा तुम दोज़ख से बचो, अगरचे खजूर का एक टुकड़ा है (अल्लाह के रास्ते से) खर्च करने को तुम्हारे पास हो।

– बुखारी व मुस्लिम

जो काम किया उसका बदल मिलेगा

किसी पर जुल्म न होगा और भलाई व बुराई की एक-एक बात मौजूद होगी

क़ुरआन शरीफ़ में इर्शाद है  :

“यानी उस दिन किसी जान पर ज़ुल्म न होगा और तुमको बस उन्हीं कामों का बदला मिलेगा जो तुम किया करते थे।’ और इर्शाद है : 

‘सो जो शख़्स (दुनिया में) ज़र्रा बराबर नेकी करेगा वह (वहा) उसको देख लेगा और जो शख़्स ज़र्रा बराबर बदी करेगा वह (भी वहां) उसको देख लेगा।’ 

सूरः मोमिन में फ़रमाया :

‘और हर शख्स को उसके कामों का बदला दिया जाएगा। आज (किसी पर) ज़ुल्म न होगा। बेशक अल्लाह जल्द हिसाब लेने वाला है।’

बंदों का हक

कियामत के दिन अल्लाह के हक़ ( नमाज़, रोज़ा, जकात, हज वगैरह ) का भी हिसाब होगा और बंदों के हक का भी हिसाब होगा। दुनिया में जिसने किसी का हक मारा हो या किसी भी तरह ज़ुल्म या ज्यादती की हो, सबका हिसाब और फैसला होगा। बुजुर्गों ने फ़रमाया है कि अल्लाह का मुजिम होना कियामत के दिन के लिए इतना ख़तरनाक नहीं है जितना बंदों के हक को मारने और बंदों के सताने व जुल्म करने में ख़तरा है, क्योंकि अल्लाह तआला बेनियाज़ है। उनकी तरफ से अपने हक की बख्शिश कर देने की उम्मीद की जी सकती है। लेकिन बन्दे चूंकि ज़रूरतमंद होंगे और एक-एक नेकी से काम निकलने और निजात पाने की उम्मीद होगी। इसलिए बन्दों से माफ़ करने और अपना हक छोड़ने की उम्मीद रखना नामुनासिब है। क़ियामत के दिन रुपया-पैसा, माल व दौलत कुछ भी पास न होगा। हक की अदायगी के लिए नेकियों का लेन-देन होगा और हक की अदाएगी का एहतमाम इतना होगा कि जानवरों ने जो आपस में एक दूसरे पर पर जुल्म किया था, उसका भी बदला दिलाया जाएगा।

Zulm करने वाले

नेकियों और बुराइयों से लेन-देन होगा

हज़रत अबू हुरैरः से रिवायत है कि आंहज़रत सैयदे आलम ने इर्शाद फ़रमाया कि जिसने अपने किसी भाई पर ज़ुल्म कर रखा हो कि उसकी बे-आबरूई की हो और कुछ हक़ मारा हो, तो उसे चाहिए कि आज ही (उसका हक अदा करके या माफी मांगकर) उस दिन से पहले हलाल करा ले जबकि न दीनार होगा, न दिरहम। (फिर फ़रमाया) अगर इसके कुछ अच्छे अमल होंगे तो ज़ुल्म के बराबर उससे ले लिए जायेंगे और जिस पर जुल्म हुआ है उसको दिला दिए जायेंगे और अगर उसकी नेकियां न हुई तो मज़्लूम की बुराइयां लेकर उस ज़ालिम के सर डाल दी जायेंगी।                -बुखारी शरीफ

मालिकों और गुलामों का इन्साफ

हज़रत आइशा रिवायत फरमाती हैं कि रसूलुल्लाह 3 की ख़िदमत में एक शख़्स आकर बैठ गया। उसने अर्ज़ किया, ऐ अल्लाह के रसूल ! बिला शुव्हा मेरे कुछ गुलाम हैं जो मुझसे झूठ बोलते हैं और मेरी ख़ियानत करते हैं और मेरी नाफरमानी करते हैं (यह तो उनकी तरफ़ से हैं) और मेरी तरफ से यह है कि उनको गालियां देता हूं और सज़ा में मारता भी हूं। अब मुझे आप यह बताए कि आखिरत में मेरा और उनका क्या मामला होगा? आप . ने इर्शाद फ़रमाया कि जब क़ियामत का दिन होगा तो तेरे गुलामों को खियानत और नाफरमानी और झूठ बोलने का और तेरे सज़ा देने का हिसाब होगा। अगर तेरी सज़ा उनके कुसूरों के बराबर होगी तो मामला बराबर रहेगा, न तुझे कुछ उनकी तरफ से मिलेगा, न तुझ पर कुछ बोझ पड़ेगा और अगर तेरी सज़ा उनकी हरकतों से ज़्यादा होगी तो उस ज्यादा सज़ा का उनको तुझे बदला दिलाया जाएगा।

हज़रत आइशा फ़रमाती हैं कि नबी का यह इर्शाद सुनकर वह शख़्स रोता और चीख़ता हुआ वहां से हट गया। रसूलुल्लाह ने उससे फ़रमाया क्या तू अल्लाह तआला का यह इर्शाद नहीं पढ़ता (जिसमें तेरे मामले का साफ़ ज़िक्र किया गया है)।

और हम कियामत के दिन इंसाफ की तराजू कायम करेंगे तो किसी पर जरा-सा भी जुल्म न होगा और अगर कोई अमल राई के दाने के बराबर भी होगा तो हम उसे ज़ाहिर करेंगे और हम हिसाब लेने वाले काफी हैं।

यह सुनकर उस शख्स ने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल में अपने और इन गुलामों के हक में इससे बेहतर कुछ नहीं समझता कि उनको अपने से जुदा कर दूं। आपको गवाह बनाकर कहता हूं कि वह सब आज़ाद हैं।

-मिश्कात शरीफ

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